अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० || अभिज्ञानशाकुन्तलम्
जानुकः—णं भणाहि । इमश्श कार मच्छिआभत्तुणोत्ति । [ ननु भण । अस्य कृते मात्स्यिकभर्तुरिति । ] ( इति पुरुषमसूयया पश्यति )
पुरुषः—भट्टालक । इदो अद्धं तुम्हाणं सुमणोमुलं होदु । [ भट्टारक इतोऽर्धं युष्माकं सुमनो मूल्यं भवतु । ]
जानुकः—एत्तके जुज्जइ । [ एतावद् युज्यते । ]
श्यालः—धीवर महत्तरो तुमं पिअवस्सओ दाणिं मे संवुत्तो । कादंबरी सक्खिअं अम्हाणं पढमसोहिदमं इच्छीअदि । ता सांडिआपणं एव्व गच्छामो ।
जानुकः—ननु = अथवा भण = वद मत्स्यिकमर्तुः मत्स्येन जीवन्तीति मात्स्यिकाः धीवराः तेषां भर्तुः=स्वामिनः अस्य = एतस्य धीवरस्य कृते = लाभाय सेवा दर्शिता अनेनाङ्गुलीयकनिवेदनेन धीवरस्यैव लाभो जातः नास्माकमिति वृथैव महाराजः सेवितः इति एवमुक्त्वा पुरुषं = धीवरम् असूयया = ईर्ष्याया पश्यति = अवलोकयति । उत्कोचसूचकस्य तस्य सासूयं निरीक्षणमर्थकामुकत्वात् ।
पुरुषः—इत्थं राजपुरुषाणां नावमवगम्य धीवरोऽर्द्धभागं तस्मात् पारितोषिकात् दातुं प्रवर्तते—धीवरो वदति—हे भट्टारक ! हे स्वामिन् इतः = अस्मात् पारितोषिकात् कटकात् अद्धं = द्वितीयो भागः युष्माकं = भवतः सुमनोमूल्यम् = पुष्पमूल्यम् पूर्वोक्तवध्यचिह्नभूतमालापमूल्यं भवतु = अस्तु ।
जानुकः—एतावत्=एतन्मात्रं धनम् युज्यते = उचितमस्ति । इत्युत्कोचप्रियस्य जानुकस्याभिप्रायः ।
श्यालः—धीवर ! हे कैवर्त ! त्वमिदानीं = अधुना मे = मम अतिशयेन महान् महत्तरः=इतरापेक्षयातिशयः प्रियः=हृद्यः प्रियवयस्यकः सखा च संवृत्तः=जातः । कादम्बरी=
जानुक—यों कहो कि इन मल्लाहों के मालिक = मछुओं के मुखिया धीवर के लाभ के लिए जीजा जी ने राज सेवा की। ( यह कहकर उसे, डाह से देखता है। )
विशेष—जीजा जी को राजा के पास जाने से ही इसे पुरस्कार मिला। इसलिए यह कहना होगा इस मछुये के लिए ही इन्होंने राजा की सेवा की है।
तात्पर्य यह है कि लाभ तो मछली मारने वाले इस धीवर को हुआ, जो इसे इनाम के रूप में राजा का रत्नाभरण मिला, और कष्ट हम लोगों ने उठाया।
पुरुष—मालिक ! इसमें से आधा हिस्सा आप लोगों का भी फूल-माला, ( पान-पत्ती, चाय-पानी, शराब आदि ) के खर्च के लिए रहेगा।
विशेष—पुरस्कार का आधा देने का प्रस्ताव करते हुए मछुओं का मुखिया धीवर कह रहा है कि यह आप लोगों के लिए पुष्प का मूल्य है। आज कल भी अफसरों को घूस देने वाले यही कहते हैं कि यह तुच्छ भेंट आपको पान-खाने के लिए प्रस्तुत है। अतः कृपया इसे स्वीकार करें। आपने मुझे छोड़ देने की कृपा की इसके अभिनन्दन में से फूल माला से स्वागत करता पर तत्काल वे चीजें उपलब्ध नहीं हैं। अतः उनके बदले इसमें आधा हिस्सा ही देता हूँ आप लोग अपने मन से चीजें ले लें। या सिपाही ने पहले ही से शूली के लिए फूल माला की चर्चा की थी उसका व्यंग पूर्ण उत्तर भी हो सकता है।
जानुक—यह बात तो तुमने बहुत ही उचित कही, इतना ही ठीक है।
श्याल—अरे धीवर ! अब तो तू हमारा बड़ा मित्र हो गया। हम लोगों की नई मित्रता तो