भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 388
३०६अभिज्ञानशाकुन्तलम्

सानुमती—( राजानं दृष्ट्वा ) ठाणे खु पच्चादेसविमाणिदा वि इमस्स किदे सउंदला किलम्मदि त्ति । [ स्थाने खलु प्रत्यादेशविमानिताप्यस्य कृते शकुन्तला क्लाम्यतीति । ]

राजा—( ध्यानमन्दं परिक्रम्य )

प्रथमं सारङ्गाक्ष्या प्रियया प्रतिबोध्यमानमपि सुप्तम् ।
अनुशयदुःखायेदं हतहृदयं सम्प्रति विबुद्धम् ॥ ७ ॥


जागरणकृशोऽपि देवः पूर्वापेक्षयाऽस्माकं प्रियदर्शन एवं प्रतिभातीति तात्पर्यम् । अत्रो-पमा स्वभावोक्ति-परिकरालङ्काराः शार्दूलविक्रीडितं वृत्तं च ॥ ६ ॥

**सानुमती—**प्रच्छन्नविग्रहा दुष्यन्तं पश्यन्ती सानुमती तदाकृते लोकोत्तरत्व-मवेक्ष्य तं श्लाघते—प्रत्यादेशविमानितापि = प्रत्याख्यानेनापमानितापि शकुन्तला अस्य = राजर्षेः दुष्यन्तस्य कृते, -दुष्यन्तार्थं क्लाम्यति = विषादमनुभवति तप्यंत इति स्थाने खलु = अतिसुन्दरत्वात्, अस्यापि तद्विरहे विधुरत्वाच्च युक्ततरमेवेतदिति भावः। 'युक्ते द्वे साम्प्रतं स्थाने' इत्यमरः ।

राजा—( ध्यानमन्दं = ध्यानेन मन्दं ध्यानमन्दम्, शकुन्तला चिन्तया मन्दं मन्दम्, शनैः शनैः परिक्रम्य = किञ्चिच्चलित्वा ) प्रतिबुद्धप्रियावृत्तान्तो राजा दुष्यन्तः तन्निरा-करणपश्चात्तापेन तप्यमानः निजहृदयमधिक्षिपति—प्रथममिति ।

अन्वयः—प्रथमं सारङ्गाक्ष्या प्रियया प्रतिबोध्यमानमपि सुप्तमिदं हतहृदयं—सम्प्रति अनुशयदुःखाय विबुद्धम् ॥ ७ ॥

अङ्गुलीयकदर्शनेन व्यपगतशापप्रभावः प्रबुद्धशकुन्तलावृत्तान्तो राजा तदानीं स्वं हृदयमधिक्षिपति—प्रथममिति । सारङ्गस्य ईक्षणे इवेक्षणे यस्याः सा तया सारङ्गेक्ष्या


सानुमती—( राजा को देखकर ) तिरस्कार के द्वारा अपमानित की गई भी शकुन्तला जो इस राजा के लिए दुःखित रहती है, वह उचित ही है ।

**विशेष—**विशेष मण्डनों का तात्पर्य उन प्रसाधनों से है, जिन्हें मंगल के लिए धारण करना आवश्यक नहीं है । राजा के लिए बाँयी कलाई में कंगन पहनना अनिवार्य है । अतः उसे पहन कर अन्य आभूषणों का परित्याग कर दिया है । विशेष मण्डन के बिना भी जिसको शोभा नहीं घटती वह गुण रूप कहलाता है—

अङ्गान्यभूषितान्येव प्रक्षेपार्थैर्विभूषणैः । येन भूषितवद्भान्ति तद्रूपमिह कथ्यते ॥

विरही होने पर साँसें गर्म हो जाता हैं जिससे निचले होठ की ललाई कम हो जाती है, फिर भी उसमे शोभा कम नही होती । जागने से आँखे थक जाती हैं जिससे किनारे में वह लाल हो जाती हैं उससे भी शोभा बढ़ जाती है ।

हीरा आदि रत्न सान पर घिस जाने पर छोटे हो जाते हैं, पर उनकी सुन्दरता तथा मूल्यवत्ता बढ़ जाती है, क्षीणता छिप जाती है । अतः राजा के क्षीण होनेपर भी उनकी सुन्दरता बढ़ गई है । शरीर से निकले हुए तेज के कारण शारीरिक दुर्बलता प्रतीत नहीं होती ।

यहाँ चिन्ता, जागरण, क्षीण तथा प्रत्यादिष्ट आदि शब्दों से काम की दशाएँ सूचित होती हैं । माधुर्यगुण के कारण आकर्षण रहता है—'तन्माधुर्यं यत्र गात्रदृष्ट्यादेः स्पृहणीयता ।'

राजा—( ध्यान में मग्न शनैः शनैः चारों ओर घूमकर ) पहले मृगलोचनी प्रिया के द्वारा जगाया जाता हुआ भी सुप्त यह अभागा हृदय अब पश्चात्ताप के दुःख के लिए जागा है ॥ ७ ॥

**विशेष—**पहले बहुत कहने पर भी महर्षि दुर्वासा के शाप के वशीभूत राजा दुष्यन्त ने