भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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३०८ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा—वेत्रवति ! मद्वचनादमात्यमार्यपिशुनं ब्रूहि । $^१$चिरप्रबोधनान्न संभावित- मस्माभिरद्य धर्मासनमध्यासितुम् । यत्प्रत्यवेक्षितं पौरकार्यमार्येण तत्पत्रमारोप्य $^३$दीयतामिति । प्रतिहारी—जं देवो आणवेदि । [ यद्देव आज्ञापयति । ] ( इति निष्क्रान्ता । ) राजा—$^४$वातायन त्वमपि स्वं नियोगमशून्यं कुरु ।


पुरविहारारामभूमयः ते ते प्रदेशाः तदेव ‘प्रमदवनमन्तःपुरोचितम्’ इत्यमरः । देवः = महाराजः यथाकामं—यथेच्छम् विनोदस्थानानि = क्रीडास्थलीः अध्यास्ताम् = अधि- तिष्ठतु । ‘विज्ञेयं प्रमदवनं नृपस्तु यस्मिन् शुद्धान्तैः सह रमते पुरोपकण्ठम्’ इति हला- युधः । कारयेद वनशोधनमादौ ।

राजा—नृपः कथयति—वेत्रवति ! = द्वारपालिके ! मम वचनात् = मद्वाक्यात् अमात्यं = मन्त्रिणम् आर्यपिशुनं पिशुनाख्यं महामन्त्रिणं ब्रूहि = कथय चिरप्रबोधात् = चिरेण जागरणात् धर्मासनं = सिंहासनं विचारासनम्, अध्यासितुं = अधिष्ठातुं न सम्भावित- मस्माभिः = न सम्भाव्यतेऽलङ्कर्तुमस्माभिः यत् = यत्तु पौराणां नागरिकाणां कार्यं आर्येण भवता प्रत्यवेक्षितं = दृष्टम् तत् सर्वं कार्यं, पत्रमारोप्य = पत्रारूढं कृत्वा पत्रे लिखित्वा दीयताम् = प्रेष्यताम् ।

प्रतिहारी—यद्देवः = यथा महाराजः आज्ञापयति तथा क्रियते । इति = एवम् उक्त्वा ततः निष्क्रान्ता = रङ्गाद्विर्गता ।

राजा—नृपो वदति—वातायन ! त्वमपि स्वं = स्वकीयं नियोगं = कृत्यम्, कार्यम्, अशून्यं = पूर्णं कुरु = विधेहि ।


विशेष— प्राचीनकाल में भी आज के ही समान जब राजा किसी स्थान पर पधारने की अभिलाषा करते थे तो पहले सावधानी से उस स्थान की निगरानी कर ली जाती थी। इस पूर्व निरीक्षण के कारण किसी प्रकार शत्रुओं को अवसर न मिल पाता था।

प्रमदवन— यह उद्यान रनिवास के पास ही हुआ करता था। इसमें सर्वसाधारण को जाने की अनुमति न थी। केवल अन्तःपुर की सुन्दरियाँ इसमें विहार किया करती थीं। राजा भी जब कभी भी इसमें आकर आनन्द लेता रहता था। यह सर्वथा सुरक्षित स्थान था।

राजा— हे द्वारपालिके ! मेरी तरफ से अमात्य पिशुन से कहो—अर्थात् यह मेरा सन्देश कहना कि रात में देरतक जागते रहने के कारण आज धर्मासन पर बैठना मेरे लिए संभव नहीं है। आपने जो पुरवासियों का कार्य देख लिया हो, उसे पत्र पर चढ़ाकर मेरे पास भेज दें।

विशेष— राजा की अनुपस्थिति में मन्त्री राजकार्य देखते थे और उसकी रिपोर्ट सूचनार्थ राजा के पास भेज देते थे, पर देखने के पहले राजा की आज्ञा आवश्यक थी। रात में देर तक जागते रहने के कारण कोई भी दिमागी कार्य करना संभव नहीं होता। अतः राजा ने यह सन्देश भेजा था। मन्त्री प्रजाजनों के विवाद को सुनकर लिखता था और उस पर राजा की सहायता से निर्णय देता था। कभी-कभी राजा अकेले भी यह निर्णय-कार्य करता था।

प्रतिहारी—महाराज की जैसी आज्ञा ( ऐसा कहकर बाहर जाता है ) राजा—वातायन ! तुम भी जाकर अपना कार्य करो ।


पाठ०—१. 'दमात्यपिशुनं । २. अद्य चिरप्रबोधनान्न । ३. प्रस्थाप्यतामिति । ४. पार्वतायनू ।