भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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षष्ठोऽङ्कः

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चतुरिका—( ससंभ्रममवलोक्य ) समस्ससदु भट्टा। [ समाश्वसितु भर्त्ता। ]

सानुमती—हद्धी हद्धी। सदि खु दीवे ववधानदोसेण एसो अंधआरदोसं अणुहोदि। अहं दाणि एव्व णिव्वुदं करेमि। अहवा सुदं मए सउंदलं समस्ससंतोए महेंदजणणीए मुहादोजण्णभाओस्सुआ देवा एव्व तह अणुचिट्ठिस्संति जहअइरेण धम्मपदिणिं भट्टा अहिणंदिस्सदि त्ति। ता ण जुत्तं कालं पडिपालिदुं। जाव इमिणा वुत्तंतेण पिअसहिं समस्सासेमि। [ हा धिक् ! हा धिक् ! सति खलु दीपे व्यवधानदोषेणैषोऽन्धकारदोषमनुभवति। अहमिदानीमेव निर्वृतं करोमि। अथवा श्रुतं मया शकुन्तलां समाश्वासयन्त्या महेन्द्रजनन्यया मुखाद्यज्ञभागोत्सुका देवा एव तथानुष्ठास्यन्ति यथाचिरेण धर्मपत्नीं भर्त्ताभिनन्दिष्यतीति। तन्न युक्तं कालं प्रतिपालयितुम्। यावदनेन वृत्तान्तेन प्रियसखीं समाश्वासयामि। ] ( इत्युद्भ्रान्तकेन निष्क्रान्ता )

चतुरिका—( ससंभ्रमं = संभ्रमेण सहितं ससंभ्रमं सावेगम् अवलोक्य = दृष्ट्वा ) समाश्वसितु = धैर्यं धारयतु भर्ता = स्वामी।

सानुमती—अथ सानुमती अप्सरा दुष्यन्तस्य तादृशीमवस्थामलोक्य सकरुणमाह— हा धिक् हा धिक् = हा हन्त दैवं धिक् हा धिक् सति खलु = वर्तमानऽपि दीपे = वंशदीपके वंशाङ्कुरे पुत्रे सर्वदमने व्यवधानदोषेण देशान्तरावरणदोषेण अज्ञ नदोषेण वा एषः = अयं राजर्षि दुष्यन्तः अन्धकारदोषं = अन्धकारः शोक एव दोषः बाधा अन्धकारदोषः तम् अज्ञानदुःखम् अनुभवति = प्राप्नोति। अहं = सानुमती इदानीमेव = अधुनैव निर्वृतं = शान्तं करोमि = विदधामि पुत्रसद्भावं निवेदयामि अथवा यद्वा न विवेक्ष्यामि यद्वा श्रुतं = आकणितम् मया शकुन्तलां सखीम् समाश्वासयन्त्याः = उपशान्तयन्त्या महेन्द्रस्य = इन्द्रस्य मातुः = जनन्या अदितिदेव्या मुखात् = वदनात् यज्ञभागसमुत्सुका यस्य भागय समुत्सुका इति = यागांशग्रहीतुकामाः देवा = सुरा एव तथा = तेन प्रकारेण अनुष्ठास्यन्ति = करिष्यन्ति यथा = यत् न चिरेण अविलम्बेन शीघ्रम् धर्मपत्नीं = अर्द्धाङ्गिनीं धर्मभार्यां शकुन्तलां भर्ता स्वामी दुष्यन्तः अभिनन्दिष्यति = सादरं नेष्यति इतितत् = अतः न युक्तं नोचितम् कालं = समयं प्रतिपालयितुं अत्र प्रतीक्षितुम् विलम्बं कर्तुं यावत् अनेन वृत्तान्तेन आलेख्यविनोदनमोहोपगतादिवार्तया प्रिया = हृद्या च सा सखी = आली तां

चतुरिका—( घबराहट के साथ देखकर ) आश्वस्त हो, आश्वस्त हो, स्वामी।

सानुमती—हाय ! हाय ! वंश चलाने वाले पुत्र के रहते हुए भी व्यवधान दोष से ही यह राजर्षि इस प्रकार अन्धकार में पड़ा हुआ शोक का अनुभव कर रहा है। मैं अभी ही शकुन्तला का समाचार बतलाकर सुखी कर देती हूँ। अथवा मैंने शकुन्तला को धीरज बँधाती हुई इन्द्र की माता अदिति के मुख से सुना है—कि यज्ञभाग के लिए उत्सुक देवता लोग ही ऐसा उपाय करेंगे जैसे शीघ्र ही धर्मपत्नी शकुन्तला को स्वामी दुष्यन्त स्वागतपूर्वक स्वीकार करेंगे, तो इस समय की प्रतीक्षा करना ही ठीक होगा तो जबतक वृत्तान्त से प्रियसखी शकुन्तला को आश्वस्त करूंगी कि यज्ञभाग के लिए उत्सुक देवता लोग अतिशीघ्र ऐसा उपाय करेंगे जिससे तेरा पति तुझे पुनः पाकर तेरा आदर करेगा और पुत्रसहित तुझे पाकर परम प्रसन्न होगा। अतः अब मुझे यहाँ ज्यादा विलम्ब नहीं करना चाहिए। जाकर अपनी आँखों देखा वृत्तान्त बताकर शकुन्तला को धैर्य धराऊँ। ( ऐसा कहकर उद्भ्रान्त-नृत्य के साथ निकल जाती है )

विशेष—यहाँ प्रयुक्त दीप पद से ध्वनित होता है कि दीपक के समान तेजस्वी पुत्र पैदा हो चुका है। पुत्र कुल का दीपक होता है। यहाँ शकुन्तला के पुत्र सर्वदमन की ओर संकेत है।