अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः । ३६३
**मातलिः—**किमिव नामायुष्मानमरेश्वरात्रार्हति । पश्य—
सुखपरस्य हरेरुभयैः कृतं त्रिदिवमुद्धतदानवकण्टकम् । तव शरैरधुना नतपर्वभिः पुरुषकेसरिणश्च पुरा नखैः ॥ ३ ॥
माला स्ववक्षःस्थलादुन्मुच्य मम वक्षसि सप्रेम पिनद्धा । इत्थं निजाद्धासनोपवेशनेन, प्रार्थ्यमानं प्रियमपि पुत्रमुपेक्ष्य स्ववक्षस उन्मुच्य मम कण्ठे मन्दारमाला समर्पणेन भगवता वाढमहं सत्कृतोऽस्मीतिभावः अत्रोदात्तानुप्रासपरिकरालङ्कारा उपजातिवृत्तञ्च ॥ २ ॥
**मातलिः—**किमिव नाम = कि तत् अमरेश्वरात् = देवेन्द्रात् आयुष्मान् = भवान् नार्हति = न प्राप्तुमर्हति ? सर्वं ततः प्राप्तुमर्हति भवानित्याशयः । पश्य = विलोकय । स्फुटयति—सुखपरस्येति ।
**अन्वयः—**अधुना नतपर्वभिः तव शरैः पुरा च पुरुषकेसरिणः नखैः उभयैः सुखपरस्य हरेः त्रिदिवम् उद्धृतदानवकण्टकं कृतम् ॥ ३ ॥
महेन्द्र द्वारा जातमातः सत्कारं बहुमन्यानं दुष्यन्तमिन्द्रसारथिर्मातलिरभिधत्ते—सुखपरस्येति । अधुना = साम्प्रतम् नतपर्वभिः नतानि = अनुन्नतानि पर्वाणि = ग्रन्थयो येषां ते तैः। नतपर्वभिः = नतग्रन्थिभिः तव = भवतः शरैः = बाणैः पुरा च पूर्वं च कृतयुगे पुरुषकेसरिणः नरसिंहस्य भगवतो नारायणस्य नखैः = नखरैः उभयैः = पूर्वोक्तैः द्विप्रकारकैः उपायैः सुखपरस्य–सुखं = आनन्दः परं = सर्वोत्कृष्टं वस्तु यस्य सः
मेरा देवता सा सत्कार हुआ । आसपास में आसन न देकर अपनी गद्दी का आधा भाग देकर मेरे प्रति विशेष सम्मान दिखाया गया । फिर भी मैं बैठ नहीं रहा था, किन्तु जबदस्ती बैठाकर मेरा अभूतपूर्व सम्मान हुआ । पास में ही बैठा हुआ इन्द्र का परम प्यारा पुत्र जयन्त चाह रहा था कि यह दिव्य मन्दार की माला मुझे पहना दी जाय, पर इन्द्र ने उसे न पहनाकर मुझे पहना दिया ।
स्वर्ग में जो चन्दन है, उसे हरिचन्दन कहते हैं, क्योंकि वह हरि = इन्द्र को अधिक प्रिय है गद्मपुराण के अनुसार हरिचन्दन एक विशेष प्रकार का लेप है, इसके बनाने की विधि इस प्रकार है—
धृष्टं च तुलसी काष्ठं कर्पूरागुरुयोगतः । अथवा केसरैर्योज्यं हरिचन्दनमुच्यते ॥ १२।७
स्वर्ग के पाँच वृक्षों में मन्दार एक है, इन पांच वृक्षों के नाम हैं—मन्दार, पारिजात, सन्तान, कल्पवृक्ष और हरिचन्दन, जैसे-'पञ्चैते देवतरवः मन्दार परिजातकः । सन्तानः कल्पवृक्षश्च पुंसि वा हरिचन्दनम् ।'
इस प्रकार इन्द्र के वक्षस्थल पर हरिचन्दन का लेप और मन्दारमाला, सर्वदा बनी रहती है । वे उनके सौभाग्य के सूचक हैं ।
**मातलि—**ऐसा कौन सा सत्कार है जिसे आप अमरेश्वर इन्द्र से पाने के अधिकारी नहीं हैं ! क्योंकि देखिए—
दिव्य सुखों के उपभोग में संलग्न इन्द्र के स्वर्ग को दानव रूप कण्टकों से विहीन इन दोनों ने ही तो किया है, एक तो इस समय आपके नतपर्व गाँठ पर झूले हुए इन बाणों ने और दूसरे पूर्वकाल में पुरुषोत्तम भगवान् नृसिंह के तीखे-तीखे नखों ने ॥ ३ ॥
**विशेष—**देवराज इन्द्र हमेशा सुखोपभोगी हैं । अतः वे अपना कार्य अपने लघुभ्राता उपेन्द्र विष्णु या राजा दुष्यन्त से सिद्ध कराते रहते हैं । यहाँ मातलि ने राजा दुष्यन्त को विष्णु के समान