अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ || अभिज्ञानशाकुन्तलम्
राजा—अत्र खलु शतक्रतोरेव महिमा स्तुत्यः।
सिद्ध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि यन्नियोज्याः
संभावनागुणमवेहि तमीश्वराणाम्।
किं वाऽभविष्यदरुणस्तमसां विभेत्ता
तं चेत्सहस्रकिरणो धुरि नाकरिष्यत् ॥ ४ ॥
तादृशस्य हरेः = इन्द्रस्य त्रिदिवं = स्वर्गं उद्धृताः = उदगताः दानवाः = दनुजा एव कण्टकाः = शत्रवः यस्मात् तत् उद्धृतदानवकण्टकं = समूलोन्मूलित राक्षसरूपकण्टकम् कृतं = विहितम्। पुरा युगे भगवतो नृसिंहस्य नखैः, इदानीं तु त्वदीयशरैः स्वर्गस्य कण्टकरूपा इन्द्रशत्रवो दूरी कृताः। अत एवेन्द्रो निरन्तरं सुखमनुभवति। अत एवा-मरेन्द्रो भवत। साहाय्येनेव निष्कण्टकं राज्यमुपभुङ्क्ते। अथाप्यद्यत्वे प्रत्यग्रमुपकृतवते भवते न किमप्यदेयमस्ति मघोन इति भावः।
अत्र तुल्ययोगितोपमानुप्रासा अलङ्कारा। द्रुतविलम्बितं च वृत्तम्।
राजा—अत्र = अस्मिन् विषये मम बाणैः कण्टकोद्धारे खलु = निश्चयेन नूनं शतक्रतोः इन्द्रस्य एव महिमा = महत्ता प्रभावः स्तुत्यः = प्रशंसनीयः मम विजयोऽपीन्द्रस्यैव प्रसादा-दित्यत्र मम का स्तुतिरितिभावः।
अन्वयः—महत्स्वपि कर्मसु नियोज्याः सिद्ध्यन्ति (इति) यत् तम् ईश्वराणां संमवनागुणम् अवेहि। अरुणः तमसां विभेत्ता किं वाऽभविष्यत् चेत् सहस्रकिरणः तं धूरि न अकरिष्यत्।
आत्मना कृते दुर्जयदानवानामुद्धरणे न किञ्चिदात्मीयं गौरवमपितु तस्यैवेन्द्रस्यायं प्रभाव इति सविनयं कथयन् राजा दुष्यन्तो मातलिं ब्रवीति — सिद्ध्यन्तीति। महत्स्वपि
तथा उनके बाण को नाखून के समान बताया, जिसका अभिप्राय है कि जिस प्रकार गड़ा काँटा नाखून से निकाल दिया जाता है, उसी प्रकार राजा के बाणों और नृसिंह के नखों से दानव उखाड़ फेंक दिये गये। इस प्रकार दानव तथा कण्टक, बाण एवं नखों के साथ समता दिखाई गयी है। सत्युग की बात है कि दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु ने इन्द्र को सिंहासनच्युत करके स्वयं स्वर्ग का राजा बन त्रिलोकी में त्राहि, त्राहि मचा दी थी। परिणाम स्वरूप भगवान् विष्णु ने नृसिंह का रूप धारण कर अपने नखों से उसके वक्षःस्थल को विदीर्ण कर उसका वध हो जानेपर स्वर्ग को निष्कण्टक कर दिया था। जिस प्रकार नृसिंह ने इन्द्रपर कृपा की थी, उसी प्रकार दुष्यन्त ने भी की है। दोनों समान रूप इन्द्र के उपकारी हैं।
राजा—मैंने जो दुर्जय दुर्दान्त उन असुरों का वध किया है, इसमें तो इन्द्र की ही महिमा है, क्योंकि देखिए—
बड़े-बड़े कार्यों में जो सेवक सफल हो जाते हैं, ऐसे मालिकों के प्रभाव का ही फल समझना चाहिए, क्या सूर्य के सारथी अरुण अन्धकार को दूर करने में कभी समर्थ हो सकते थे, यदि सूर्य उन्हें अपने रथ पर न आगे बैठाते ॥ ४ ॥
विशेष—तात्पर्य यह है कि सूर्य की कृपा के बिना अरुण कभी अन्धकार दूर करने में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए मैंने जो असुर का वध किया है, वह इन्द्र की कृपा और प्रभाव का ही फल है। सूर्य के सारथी का नाम अरुण है, वे विनता के पुत्र और गरुड़जी के भ्राता हैं, वे पंगु=पैर रहित हैं। उनमें स्वतः अन्धकार दूर करने की क्षमता नहीं है, पर उनके पीछे अनन्त