अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ३७३
**राजा—**तेन ह्यनतिक्रमणीयानि श्रेयांसि। प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्तं गन्तु-
मिच्छामि।
**मातलिः—**प्रथमः कल्पः। (नाट्येनावतीर्णौ)
**राजा—**तेन हि निमित्तेन यतोऽत्र प्रजापतिस्तपश्चरन्नास्ते ततः अनतिक्रमणीयानि = अनुल्लङ्घनीयानि, अतिक्रम्य गन्तुमनर्हाणि श्रेयांसि शुभानि श्रीमन्तं भगवन्तं कश्यपम्। प्रदक्षिणीकृत्य = प्रदक्षिणक्रियया प्रपूज्य गन्तुमिच्छामि गृहं यातुं कामये। उक्तञ्च—
मृदङ्गं दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम्।
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रख्यातं च तपस्विनम्॥
**मातलिः—**राजोक्तं मातलिंरनुमोदते—आयुष्मन्! प्रथमः कल्प = मुख्यः पक्षः श्रेष्ठो विधिः अयमुत्तमो विधिः 'मुख्यः स्यात् प्रथमः कल्पः' इत्यमरः। नाटयेन = अभिनयेन अवतीर्णौ = अवतरणमभिनीय स्थितौ।
विष्णु पुराण में मेरु दक्षिण भारतवर्ष से आरम्भ कर उत्तरोत्तर किंपुरुष वर्ष तथा हरिवर्ष कहा गया है—
प्रथमं भारतं वर्षं ततः किंपुरुषं स्मृतम्।
हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विजाः॥
इसी प्रकार विष्णुपुराण में जहाँ भारतवर्ष के बाद किंपुरुष वर्ष की चर्चा की गई है, वहीं हिमालय के बाद हेमकूट तथा निषध पर्वत को भी चर्चा है—
हिमवान् हेमकूटश्च निषधस्तस्य दक्षिणे।
स्वयम्भू शब्द का अर्थ है—अपने आप उत्पन्न। यह ब्रह्माजी का पर्यायवाची है। सृष्टिरचना के आदि में ब्रह्माजी ने जिन्हें अपने मन की इच्छा से उत्पन्न किया, उन्हें मानसपुत्र कहते हैं। वे मानसपुत्र भी प्रजा (सन्तान) के आदि कारण होने से प्रजापति कहे जाते हैं। ब्रह्माजी के मानस- पुत्रों में महर्षि मरीचि एक हैं, उनके पुत्र का नाम कश्यप हैं। ये सभी अग्रिम प्रजाओं की उत्पत्ति या कारण होने से प्रजापति कहलाते हैं—
अपरं प्रजानां पतयस्तान् शृणुध्वमतन्द्रिताः॥
कर्दमः कश्यपः शेषो विक्रान्तः सुश्रवास्तथा।
इत्येवमादयोऽन्येऽपि बहवश्च प्रजेश्वराः॥
**राजा—**तो कल्याणकारक वस्तुओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। अतः पूज्य महर्षि कश्यप की प्रदक्षिणा करके ही यहाँ से आगे बढ़ना चाहता हूँ।
**विशेष—**महर्षि कश्यप इन्द्र सूर्य, विष्णु आदि देवताओं के पिता होने के कारण देवतः माने जाते हैं। मनुस्मृति में भगवान् मनु ने आदेश दिया है कि मृदङ्ग, देवता, ब्राह्मण, घी, मधु, चौराहे तथा वृक्षों की परिक्रमा करके ही आगे बढ़ना चाहिए—
मृदङ्गं दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम्।
प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन्॥
इस प्रकार कल्याणकारक मङ्गलप्रद व्यक्ति या वस्तुओं के मिलने पर, प्रणाम, प्रदक्षिणा आदि करके ही आगे बढ़ने का विधान है। इसका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को सुख का भागी होना सम्भव नहीं है। इसीलिए धर्मात्मा राजा दुष्यन्त महर्षि कश्यप को प्रणाम करके ही आगे बढ़ना चाहते हैं।
**मातलि—**आपका यह उत्तम विचार है (अभिनयपूर्वक दोनों उतरते हैं।)