अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ || अभिज्ञानशाकुन्तलम्
राजा—( सविस्मयम् )
उपोढशब्दा न रथाङ्गनेमयः प्रवर्तमानं न च दृश्यते रजः । अभूतलस्पर्शतया निरुद्धस्तवावतीर्णोऽपि रथो न लक्ष्यते ॥ १० ॥
अन्वयः—अभूतलस्पर्शतया रथाङ्गनेमयः उपोढशब्दा न, रजश्च प्रवर्तमानं न दृश्यते, निरुद्धः तव रथः अवतीर्णोऽपि न लक्ष्यते ।
अवतरणे विस्मयमनुभवन् राजा दुष्यन्त मातलि वदति—उपोढशब्दा इति । भुवः तलं भूतं भूतलस्य = पृथिव्याः स्पर्शः = संसर्गः इति भूतलस्पर्शः अविद्यमानः भूतल-स्पर्शः = भूमिसम्पर्कः यस्य स अभूतलस्पर्शः तस्य भावः तत्ता तया अभूतलस्पर्शतया = भूमिसम्पर्कविरहात् रथाङ्गानां = चक्राणां नेमयः = प्रधयः इति रथाङ्गनेमयः उपोढ-शब्दाः = प्रारब्धाः शब्दाः स्वना यैस्ते उपोढशब्दाः न भवन्ति येनाहं शब्दविरामात् क्रान्तः पन्था इति वक्तुं शक्नुयाम् । रजश्च रथोद्भूतो धुलिश्च प्रवर्तमानं चक्रैरश्वखुरै-श्चोत्क्षिप्तं सत् प्रसर्पन् न दृश्यते = नावलोक्यते येन रजसां प्रवृत्तिं दृष्ट्वा गगननिवृत्तिं जानीयाम् निरुन्धतः = रथवेगं स्तम्भयतः भूतलस्पर्शं विना स्तम्भितत्वात् तव = मातलेः रथः = स्यन्दनः, अवतीर्णोऽपि = स्वर्गमार्गात् हेमकूटशिखरमुपगतोऽपि न लक्ष्यते, अवतीर्ण इति न ज्ञायते ।
अर्थ भावः—राज्ञा दुष्यन्तोऽब्रवीत् मातले ! लोकोत्तरमाश्चर्यजनकं ते रथसञ्चाल-नस्य चातुर्यं भूतलस्पर्शाभावात् रथसंचालनचातुर्याच्च सर्वमेव विलक्षणं प्रतीयते अहो आश्चर्यम् । अत्र विशेषोक्ति-काव्यलिङ्गावलङ्कारौ वंशस्थं वृत्तञ्च ॥ १० ॥
राजा—( आश्चर्यपूर्वक ) हे मातले !
आपके रथ पहियों के नीचे का हिस्सा तो बिलकुल ही शब्द नहीं करता, भूमि से धूल भी उड़ती नहीं दिखाई पड़ती है, और उबड़-खाबड़ जमीन पर हचक न लगने से आपका रथ भूतल पर उतरा हुआ भी नहीं प्रतीत होता है ॥ १० ॥
**विशेष—**तात्पर्य यह है कि जितने भी रथ हैं वे सभी जब भूमि पर चलते हैं तब उसमें खड़-खड़ाहट होती है, धूलि उड़ती है ऊँची नीची जगहों में धक्के भी लगते हैं, किन्तु आपका यह दिव्य रथ इन बातों से रहित है । अतः पृथ्वी पर उतरने पर भी यह पृथ्वी में उतरा हुआ-सा प्रतीत नहीं होता । देवताओं के पैर और रथों के पहिए भूमि से स्पर्श नहीं करते, किन्तु वे सदा भूमि से ऊँचे उठे रहते हैं । इस प्रकार देवराज का रथ हमेशा भूमि से एक दो फुट ऊपर ही रहता है । अतः भूतल से उसके स्पर्श का प्रश्न ही नहीं उठता । भूतल का स्पर्श न होना, रथ की नेमि की खड़-खड़ाहट न होना और धूलि का न उड़ना ये तीनों इन्द्र के रथ की विशेषताएँ हैं ।
महाभारत के वनपर्व नलोपाख्यान के प्रसंग में दमयन्ती स्वयम्बर के अवसर पर बताया गया है कि देवताओं का स्पर्श पृथ्वी से नहीं होता । दमयन्ती ने देखा कि नल का रूप धारण कर बैठे हुए पाँचों देवता स्वेद-रहित हैं, उनके अङ्ग में पसीने की बूँदें नहीं हैं, उनकी आँखों की पलकें नहीं गिरतीं न तो उनकी माला मुरझाती है, न उन पर धूलिकण पड़ते हैं । वे सिंहासनों पर बैठे हैं, किन्तु उनके पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं है—
सापश्यत विबुधान् सर्वानस्वेदानस्तब्धलोचनान । हृषितस्रग्रजोहीनान स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ॥ ५७।२७