अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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सप्तमोऽङ्कः
तापसी—होदु । ण मं अअं गणेदि । ( पार्श्वमवलोकयति ) को एत्थ इसि-कुमाराणं ? ( राजानमवलोक्य ) भद्दमुह एहि दाव । मोए हि इमिणा दुम्मोअहत्थ-गहेण डिंभलीलाए बाहीअमाणं बालमिइदं । [ भवतु । न मामयं गणयति । कोऽत्र ऋषिकुमाराणाम् । भद्रमुख, एहि तावत् मोचयानेन दुर्मोकहस्तग्रहेण डिम्भलीलया बाध्यमानं बालमृगेन्द्रम् । ]
राजा—( उपगम्य सस्मितम् ) अयि भो महर्षिपुत्र ।
एवमाश्रमविरुद्धवृत्तिना ^१संयमः किमिति जन्मतस्त्वया ।
सत्त्वसंश्रयसुखोऽपि दूष्यते कृष्णसर्पशिशुनेव ^२चन्दनम् ॥ १८ ॥
तापसी—भवतु = अस्तु तावत् अलं न माभू अयं बालः गणयति = किमपि मद्वचनं न शृणोति, नायं सिंहशिशुं मुञ्चति मामनादृत्य केसरिकिशोरेण क्रीडां करोति । बालकं स्वयं वारयितुमशक्ता पार्श्वमालोक्य मुनिकुमारानाह्वयति—मुनिपुत्राणां = ऋषिकुमाराणां मध्ये कोऽत्र = समीपेऽस्माकं तिष्ठति स सिंहशावकमोचनाय सर्वदमनवारणार्थं चायातु । भद्रमुख ! सौम्य ! 'सौम्य भद्रमुखेत्येवं वाच्यो राजसुतौ भवेत्' इत्यभियुक्तोक्तेः । दुर्मोक-हस्तग्रहेण दुर्मोकः = मोचयितुमशक्यः हस्तेन ग्रहः = ग्रहणं मुष्टिः यस्य स तेन दुर्मोकहस्त-ग्रहेण दृढतरमुष्टिबद्धशालिना अनेन बालकेन डिम्भलीलया = बालसुलभक्रीडया बाध्य-मानं = पीड्यमानं बालमृगेन्द्रं = सिंहशिशुं मोचय तावदित्यर्थः ।
राजा—( उपगम्य सस्मितं— ) अयि = भोः महर्षिपुत्र = मुनिकुमार ।
अन्वयः—एवम् आश्रमविरुद्धवृत्तिना त्वया जन्मतः सत्त्वसंश्रयसुखोऽपि संयमः कृष्णसर्पशिशुना चन्दनं इव किमिति दूष्यते ॥ १८ ॥
तपस्विन्या बालककरात् केसरिकिशोरकं मोचयितुं अभ्यर्थितो राजा दुष्यन्तः शिशोः समीपं गत्वा सस्मितं ब्रूते—एवमिति । एवं = अनेन प्रकारेण सिंहं शिशुपीडनादिना आश्रमविरुद्धवृत्तिना—आश्रमस्य = तपोवनस्य विरुद्धा = प्रतिकुला वृत्तिः = व्यापारो
तापसी—अच्छा यह मुझको कुछ भी नहीं समझ रहा है ( अगल बगल देखकर ) यहाँ कौन ऋषिकुमार है ! ( राजा को देखकर ) भले मानुष ! जरा आप ही इधर आ जाइए । बाल-क्रीडा के द्वारा परेशान किये जाते हुए इस सिंह शावक को इस बालक के हाथों से छुड़ा दीजिए, मुझसे यह नहीं छुड़ाया जा सकता है, क्योंकि इसने बच्चे को जोर से पकड़ रखा है ।
राजा—( पास में जाकर मुस्करा कर ) हे महर्षिपुत्र !
इस आश्रम के विपरीत आचरण से तुम्हारे द्वारा जन्मकाल से ही, जीवों का आश्रय देने के कारण सुखप्रद संयम-प्रधान आश्रम को काले सांप के बच्चे द्वारा चन्दन वृक्ष की तरह क्यों दूषित किया जा रहा है ? अर्थात् जैसे काले नाग का छोटा बच्चा भी जन्म से ही चन्दन-वृक्ष को दूषित कर देता है, वैसे ही तू भी अपने जन्म से ही इस तपोवन के विरुद्ध वृत्ति धारण कर प्राणिमात्र को अभय देने वाली प्रशंसनीय शान्ति को क्यों दूषित कर रहा है ? ॥ १८ ॥
विशेष—यहां जन्मतः का अर्थ बचपन है । शेर के बच्चे को कष्ट देना हिंसा है, जो आश्रम के संयम = अहिंसा आदि के विरुद्ध है । संयम और चन्दन की तुलना है । शीतलता के कारण प्राणी चन्दन के आश्रम से सुख पाता है. पर सर्प उससे लिपटकर प्राणियों को काट लेता है ।
पाठा०—१. संयमी । २. चन्दनः ।