अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
DevanagariHindipublished262 पृष्ठ
पृष्ठ 255, कुल 262 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 255
अभिज्ञानशकुन्तलम् परिशिष्ट-1 241
| सं० | चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टाः श्लोकाः ।। | अङ्कः | क्रमः | पृष्ठांकः |
|---|---|---|---|---|
| 114 | त्रिस्रोतसं वहति यो गगनप्रतिष्ठां० | 7 | 6 | 221 |
| 115 | त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं० | 3 | 29 | 148 |
| 116 | तन्मतिः केवला तावत् प्रतिपाल० | 6 | 38 | 219 |
| 117 | त्वमर्हतां प्राग्रहरः स्मृतो० | 5 | 16 | 182 |
| 118 | दर्भाङ्कुरेण चरणः क्षत० | 2 | 13 | 129 |
| 119 | दर्शनसुखमनुभवतः साक्षादिव० | 6 | 24 | 211 |
| 120 | दिष्ट्या शकुन्तला साध्वी० | 7 | 29 | 233 |
| 121 | दीर्घापाङ्गविसारिनेत्र० | 6 | 15 | 206 |
| 122 | दुःषन्तेनाहितं तेजो दधानां० | 4 | 6 | 162 |
| 123 | धर्म्यास्तपोधनानां प्रतिहतविघ्नाः० | 1 | 12 | 102 |
| 124 | न खलु न खलु बाणः संनिपात्यो० | 1 | 10 | 101 |
| 125 | न तिर्यगवलोकितं भवति चक्षु० | 5 | 24 | 187 |
| 126 | न नमयितुमधिज्यमुत्सहिष्ये० | 2 | 3 | 123 |
| 127 | नियमयसि विमार्गप्रस्थिता० | 5 | 7 | 177 |
| 128 | निराकृतनिमेषाभिर्नेत्रपंक्ति० | 2 | 8 | 126 |
| 129 | नीवाराः शुककोटरार्भकमुख० | 1 | 13 | 103 |
| 130 | नैतच्चित्रं यदयमुदधि० | 2 | 16 | 130 |
| 131 | परिग्रहबहुत्वे पि द्वे प्रतिष्ठे० | 3 | 23 | 144 |
| 132 | पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं० | 4 | 11 | 166 |
| 133 | पादन्यासं क्षितिधरगुरोर्मूर्ध्नि० | 4 | 5 | 159 |
| 134 | पिपासाक्षामकण्ठेन याचितं० | 3 | 33 | 149 |
| 135 | पुडइणिवत्तन्तरिअं वाहरिओ० | 4 | 18 | 170 |
| 136 | पुत्रस्य ते रणशिरस्ययम० | 7 | 26 | 232 |
| 137 | पृष्ट्य जनेन समदुःखसुखेन० | 3 | 13 | 139 |
| 138 | प्रजाः प्रजाः स्वा इव तन्त्रयित्वा० | 5 | 3 | 175 |
| 139 | प्रजागरात् खिलीभूत० | 6 | 25 | 211 |
| 140 | प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधि० | 6 | 6 | 200 |
| 141 | प्रथमं साराङ्गाक्ष्या प्रियया० | 6 | 7 | 200 |
| 142 | प्रलोभ्यवस्तुप्रणयप्रसारितो० | 7 | 16 | 225 |
| 143 | प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः० | 7 | 35 | 236 |