भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)

प्राणेश्वरी, प्राणरूपा, प्रधानपुरुषेश्वरी, सर्वशक्ति, कला काष्ठा, चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना ७०, महिमाके स्थानवाली ॥ २५ ॥ सब कार्यकी नियंत्री, सर्वभूतेश्वरोंकी ईश्वरी, अनादि, अव्यक्तगुण, महानंदा, सनातनी ॥ २६ ॥

आकाशयोनियोंनस्था सर्वयोगेगेश्वरेश्वरी ॥ ८० ॥ शवासना चितांतःस्था महेशी वृषवाहना ॥ २७ ॥ बालिकातरुणी वृद्धा वृद्धमाता जरातूरा ॥ महामाया ९० सुदुष्पूरा मूलप्रकृतिरीश्वरी । २८ ।

आकाशसे उत्पन्न होनेवाली, योगमें स्थित सर्वयोगेश्वरोंकी ईश्वरी ८०, शवासना, चिताके अंतमें स्थित, महेशी, वृषवाहनवाली ॥ २७ ॥ बालिका, तरुणी, वृद्धा, वृद्धमाता, जरासे आतुर महामाया ९०, सुदुष्पूर, मूलप्रकृति, ईश्वरी ॥ २८ ॥

संसारयोनिःसकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ॥ संसारसारा दुर्बारा दुर्निरीक्ष्यादुरासदा १०० । २९ ॥ प्राणशक्तिः प्राणविद्यायोगिनीपरमा कला ॥ महाविभूतिर्दुर्घर्षा मूलप्रकृतिसम्भवा ॥ ३० ॥

संसारयोनि, सर्वस्वरूपा, सब शक्तिसे उत्पन्न होनेवाली, संसारसारा, दुर्बारा, कठिनतासे नेत्रगोचर होनेवाली, दुरासद १०० ॥ २९ ॥ प्राणशक्ति, प्राणविद्या, योगिनी, परमा, कला, महाविभूति, दुर्धर्षा मूलप्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाली ॥ ३० ॥

अनाद्येनन्तविभवा परात्मा पुरुषो बली ॥ ११० ॥ सर्गस्थित्यंतकरणी सुदुर्वाच्या दुरत्यया ॥ ३१ ॥ शब्दयोनिश्र्शब्दमयी नादाख्या नादविग्रहा ॥ प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥

अनादि अनंत ऐश्वर्यंवाली, परमात्मा, पुरुष, बली ११० सृष्टिकी स्थिति और अंत करनेवाली, कहनेमें न आनेवाली, दुरत्यय ॥ ३१ ॥ शब्दसे उत्पन्न होनेवाली, शब्दमयी, नाद नामवाली, तथानादविग्रहवाली, प्रधानपुरुषसे परे, प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥

पुराणी १२० चिन्मयी पुंसामादिः पुरुषरूपिणी ॥ भूतांतरात्मा कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ॥ ३३ ॥ जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिसमन्विता ॥ व्यापिनी चानवच्छिन्ना १३० प्रधाना सुप्रवेशिनी ॥ ३४ ॥

पुराणी १२० चिन्मयी, पुरुषोंमें आदि पुरुषके रूपवाली, भूतांतरात्मा, महापुरुष नामवाली ॥ ३३ ॥ जन्म मृत्यु जरासे परे, सब शक्तिसे संयुक्त, व्यापिनी, अनवच्छिन्ना १३०, प्रधानमें प्रवेश करनेवाली ॥ ३४ ॥