अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
(१६२) अद्भुतरामायण [ सप्तविंशति
मन्दोदरीके गर्भसे जानकीका जन्म, रामचन्द्रका भार्गवको विश्वरूप दिखाना ॥ २५ ॥ ऋष्यमूकमें हनुमानजीको चतुर्बाहुरूप दर्शन देना और भिक्षुरूपसे महाराजसे मिलकर सुग्रीवकी मित्रता करानी ॥ २६ ॥
लक्ष्मणांगजतापेन शोषणं वारिधेः पुनः ॥ प्राप्तराज्यस्य रामस्य मुनीना सन्निधौ तथा ॥ २७ ॥ सीतायाः कथनं श्रुत्वा सहस्रास्यस्य रक्षसः ॥ मानसोत्तरशैलेदे स्थितिं ज्ञात्वा रघूद्वहः ॥ २८ ॥
फिर लक्ष्मणके अंगसे उत्पन्न हुए तापसे सागरको सुखाना, फिर राज्य प्राप्त होकर मुनियोंके निकटमें ॥ २७ ॥ जानकीसे सहस्रमुखी रावणका वृत्तान्त सुनकर और उसकी स्थिति मानसके उत्तर भागमें जानकर ॥ २८ ॥
जगाम पुष्करद्वीपं भ्रातृभि सह वानरैः ॥ सीताया ऐश्वरं रूपं रावणस्य वधस्तथा ॥ २९ ॥ अयोध्यागमनं रामस्यैष वृत्तान्त संग्रहः ॥ वृत्तान्तसंग्रहं चापि पठित्वा रामभक्तिमान् ॥ जायते मुनिशार्दूल नात्र कार्या विचारणा ॥ ३० ॥
रामचन्द्र भाइयों सहित पुष्करद्वीपको गये, सीताका ईश्वर सम्बन्धी रूप और सहस्रमुख रावणका वध ॥ २९ ॥ फिर अयोध्यामें आगमन रामवृत्तांत-संग्रह है, राममें भक्ति करनेवाला इसही वृत्तान्तको पाठकर रघुनाथमें भक्ति-मान् होता है, हे मुनिराज ! इसमें सन्देह नहीं ॥ ३० ॥
पठेच्च यो रामचरित्र मेतत्पुनाति पापात्सुकृतं लभेत ॥ तीर्था-भिषेकं समरे जयं च स सर्वयज्ञस्य महत्फलं च ॥ ३१ ॥ भजेत यो राममर्चित्यरूपमेकेन भावेन च भूमिपुत्रीम् ॥ एतत्सुपुण्यं शृणुयात्प-ठेद्वा भूयो भवेन्नो जठरे जनन्याः ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥
जो कोई इस रामचरित्रको पढता हैं, वह तरकर सुकृत को प्राप्त होता है; तीर्थका अभिषेक, समरमें जय और सब यज्ञका महाफल प्राप्त करता है ॥ ३१ ॥ जो अचिन्त्यरूप रामका भजन करता है वा एक भावसे जानकीका भजन करता है, इस पवित्र ग्रन्थको सुनता व पढता हैं वह फिर माताके गर्भमें स्थित नहीं होता, मुक्त हो जाता है ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डेमुरादाबादनिवासी पं. सुखानन्दमिश्रात्मज पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥
श्लोकसंख्या १३५३.
वाल्मीकी नारद ऋषी, महावीर शिर नाय ॥
बूझी कुलगुरु शिव शिवा, गणपति गिरा मनाय ॥ १ ॥
रामचरित भाषा कियो, द्विज ज्वालापरसाद ॥
पढहिं सुनहिं सुख लहहिं जन, ऋषियनको संवाद ॥ २ ॥
राम लषण सीता भरत, रिपुहन पवनकुमार ॥
प्रेम सहित वन्दहुँ चरण, हितकृत वारंवार ॥ ३ ॥
कृपादृष्टिकी वृष्टि जिमि, करत हमारी ओर ॥
तैंसिय कीजै नित्य प्रति, दयादृगनकी कोर ॥ ४ ॥
संवत गुणशरअंकविधु, भाद्रशुक्ल रविवार ॥
सुखदायक तिथि सप्तमी, पूरचो ग्रन्थविचार ॥ ५ ॥
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
| खेमराज श्रीकृष्णदास, <br> 'श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> खेतवाड़ी-बम्बई. | गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, <br> 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> कल्याण-बम्बई. |
श्री १०८ अवधड़ पीर बाबा नारायण
का धर्म पूत बाबा भूतनाथ अवधड़
श्री गुरु स्थान- ग्राम मल्हापुर
डा० सिरसगंज
जि० मैनपुरी
जन्म तिथि पूर्णिमा अगहन १९६५
बुद्धवार
बुक-पोस्ट
शुभविवाह
तिलकोत्सव एवं प्रीतिभोज
दिनांक-11 मई 2013, शनिवार
(सायं 6 बजे से आपके आगमन तक)
सपरिवार
[श्री]राम पोरेवाल जी (कामरेड)
इटावा
R.P.B.
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