भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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सर्ग ७ ] 'अयोध्याकाण्ड ७९


साष्टाङ्गं प्रणिपातं मे ब्रूहि श्वश्वोः पदाम्बुजे ।
इति प्ररुदती सीता गता किञ्चिदवाङ्मुखी ॥१३॥
ततस्तेऽश्रुपरीताक्षा नावमारुरुहुस्तदा ।
यावद्गङ्गां समुत्तीर्य गतास्तावदहं स्थितः ॥१४॥
अतो दुःखेन महता पुनरेवाहमागतः ।
ततो रुदन्ती कौसल्या राजानमिदमब्रवीत् ॥१५॥
कैकेय्यै प्रियभार्यायै प्रसन्नो दत्तवान्वरम् ।
त्वं राज्यं देहि तस्यैव मत्पुत्रः किं विवासितः ॥१६॥
कृत्वा त्वमेव तत्सर्वमिदानीं किं नु रोदिषि ।
कौसल्यावचनं श्रुत्वा क्षते स्पृष्ट इवाग्निना ॥१७॥

पुनः शोकाश्रुपूर्णाक्षः कौसल्यामिदमब्रवीत् ।
दुःखेन म्रियमाणं मां किं पुनर्दुःखयस्यलम् ॥१८॥
इदानीमेव मे प्राणा उत्क्रमिष्यन्ति निश्चयः।
'शप्तोऽहं बाल्यभावेन केनचिन्मुनिना पुरा ॥१९॥
पुराहं यौवने दृप्तश्चापबाणधरो निशि ।
अचरं मृगयासक्तो नद्यास्तीरे महावने ॥२०॥
तत्रार्धरात्रसमये मुनिः कश्चित्तृषार्दितः ।
पिपासार्दितयोः पित्रोर्जलमानेतुमुद्यतः ।
अपूरयज्जले कुम्भं तदा शब्दोऽभवन्महान् ॥२१॥
गजः पिबति पानीयमिति मत्वा महानिशि ।
बाणं धनुषि सन्धाय शब्दवेधिनमक्षिपम् ॥२२॥
हा हतोऽस्मीति तत्राभूच्छब्दो मानुषसूचकः ।
कस्यापि न कृतो दोषो मया केन हतो विधे ॥२३॥
प्रतीक्षते मां माता च पिता च जलकाङ्क्षया ।
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तस्ततोऽहं पौरुषं वचः ॥२४॥
शनैर्गत्वार्थ तत्पार्श्व स्वामिन् दशरथोऽस्म्यहम् ।
अजानते मया विद्धस्त्रातुमर्हसि मां मुने ॥२५॥


कमलोंमें मेरा साष्टांग प्रणाम कहना।” ऐसा कह कुछ शिर झुकाकर रोती हुई वे वहाँसे चली गयीं ॥ १३ ॥ इसके पीछे वे सब नेत्रोंमें जल भरे हुए नावपर चढ़े । जबतक वे गङ्गाजीको पार कर उस पार पहुँचे तबतक मैं वहीं खड़ा रहा ॥ १४ ॥ फिर वहाँसे चलकर बड़े दुःखसे मैं यहाँ पहुँचा हूँ।”

तब कौसल्याने रोते हुए राजासे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥ “राजन् ! आपने यदि प्रसन्न होकर अपनी प्रिया कैकेयीको वर दिया तो भले ही आपने उसीके पुत्रको राज्य दिया होता, किन्तु मेरे पुत्रको देशनिकाला क्यों दिया ? ॥ १६ ॥ और अपने आप ही यह सारी करतूत करके अब आप रोते क्यों हैं ?” कौसल्याके ये वचन सुनकर महाराजको ऐसी वेदना हुई मानो घावमें अग्निका स्पर्श हो गया हो ॥ १७ ॥

तब महाराजने नेत्रोंमें शोकाश्रु भरकर कौसल्यासे कहा— “मैं तो आप ही दुःखसे मर रहा हूँ, फिर इस प्रकार मुझे और दुःख क्यों देती हो ? इससे क्या लाभ है ? ॥ १८ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि मेरे प्राण अभी निकलनेवाले हैं। पूर्वकालमें मेरी मूर्खताके कारण मुझे एक मुनीश्वरने शाप दिया था ॥ १९ ॥

(वह कथा इस प्रकार है—) पहले एक बार मैं युवावस्थाके मदसे उन्मत्त हुआ मृगयामें आसक्त होकर रात्रिके समय धनुष और बाण लिये एक घोर वनमें नदीके किनारे घूम रहा था ॥ २० ॥ उस आधी रातके समय किन्हीं प्यासे मुनीश्वरने अपने तृषित माता-पिताके निमित्त जल ले जानेके लिये जलमें घड़ा डुबोया; उस समय उसका महान् शब्द हुआ ॥ २१ ॥ तब यह सोचकर कि इस घोर रात्रिमें कोई हाथी जल पी रहा है मैने अपने धनुषपर शब्दवेधी बाण चढ़ाकर छोड़ा ॥ २२ ॥ वहाँपर मनुष्यकी सूचना देनेवाला यह शब्द हुआ 'हाय! मैं मारा गया ! हे विधे ! मैंने तो किसीका भी कोई अपराध नहीं किया था, फिर मुझपर यह वार किसने किया ? ॥ २३ ॥ हाय ! मेरे माता-पिता भी जलकी आकांक्षासे मेरी बाट देख रहे होंगे।' यह मानुष-वचन सुनकर मैं अत्यन्त भयभीत हुआ और धीरेसे उनके पास जाकर बोला— “प्रभो ! मैं दशरथ हूँ, मैंने ही अनजानमें यह बाण छोड़ा है; हे मुने ! आप मेरी रक्षा कीजिये” ॥ २४-२५ ॥

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