अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः (39) ततः प्रोवाच रामस्तं पुनरिष्टं यदस्ति ते। ब्रूहीश्वरात्र तद् दास्ये प्रार्थनांदुर्लभं च यत्।।22 ।। इसके बाद श्रीराम ने शिव से कहा- “हे ईश्वर! यदि और भी कोई आपकी इच्छा हो तो यहाँ कहें। प्रार्थना के द्वारा जो दुर्लभ है वह में दूँगा।” इत्युक्तः स पुनर्बत्रे हितं तद् भक्तवत्सलः। सर्वलोकोपकाराय सर्वेषामपि दुर्ल्लभम्।।23।। ये स्वतो वान्यतो वापि यत्र कुत्रापि वा प्रभो। प्राणान् परित्यजन्त्यत्र मुक्तिस्तेषां फलं भवेत्।।24।। विष्णु के द्वारा ऐसा कहने पर भक्तवत्सल भगवान् शिव ने पुनः सबके लिए दुर्लभ और सबके उपकार के लिए कहा- “हे प्रभो! जो स्वाभाविक रूप से या अस्वाभाविक रूप से जिस किसी स्थान में प्राणत्याग करते हैं, उनकी मुक्ति हो।” गंगायां च तटे वापि यत्र कुत्रापि वा पुनः। म्रियन्ते ये प्रभो देव मुक्तिर्नातो वरान्तरम्।।25।। गंगा में या इसके तट पर जहाँ कहीं भी लोगों की मृत्यु हो, वे मुक्ति पायें इसके अतिरिक्त कोई वर नहीं चाहिए। विश्वामित्र्यां च यः स्नात्वा पश्येत् सिद्धेश्वरं सकृत्।¹ ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः।।26।। विश्वामित्र्यां च ये नूनं स्नाति श्रद्धालवः सदा। तेऽपि पापविनिर्मुक्ता यान्ति विष्णोः² परंपदम्।।27।। विश्वामित्र की नदी (कोशी?) में स्नान कर जो सिद्धेश्वर का एकबार भी दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं इसमें सन्देह नहीं। कौशिकी नदी में जो हमेशा केवल श्रद्धापूर्वक स्नान करते हैं, वे भी पाप से मुक्त होकर विष्णु का परम पद प्राप्त करते हैं। श्रीराम उवाच कुरुते मानवो यस्तु कलौ भक्तिपरायणः। कल्पकोटिसहस्राणि रमते सन्निधौ हरेः।।28।। श्रीराम बोले- कलियुग में जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कर्म करते हैं, वे हजारों करोड़ कल्प तक श्रीहरि के समीप रमण करते हैं।
- क. कृती। 2. ख. शम्भोः।