भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

(38) अगस्त्य-संहिता पुण्यतीर्थे च गङ्गायां लोलार्के सूर्यपर्वणि। तस्मै मन्त्रवरं प्रादान्मन्त्रराजं षडक्षरम्।।15।। गंगा के पावन तट पर सूर्यग्रहण के समय जब सूर्य चंचल रहते हैं ऐसे स्थान और समय में ब्रह्मा ने शिव को यह षडक्षर मन्त्र दिया। नियतः सोऽपि तत्रैव जजाप वृषभध्वजः। मन्वन्तरशतं भक्त्या ध्यानहोमार्चनादिभिः।।16।। वृषभध्वज शिव ने भी वहीं नियमपूर्वक भक्तिभाव से ध्यान, होम और अर्चना करते हुए सौ मन्वन्तर तक मन्त्र का जप किया। ततः प्रसन्नो भगवान् रामः प्राह त्रिलोचनम्। वृणीष्व पदमिष्टं¹ ते देवानामपि दुर्ल्लभम्।।17।। तदेवाहं प्रदास्यामि मा चिरं वृषभध्वज। इसके बाद प्रसन्न होकर भगवान् श्रीराम ने भगवान् शंकर से कहा- “हे वृषभध्वज! आप जो स्थान चाहें वह माँग लें। देवताओं के लिए भी जो दुर्लभ है, वही मैं दूँगा! देर न करें।” ततस्तमब्रवीद् विष्णुमीश्वरः परया मुदा।।18।। दर्शनेनैव ते धन्याः कृतार्थाः वै ममेप्सितम्। एते मदीयाः सर्वेऽपि मां परं पर्युपासते ।।19।। मुक्त्यर्थं तत्कुरुष्वैषां तदेवाभिमतं मम।। नातः परतरं किञ्चित् प्रार्थितं मम विद्यते।।20।। इसके बाद परम प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने विष्णु से कहा- “आपके दर्शन से ही हम धन्य हो गये; मेरी इच्छा सफल हो गयी। किन्तु मेरे ये भक्त जो मुझे परम देव मानकर मेरी उपासना करते हैं, इनकी मुक्ति के लिए उपाय करें; यही मेरी इच्छा है। इससे बढ़कर मेरी कोई प्रार्थना नहीं है। एवं वदति तत्रैव तदानीं तदुपासकाः। सर्वे ज्योतिर्मयाः सन्तो विष्णावेव लयं गताः।।21।। ऐसा कहने पर उस समय वहीं पर भगवान् शिव के सभी उपासक ज्योतिःस्वरूप होकर विष्णु में ही लीन हो गये।

  1. ख. यदभीष्टं।