भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 98

सप्तमोऽध्यायः (37) इस प्रकार जब शिव वहाँ रहे थे, तब एक दिन ब्रह्मा पृथ्वी पर आये। उन्हें देखकर भगवान् शिव ने उत्साह से उन्हें प्रसन्न किया और अनेक प्रकार से अभ्यर्थना कर अपना अभीष्ट निवेदित किया। ततः स प्राह भगवानीश्वरस्तं चतुर्मुखम्। कुशलं ननु ते ब्रह्मन् चिराय त्वमिहागतः॥९॥ श्रीमदागमनेनाहं लोकपूज्योऽप्युपासकैः। समाराध्य हि मां भक्तिं प्रार्थयन्ति मुमुक्षवः॥१०॥ केनोपायेन तेषां तत्फलं दास्यामि तद् वद। इसके बाद भगवान् शिव ने ब्रह्मा से कहा- 'हे ब्रह्मा, आप कुशल तो हैं न! बहुत दिनों के बाद यहाँ आये हैं! श्रीमान् के आगमन से आज मैं उपासकों के साथ तीनों लोकों में पूज्य हूँ। मोक्ष चाहनेवाले मेरी आराधना कर भक्ति की प्रार्थना करते हैं, अतः उस भक्ति का फल मोक्ष उन्हें किस प्रकार दूँ, यह बतलाइए। ईश्वरेणैवमुक्तः सन् द्रुहिणोऽपि बभाण ह॥११॥ अस्त्युपायो गोपनीयः प्रादाद् यं मे रघूद्वहः। तपः कृत्वा चिरायाहं तं परं लब्धवान् वरम्॥१२॥ ततोऽन्यो मदभिज्ञातो नास्त्युपायो महेश्वर। मह्यमन्वग्रहीद् रामो न सन्देहोऽस्ति तत्र वै॥१३॥ भगवान् शंकर के ऐसा कहने पर ब्रह्मा भी बोले- “एक ऐसा उपाय है, जो सभी को बतलाया नहीं जा सकता। यह मुझे स्वयं श्रीराम ने बतलाया था, जब मैंने चिरकाल तक तपस्या कर उनसे वर प्राप्त किया था। हे महेश्वर! इससे भिन्न उपाय मेरी जानकारी में नहीं है। मेरे ऊपर श्रीराम ने कृपा की थी, इसमें सन्देह नहीं। ईश्वर उवाच अथ किं मे वदस्वेदं त्वं मां यद्यनुकम्पसे। स तेनाभिहितो दध्यौ क्व कदा युक्तमित्यपि॥१४॥ ईश्वर (शिव) बोले- “यदि मेरे ऊपर कृपा हो तो बतलाइए कि ऐसा कौन-सा उपाय है।” ऐसा कहने पर ब्रह्मा ने सबका बखान किया कि यह मन्त्र कहाँ और किस समय देना चाहिए।