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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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(36) अगस्त्य-संहिता

अगस्त्य उवाच सर्वं तवाभिधास्यामि पुरारेः पुरतः पुरा। ब्रह्मा यदब्रवीत् तत् त्वं शृणुष्वावहितो महत्।।२।। अगस्त्य बोले- प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने भगवान् शंकर के समक्ष जो कुछ कहा था, वह सब माहात्म्य सुनाऊँगा, उसे ध्यान से सुनो। अस्ति वाराणसी नाम पुरी शिवमनेाहरा। सर्वदासौ शिवस्तत्र पार्वत्या सह तिष्ठति।।३।। वाराणसी नाम की वह नगरी है, जो भगवान् शिव के वास करने से मन मोह लेती है। वहाँ भगवान् शिव हमेशा पार्वती के साथ वास करते हैं। तस्याप्युपासकाः सर्वे भक्त्या तं प्रतिपेदिरे। मुमुक्षवः परित्यज्य सर्वं तत्रैव संस्थिताः।।४।। सदा शिव शिवेत्येवं वदन्तः शिवतत्पराः। शिवारर्पितमनःकायवाचः शिवपरायणाः।।५।। भगवान् शिव की आराधना करनेवाले सभी भक्ति-भाव से अनुगमन करने लगे। उस प्रकार मोक्ष की इच्छा करनेवाले सभी अन्य स्थलों को छोड़कर वाराणसी में ही हमेशा 'शिव! शिव' का उच्चारण करते हुए, शिव मे मन, शरीर एवं वाणी को अर्पित कर शिवभक्त होकर रहने लगे। शिवस्तु तान् मुहुः पश्यन्नास्ते चिन्तासमाकुलः। कथमेभ्यः प्रदास्यामि मुक्तिमित्यतिदुःखितः।।६।। तत्रैवास्ते गणैः सार्द्धमृषिभिश्च सुरासुरैः। भगवान् शिव उन्हें बार-बार देखते हुए चिन्तित हो गये कि इन्हें मुक्ति किस प्रकार दूँगा। इस प्रकार वे अत्यधिक दुःखी थे। फिर भी भगवान् शिव सभी गण, ऋषि, देवता एवं असुरों के साथ वहीं रहे। एवं वसति भूर्लोकमाजगाम चतुर्मुखः।।७।। तमीश्वरो निरीक्ष्यैव सम्भ्रमेणाकरोत् प्रियम्। बहु संभावयामास यद्धितं तन्न्यवेदयत्।।८।।


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