अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः (35) तुलसी सन्निधौ प्राणान् ये त्यजन्ति मुनीश्वर। न तेषां नरकक्लेशः प्रयान्ति परमां गतिम्¹ ।।40।। हे मुनिश्रेष्ठ! तुलसी के समीप जो प्राण छोड़ते हैं, उन्हें नरक का क्लेश नहीं होता और वे परम गति को प्राप्त करते हैं। विधेयमविधेयं वा न्यूनमप्यथवाधिकम्। तुलसीदलमादाय रामं ध्यात्वा समर्पयेत् ।।41।। पूजन में जहाँ विधान हो या न हो, अन्य सामग्रियों में न्यूनता या अतिरिक्तता हो, श्रीराम का ध्यान कर तुलसीदल समर्पित करें। 'रामाय नम' इत्येतदच्युताय नमस्ततः। अनन्ताय नमस्तस्मात् प्रणवादि वदेदिदम् ।।42।। कृतं सफलतामेति तुलसीसन्निधौ मुने। पहले 'रामाय नमः' ऐसा कहें; फिर 'अच्युताय नमः' ऐसा कहें, फिर 'अनन्ताय नमः' कहें। इसके बाद प्रणव ॐकार आदि का उच्चारण करें। तुलसी वृक्ष के निकट पूजा आदि कर्म करने से सफलता मिलती है। तदेव पुण्यकालेषु सहस्रगुणितं भवेत् ।।43।। शालग्रामशिलायाश्च तुलसीसन्निधौ मुने। तेषां पुण्यवतां मृत्युस्ते मुक्ता नात्र संशयः ।।44।। यही कर्म शुभ समय में किया जाये, तो हजार गुणा फल मिलता है। तुलसी तथा शालग्राम की शिला के निकट जिस पुण्यवान् व्यक्ति की मृत्यु होती है, वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। इत्यगस्त्यसंहितायाम् परमरहस्ये श्रीतुलसीमाहात्म्यकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ।।6।। अथ सप्तमोऽध्यायः अगस्त्य वद त्वं श्रेष्ठ रामस्य मुनिसत्तम। मन्त्रराजस्य माहात्म्यं यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा ।।1।। सुतीक्ष्ण बोले- हे श्रेष्ठ महामुनि अगस्त्य! श्रीराम के मन्त्रराज का माहात्म्य जो प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने कहा था, वह सुनाइए।
- घ. परमं पदम्।