भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 337 में से

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(34) अगस्त्य-संहिता

जो तुलसी लकड़ी से रुद्राक्ष की तरह माला बनाकर कानों में धारण करते हैं, उनके द्वारा किये गये कार्य कभी नष्ट नहीं होते। संघृष्य तुलसीकाष्ठं यो दद्याद्राममूर्द्धनि। कर्पूरागुरुकस्तूरीचन्दनं च न तत्समम्।।34।। तुलसी की लकड़ी को घिसकर श्रीराम के मस्तक पर लगावें। यह कर्पूर, अगुरु, कस्तूरी और चन्दन भी इसके समान नही है। तुलसीविपिनस्यापि समन्तात्पावनं स्थलम्। क्रोशमात्रं भवत्येव गाङ्गेयस्येव पावनम्।।35।। तुलसी-वन के चारों ओर की भूमि भी पवित्र होती है, जैसे गंगा के तट पर एक कोस तक की भूमि पवित्र होती है। तुलस्या रोपिता सिक्ता दृष्टा स्पृष्टा तु पावयेत्। आराधिता प्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदा।।36।। तुलसी का वृक्ष रोपने से, सींचने से, दर्शन करने से स्पर्श करने से पवित्र कर देता है और यत्नपूर्वक उसकी आराधना करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमाणां विशेषतः। स्त्रीणां च पुरुषाणां च पूजितेष्टं ददाति हि।।37।। चारो वर्णों एवं आश्रमों के स्त्रियों एवं पुरुषों के द्वारा पूजित तुलसी इच्छाओं की पूर्ति करती है। प्रदक्षिणं भ्रमित्वा तु नमस्कुर्वन्ति नित्यशः। न तेषां दुरितं किञ्चित् प्रक्षीणमवशिष्यते।।38।। जो तुलसी वृक्ष के दाहिने से घूमकर प्रतिदिन प्रणाम करते हैं उनके द्वारा किये गये पाप कम होकर भी नहीं रहता अर्थात् समूल समाप्त हो जाता है। अनन्यदर्शनाः प्रातर्ये पश्यन्ति तपोधन। अहोरात्रकृतं पापं तत्क्षणात् प्रदहन्ति ते।।39।। प्रातःकाल किसी दूसरी वस्तु को देखे बिना जो तुलसी का दर्शन करते हैं, उनके द्वारा उस दिन और रात में किये गये पाप भस्मीभूत हो जाते हैं।

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