भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः (33) जिनके कोई गुरु नहीं हैं, अथवा जिन्होंने दीक्षा भी नहीं ली है, न ही पूजा की विधि एवं क्रम जानते हैं, वे भी यदि रामरक्षा-स्तोत्र का पाठ करते हुए तुलसीदल अर्पित करते हैं, तो अन्य प्रकार की हजारों दीक्षा से भी ऐसा फल उन्हें नहीं मिलेगा। दीक्षितेष्वपि सर्वेषु रामदीक्षा तु उत्तमः।।27।। न गुरुर्नैव कालश्च न देवान्तरपूजनम्¹। तुलसीदलयुक्तं च रामार्चनमपेक्षते।।28।। सभी प्रकार के दीक्षितों में श्रीराम की दीक्षा उत्तम है। इसके लिए न गुरु न समय और न अन्य देवताओं की पूजा की अपेक्षा है केवल तुलसीदल से श्रीराम की पूजा करनी चाहिए। निर्माल्यतुलसीमालायुक्तो यद्यर्चयेद्धरिम्। यद्यत्करोति तत्सर्वमनन्तफलदं भवेत्।।29।। यदि कोई भगवान् को समर्पित निर्माल्य तुलसीदल को धारण कर श्रीहरि की अर्चना करता है, तो वह जो जो कार्य करेगा उसे अनन्त फल मिलेगा। यदि न्यूनं भवत्येव रामाराधनसाधनम्। तुलसीपत्रमात्रेण युक्तं तत्परिपूर्यते।।30।। यदि श्रीराम की पूजा-सामग्री में किसी वस्तु की कमी रहे, तो केवल तुलसीदल डाल देने से पूर्ण हो जाता है। शालग्रामशिलायाश्च गङ्गायाश्च तपोधन। तुलस्याश्चैव माहात्म्यं नेष्टो वक्तुं हि विश्वसृक्।।31।। हे तपोधन सुतीक्ष्ण! शालग्राम की शिला, गंगा और तुलसी का माहात्म्य कहने में विश्व के निर्माता ब्रह्मा भी असमर्थ हैं। भवभञ्जनमेतत्ते सर्वाभीष्टं प्रयच्छति। नातः परतरं किञ्चित् पावनं विद्यते भुवि।।32।। तुलसीदल पुनर्जन्म का नाश करनेवाला है तथा सभी कामनाओं की पूर्ति करता है। संसार में इससे बढ़कर पवित्र दूसरा कुछ भी नहीं है। यः कुर्यात् तुलसीकाष्ठैरक्षमालास्वरूपिणीम्। कर्णमालां प्रयत्नेन कृतं तस्याक्षयं भवेत्।।33।।

  1. घ. देवान्तरसेवनम्। Rarest Archiver