भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

(32) ----------------- अगस्त्य-संहिता ----------------- वर्णाश्रमेतराणां च पूजा यस्यैव साधनम्।।२१।। अपेक्षितार्थदं नान्यज्जगतस्वपि तपोधन। वर्णाश्रम धर्म से बहिर्भूत और केवल पूजा को ही मोक्ष का साधन बनानेवाले अर्थात् (दान आदि के अनधिकारी) यतियों के लिए संसार में तुलसीदल को छोड़कर कोई दूसरी वस्तु नहीं है, जिससे उन्हें इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो सके। पूजायोग्यैर्दलैः पत्रैः पुष्पैर्योऽर्चयेद्धरिम्।।२२।। यान्ति¹ न्यूनातिरिक्तानि कर्माणि सफलान्यहो। न तस्य नरकक्लेशो योऽर्चयेत् तुलसीदलैः।।२३।। पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठो सत्यं सत्यं न संशयः। पूजा के योग्य दल, पत्र और पुष्प से जो श्रीहरि की पूजा करते हैं उनके द्वारा पूजा-सामग्री में कमी या फालतू सामग्री के रहने पर भी कर्म सफल होते हैं। जो तुलसीदल से पूजा करते हैं, उन्हें नरक का क्लेश नहीं होता, चाहे वे पापी हो या निष्पाप हो; यह सत्य है, सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। गङ्गातोयेन तुलसीदलयुक्तेन योऽर्चयेत्। रामं निक्षिप्य शिरसि राममन्त्रेण सेचयेत्।।२४।। निमील्य चक्षुषी धीरो हृदि रामं निधाय च। असकृद् वा सकृद् वापि य एवमनुतिष्ठति। ध्येयो भवति सर्वेषामयमेव विमुक्तये।।२५।। तुलसीदल से युक्त गंगाजल से श्रीराम की पूजा करते हैं, उसे अपने शिर पर धारण कर श्रीराम के मन्त्र से अभिषेक करते हैं, आँखों को धैर्यपूर्वक बंद कर हृदय में श्रीराम को धारण करते हैं; ऐसा अनेक बार या एक बार भी अनुष्ठान करते हैं, तो उनके ध्येय श्रीराम इसी से मोक्ष प्रदान करते हैं। न सन्ति गुरवो यस्य नैव दीक्षाविधिः क्रमः। रामरक्षां वदन्तो यः तुलसीदलमर्पयेत्।।२६।। दीक्षान्तरशतेनापि नैतत्फलमवाप्यते।

  1. घ. तानि।