भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

षष्ठोऽध्यायः (31) तुलसीवाटिका यत्र पुष्पान्तरशतैर्युता। शोभते राघवस्तत्र सीतया सहितः स्वयम्।।15।। जहाँ सैकड़ों प्रकार के फूलों से युक्त तुलसी का बाग है, वहाँ स्वयं श्रीराम सीता के साथ विराजमान रहते हैं। कौतुकं शृणु देवेशि विनिर्माल्ये च वह्निना। तापिते नाशमायाति ब्रह्महत्यादिपातकम्।।16।। हे देवेशि! यह आश्चर्य की बात सुनो कि निर्माल्य से तुलसीदल चुनकर जो अग्नि में जलाते हैं, इससे ब्रह्महत्या आदि के पापों का नाश होता है। आरोपयन्ति ये नित्यं स्वयमेव मनीषिणः। वनत्वेन समावृत्य कण्टकैस्तुलसीतरून्।।17।। अर्चनाय तदेवालं तन्नामाभ्यर्हितं ततः। जो विद्वान् व्यक्ति नियमित रूप से स्वयं (रक्षा के लिए) काँटों की बाड़ से घेरकर तुलसी-वन लगाते हैं, वही पूजा-अर्चना के लिए पर्याप्त है; उससे भी श्रेष्ठ उनके नाम से युक्त तुलसी की प्रशंसा की गयी है। शालग्रामशिलातीर्थं¹ तुलसीदलवासितम्।।18।। ये पिबन्ति पुनस्तेषां स्तन्यपानं न विद्यते। शालग्राम शिला का जल जो तुलसीदल से सुवासित है, उसका पान करनेवालों को पुनः स्तनपान नहीं करना पड़ता अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता। गाङ्गेयमिव तोयेषु पूज्येष्विव रघूत्तमः।।19।। सरोजमिव पुष्पेषु शस्यते तुलसीदलम्। जलों में गंगाजल, पूजनीय देवों में श्रीराम और फूलों में कमल के समान पत्रों में तुलसीदल प्रशस्त है। सम्पूज्य भक्त्या विधिवद्रामं श्रीतुलसीदलैः।।20।। भवान्तरसहस्रेषु दुःखग्राहाद् विमुच्यते। तुलसीदल से श्रीराम की भक्ति और विधान से पूजा कर मनुष्य हजार जन्मों तक दुःखरूपी ग्राह से मुक्त हो जाता है।

  1. घ. शालग्रामशिलातोयं।