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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 337 में से

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पृष्ठ 91

(30) अगस्त्य-संहिता

पुष्पान्तरैरन्तरितं निर्म्मितं तुलसीदलैः ।।8।। माल्यं मलयजालिप्तं दद्यात् श्रीराममूर्द्धनि। दूसरे फूलों के बीच में तुलसीदल डालकर बनायी गयी तथा मलय चन्दन से पोती गयी माला श्रीराम के मस्तक पर चढ़ानी चाहिए। किं तस्य बहुभिर्यज्ञैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः ।।9।। किं तीर्थसेवया दानैरुग्रेण तपसापि वा। उनके लिए अनेक श्रेष्ठ दक्षिणा वाला यज्ञ, तीर्थ में निवास, दान तथा उग्र तपस्या व्यर्थ है। वाचं नियम्य चात्मानं मनो विष्णौ निधाय च ।।10।। योऽर्चयेत् तुलसीमालैर्यज्ञकोटिफलं भवेत्। भवाघकूपमग्नानामेतदुद्धारकाङ्कुशम्¹ ।।11।। अपनी वाणी को संयमित कर तथा मन में भगवान् विष्णु को धारण कर जो तुलसी की माला से पूजा करते हैं उन्हें करोड़ों यज्ञ करने का फल मिलता है। यह संसार के पाप रूपी कूप में गिरे लोगों को निकालने के लिए झग्गर है। पत्रं पुष्पं फलं चैव श्रीतुलस्याः समर्पितम्। रामाय मुक्तिमार्गस्य द्योतकं सर्वसिद्धिदम् ।।12।। श्रीराम को समर्पित श्रीतुलसी का पत्र, फूल तथा फल सभी सिद्धियाँ प्रदान करते हैं और मुक्ति का मार्ग प्रकाशित करते हैं। माल्यानि तनुते लक्ष्मीः कुसुमान्तरितानि ह। तुलस्याः स्वयमानीय निर्मितानि तपोधन ।।13।। हे तपोधन सुतीक्ष्ण! अपने से तोड़कर लाये गये तुलसी के पत्र को फूलों से ढँककर बनायी गयी माला अर्पित से लक्ष्मी की वृद्धि होती है। ²त्रयो वेदास्त्रयो देवास्तिस्रः सन्ध्यास्त्रयोऽग्नयः। सदा कुर्वन्ति माङ्गल्यं तुलसी यस्य मस्तके ।।14।। जो मस्तक पर तुलसी धारण करते हैं उनका कल्याण तीनों वेद, तीनों देव, तीनों सन्ध्याएँ और तीनों अग्नियाँ करती हैं।

  1. घ. "मेतदुद्धारकारणं। 2. घ. दो पंक्तियाँ अनुपलब्ध।
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