भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

षष्ठोऽध्यायः (29) अगस्त्य बोले- सुनो, मैं श्रीतुलसी का माहात्म्य भली-भाँति कहता हूँ। प्राचीन काल में मनस्विनी तुलसी ने उग्र तपस्या कर भगवान् से वर माँगा। तुलसी सर्वपुष्पेभ्यो पत्रेभ्यो वल्लभा यतः।१। विष्णोस्त्रैलोक्यनाथस्य रामस्य जनकात्मजा।।३।। प्रिया तथैव तुलसी सर्वलोकैकपावनी। जैसे श्रीराम के लिए जनकनन्दिनी श्रीसीता प्रिय हैं उसी प्रकार सभी फूलों और पत्तियों में तुलसी भगवान् विष्णु को सबसे प्रिय हो और वह सभी लोकों को पवित्र करती रहे। तुलसीपत्रमात्रेण योऽर्चयेद्राममन्वहम्२ ।।४।। स याति शाश्वतं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्लभम्। अतः केवल तुलसी के पत्र से जो प्रतिदिन श्रीराम की पूजा करते हैं वे ऐसे शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त करके हैं, जहाँ से फिर इस संसार में आना सम्भव नहीं है। नीलोत्पलसहस्रेण त्रिसन्ध्यं योऽर्चयेद्धरिम् ।।५।। फलं वर्षसहस्रेण३ तदीयं नैव लभ्यते। नीलकमल के हजार फूलों से तीनों सन्ध्या जो श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे एक हजार वर्ष में भी वैसा फल प्राप्त नहीं कर पाते हैं। विद्वन् सर्वेषु पुष्पेषु पङ्कजं श्रेष्ठमुच्यते।।६।। तत्पुष्पेष्वपि तन्माल्यं लक्षकोटिगुणं भवेत्। हे विद्वान् सुतीक्ष्ण! सभी फूलों में कमल श्रेष्ठ है और कमल के फूलों में भी उसकी माला लाखों करोड़ों गुना फलदायिनी होती है। विष्णोः शिरसि विन्यस्तमेकं श्रीतुलसीदलम् ।।७।। अनन्तफलदं विद्वन् मन्त्रोच्चारणपूर्वकम्। किन्तु भगवान् विष्णु के शिर पर मन्त्रोच्चारण के साथ चढ़ाया गया एक तुलसी का पत्र अनन्त फल देता है। १. घ. तत। २. घ. ०विष्णुमन्वहम्। ३. घ. वर्षशतेनापि।