अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 89, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(28) अगस्त्य-संहिता ध्यानमप्यर्चनाद् भद्रैर्भद्रार्थफलदं यतः। आत्मनस्तत्त्वचिन्ता तु तस्याप्यात्म¹चिन्तनम् ।।47।। उभयोरैक्यचिन्ता तु पुनरावर्तयेन्न तु। सुन्दर साधनों से अर्चना करने से आत्मा के तत्त्व का चिन्तन और तत्त्वों की आत्मा का चिन्तन स्वरूप ध्यान श्रेष्ठ है, क्योंकि यह सुन्दर फल प्रदान करता है। साथ ही, आत्मा का तत्त्व और तत्त्व की आत्मा इन दोनों की एकता का चिन्तन करने से पुनर्जन्म नहीं होता है। आत्मानं सततं रामं संभाव्य विहरन्ति ये। न तेषां दुष्करं किंचिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।।48।। जो हमेशा अपने को श्रीराम समझकर विहार करते हैं उनके लिए कोई दुष्कर कार्य नहीं है और उस दुष्कर कार्य के कारण उत्पन्न होनेवाली विपत्ति नहीं होती है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये सगुणोपासनम् नाम पंचमोऽध्यायः ।। अथ षष्ठोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच किमेतद् भगवन् ब्रूहि तव² मध्याङ्गुलिं रहः। तत्किं पिबसि माहात्म्यं श्रीतुलस्याः क्वचित् सृतम्³ ।।1।। सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे भगवान् अगस्त्य मुनि! आपकी अंगुलियों के बीच में क्या छुपा हुआ है, यह तो बतलाइये! क्या आप श्रीतुलसी से निःसृत माहात्म्य का पान कर रहे हैं? अगस्तिरुवाच शृणु वक्ष्यामि माहात्म्यं श्रीतुलस्याः प्रयत्नतः। पूर्वमुग्रतपः कृत्वा वरं वव्रे मनस्विनी।।2।।
- घ. तस्यात्मनि विचिन्तयेत्। 2. ख. घ. हित्वा। 3. ख. स्थितम्।