भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

---------------- पञ्चमोऽध्यायः ---------------- (27) हे कल्याणमयी पार्वती! यदि अपना कल्याण चाहती हो, तो मेरी बात सुनो और इन साधनों से विधानपूर्वक आज से लेकर जीवन पर्यन्त श्रीराम की आराधना करो। इसी से हमेशा तुम्हारा कल्याण होगा। पुण्यस्त्रियो गृहस्थाश्च तथैव ब्रह्मचारिणः। सगुणं राममाराध्य पूर्वोक्तैः साधनैरपि।।41।। शक्त्या सम्पादितैः कैश्चित्पूजयेयुर्दिवानिशम्। तेषां भुक्तिश्च मुक्तिश्च भवत्येव न चान्यथा।।42।। पुण्य करनेवाली स्त्रियाँ, गृहस्थ पुरुष तथा ब्रह्मचारी शक्ति के अनुसार एकत्रित पूर्वोक्त सामग्रियों से भी सगुण राम की पूजा दिन-रात करें, तो उन्हें भोग और मोक्ष होगा ही, इसमें सन्देह नहीं। वानप्रस्थाश्च यतयो यद्येवं कुर्युुरन्वहम्। संसारान्न निवर्तन्ते विध्यतिक्रमदोषतः।।43।। आरूढपतिता ह्येते भवेयुर्दुःखभाजनाः। वन में रहनेवाले तथा संन्यासी यदि उपर्युक्त विधान से प्रतिदिन पूजा करते हैं, तो उन्हें विधान का अतिक्रमण करने के दोष से संसार से मुक्ति नहीं मिलेगी और वे आरूढपतित कहलायेंगे और दुःख के भागी होंगे। अहिंसा परमो धर्मस्तेषामेषा न पद्धतिः।।44।। न हिंसाव्यतिरेकेण लभ्यन्ते तानि तानि वै। भावनाकल्पितैः पूजासाधनैरेव युज्यते।।45।। उनके लिए अहिंसा परम धर्म हैं और हिंसा के बिना ये सामग्रियाँ उपलब्ध नहीं हो सकतीं; यह पद्धति उनके लिए नहीं है। मन में पूजा-सामग्रियों की भावना कर उनके लिए मानस-पूजन विहित है। न बहिर्योग्ययुक्तानां मनस्तेषां प्रशस्यते। एतच्छान्तधियामेव सेव्यसेवकरूपतः।।46।। किन्तु बहिर्योग से युक्त जो गृहस्थ और ब्रह्मचारी है, उनके लिए यह प्रशस्त है। यह शान्त बुद्धिवालों के लिए ही है, जो भगवान् को सेव्य और स्वयं को सेवक मानते हैं।