अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(26) अगस्त्य-संहिता —————————————————————————————————— कङ्कोलैलापूगफलैस्तथा जातीफलैरपि। कर्पूरचूर्णसहितैस्ताम्बूलैश्च सुवासितैः।।134।। कंकल, इलायची, सुपारी, जायफल, कर्पूर के चूर्ण से सुगन्धित पान का बीड़ा समर्पित कर पूजा करें। महार्हेरर्हणां चक्रुः कल्याणार्थं तथान्वहम्। स्वस्वशक्त्यनुसारेण सर्वं सम्पाद्य यत्नतः।।135।। कल्याण के लिए प्राचीन काल में सन्तों ने इन श्रेष्ठ वस्तुओं से अपनी शक्ति के अनुसार सब एकत्रित कर प्रतिदिन अर्चना की थी। गृहस्थानां विधिरयं नैतरेषां शुभानने। दद्युर्दानानि जुहुयुरर्चितेग्नौ सुखार्थिनः।।136।। यह विधि केवल गृहस्थों के लिए है, अन्य के लिए नहीं। वे गृहस्थ सुख की कामना से दान करें और पूजित अग्नि में हवन भी करें। कल्याणं च वरारोहे रामार्पणधियान्वहम्। हे पार्वती! श्रीराम को समर्पित करने की बुद्धि से इस प्रकार अर्चना कर कल्याण होगा। एवं गृहस्थनियमस्तथैव ब्रह्मचारिणाम्।।137।। विधिमप्यनतिक्रम्य यथाशक्त्यनुसारतः। यदि कुर्युः प्रयत्नेन पूजा तत्साधनैरिह¹।।138।। सर्वं सम्पद्यते तेषां देवानां दुर्लभं च यत्। यह गृहस्थों के लिए नियम है, किन्तु इस प्रकार ब्रह्मचारी भी किसी विधान को छोड़े विना अपनी शक्ति के अनुसार यत्नपूर्वक यदि उन सामग्रियों से इस संसार में पूजा करते हैं, तो उनकी भी सभी कामनाओं की सिद्धि होती है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। कल्याणि शृणु मद्वाक्यं यदि कल्याणमिच्छसि।।139।। राममाराधयाद्यादेर्यावज्जीवं यथाविधि। एतेनैव वरारोहे कल्याणं तव सर्वदा।।140।।
- घ. तत्साधनैरपि।