अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः (41)
तदादितदभून्मुक्तिक्षेत्रं त्रैलोक्यपावनम्। तत्र तिष्ठन्ति ये भक्त्या यावज्जीवं नियम्यते।। मुक्तिभाजो भवन्त्येव सत्यं सत्यं न चान्यथा।।३६।। इसके बाद उस समय से तीनो लोकों में पवित्र वाराणसी 'मुक्तिक्षेत्र' हो गयी। वहाँ जो भक्तिपूर्वक वास करते और जीवन पर्यन्त नियम का पालन करते हैं, वे मुक्ति के भागी होते हैं। यह सत्य है, सत्य है; यह अविचल है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रराजमाहात्म्यं नाम सप्तमोध्यायः। अथ अष्टमोऽध्यायः कथं मन्त्रवरं चादौ केन भूमौ ¹ प्रतिष्ठितम्। उपादिश कः ² कस्मै तन्मे ब्रूहि तपोधन।।1।। सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे तपोधन अगस्त्य मुनि! किसने सबसे पहले इस पृथ्वी पर इस मन्त्रराज को प्रतिष्ठित किया। किसने किसे उपदेश किया, यह बतलाइए। अगस्तिरुवाच ब्रह्मा ददौ वसिष्ठाय स्वसुताय मनुं ततः।³ स वेदव्यासमुनये ददावित्थं गुरुक्रमात् ⁴।।2।। ब्रह्मा ने अपने पुत्र वसिष्ठ को यह मन्त्र दिया। इसके बाद गुरु परम्परा से वसिष्ठ ने वेदव्यास मुनि को दिया। वेदव्यासमुखेनात्र मन्त्रो भूमौ प्रकाशितः। वेदव्यासो महातेजाः शिष्येभ्यः समुपदिशत्।।3।। वेदव्यास के मुख से यह मन्त्र पृथ्वी पर फैला। महान् तेजस्वी वेदव्यास ने अपने शिष्यों को इसका उपदेश किया था। गुरुः शिष्यगुणानादौ⁵ शौनकायाब्रवीन्मुनिः। स शौनकेन पृष्टः सन्नाह मन्त्रान्तराणि च।।4।। गुरु मुनि वेदव्यास ने पहले शिष्य के गुणों का उपदेश देकर शौनक को इसका उपदेश किया। शौनक ने जब वेदव्यास से पूछा तब उन्होंने दूसरे मन्त्रों का भी उपदेश करते हुए कहा—
- घ. भूमौ केन चादौ। 2. घ. तदादिदेशकः। 3. घ. पुनः। 4. घ गुरुक्रमः। 5. घ. गुरुः शिष्यगणानादौ। Rarest Archiver