अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(42) अगस्त्य-संहिता
यन्त्रपूजाविधिमपि होमं तर्पणलक्षणम्। पुरश्चरणसंख्यां च होमद्रव्यान्तराणि च।।5।। जपस्थानानि सिद्धिं च यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा। तदुक्तं सम्प्रयच्छामि यदि श्रोतुमिहेच्छसि।।6।। “हे शौनक! यदि सुनना चाहो तो प्राचीन काल में ब्रह्मा ने जिस प्रकार बतलाया था उसी प्रकार यन्त्र-पूजा की विधि, होम, तर्पण, पुरश्चरण की संख्या, हवन-सामग्री, जप-स्थान और सिद्धि के विषय में मैं उपदेश करता हूँ।” सुतीक्ष्ण उवाच सतां सन्दर्शनं लोके तर्पयत्येव मङ्गलम्। मन्दभाग्योऽप्यहं कस्मात् श्रोता कल्प्ये त्वयाधुना।।7।। मुनिवर्याधुनैव त्वं यदुक्तं तत् प्रबोध मे। सुतीक्ष्ण ने कहा– साधुओं का मंगलमय दर्शन ही तृप्ति प्रदान करता है। तब जब आप-जैसे वक्ता इस समय हैं, तो मैं श्रोता होकर कैसे मन्दभाग्य रहूँ? मैं भी आपसे सुनकर श्रोता बनना चाहता हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ! ब्रह्माजी ने जो कुछ कहा, वह मुझे अभी सुनाइए। अगस्तिरुवाच देवतोपासकः शान्तो विषयेष्वपि निःस्पृहः। अध्यात्मविद् ब्रह्मवादी वेदशास्त्रार्थकोविदः।।8।। उद्धर्तुञ्चैव संहर्तुं समर्थो ब्राह्मणोत्तमः। तन्त्रज्ञो यन्त्रमन्त्राणां धर्मवित्ता रहस्यवित्।।9।। पुरश्चरणकृत् सिद्धो मन्त्रसिद्धः प्रयोगवित्। तपस्वी सत्यवादी च गृहस्थो गुरुरुच्यते।।10।। अगस्त्य बोले– देवों के उपासक, शान्त चित्तवाले, सांसारिक विषयों से विरक्त, अध्यात्म को जाननेवाले, ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेवाले, वेद, शास्त्र आदि के ज्ञानी, उद्धार और संहार दोनों करने में समर्थ, ब्राह्मणश्रेष्ठ, तन्त्रज्ञ, यन्त्र एवं मन्त्र के ज्ञाता, धर्म और रहस्य के ज्ञाता, पुरश्चरण करनेवाले, सिद्धपुरुष, जिन्हें मन्त्र सिद्ध हों तथा जो प्रयोगों का ज्ञान रखते हों, तपस्वी और सत्यवादी गृहस्थ गुरु कहलाते हैं।