भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

अष्टमोऽध्यायः (43) आस्तिको गुरुभक्तश्च जिज्ञासुः श्रद्धया सह। कामक्रोधादिदुःखोत्थं वैराग्यं वनितादिषु ।।11।। सर्वात्मना तितीर्षुश्च भवाब्धेर्भवदुःखितः। ब्राह्मणो धर्ममोक्षार्थी कामार्थं विगतस्पृहः ।।12।। किं वा धर्मार्थमोक्षार्थी निष्कामश्चाथवा द्विजः। मनोवाक्कायधर्मैस्तु नित्यं शुश्रूषको गुरोः।।13।। धर्म में आस्था रखनेवाले, गुरु के भक्त, श्रद्धा के साथ सीखने की इच्छा रखनेवाले, काम, क्रोध आदि से उत्पन्न दुःखों को देखते हुए स्त्रियों के प्रति वैराग्य रखनेवाले, सभी प्रकार से संसार को पार करने की इच्छा रखनेवाले, संसार के दुःखों से दुःखी, ब्राह्मण, धर्म और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले, निष्काम शिष्य होते हैं। अथवा मन, वचन, कर्म, एवं धर्म से गुरु की नित्य सेवा करनेवाले, क्षत्रिय, एवं वैश्य शिष्य होते हैं। स्ववर्णाश्रमधर्मोक्तकर्मनिष्ठः सदाशुचिः। शुचिव्रततमाः शूद्राः धार्मिकाः द्विजसेवकाः।¹।।14।। अपने वर्ण और आश्रम के लिए कथित धर्म के अनुसार कर्म करनेवाले, सदा पवित्र रहनेवाले, पवित्र नियमों का पालन करनेवाले द्विजों की सेवा करनेवाले, धार्मिक शूद्र शिष्य होते हैं। स्त्रियः पतिव्रताश्चान्ये प्रतिलोमानुलोमजाः। लोकाश्चाण्डालपर्यन्तं सर्वेऽप्यत्राधिकारिणः ।।15।। पतिव्रता स्त्रियाँ, चाहे वे प्रतिलोम विवाह से या अनुलोम विवाह से उत्पन्न हो, वे भी शिष्या हो सकतीं हैं। चाण्डाल पर्यन्त सभी व्यक्ति यहाँ अधिकारी हैं। स्वजातिकर्मनिरताः² भक्त्या सर्वेश्वरस्य ये। उपदेशक्रमस्तेषां तत्तज्जात्यनुसारतः ।।16।। अपनी जाति के कर्म में लगे हुए भक्तिपूर्वक जो सर्वेश्वर की आराधना करते हैं, उनके लिए उनकी जाति के अनुसार दीक्षा का क्रम निर्धारित है। अलसाभिमानिनः³ क्लिष्टा दाम्भिकाः कृपणास्तथा। दरिद्राः रोगिणो दुष्टा⁴ रागिणो भोगलालसाः ।।17।।

  1. घ. शुचिव्रततमाः शुद्धाः धार्मिकाः द्विजसत्तमाः। 2. घ. स्वजातिधर्मनिरताः।
  2. घ. अलसाः मलिनाः। 4. घ. रुष्टाः।