अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(44) अगस्त्य-संहिता
असूयामत्सरग्रस्ताः शठाः परुषवादिनः। अन्योपायार्जितधनाः परदाररताश्च ये।।18।। विदुषां वैरिणश्चैव ह्यज्ञाः पण्डितमानिनः। भ्रष्टव्रताश्च ये कष्टवृत्तयः पिशुनाः जनाः।।19।। बद्धाशिनः¹ क्रूरचेष्टा दुरात्मानश्च निन्दकाः।² एवमेवादयोऽप्यन्ये पापिष्ठाः पुरुषाधमाः।।20।। अकृत्येभ्योऽनिवार्याश्च गुरुशिष्यासहिष्णवः। एवंभूताः परित्याज्याः शिष्यत्वेनोपकल्पिताः।।21।। आलसी, अभिमानी, कठोर हृदय वाले, घमण्डी, कृपण, दरिद्र, रोगी, दुष्ट विषयों में आसक्त तथा भोग करने की लालसा रखनेवाले, सन्देह और ईर्ष्या करनेवाले, धूर्त, कठोर वाणी बोलनेवाले, दूसरे तरीके से धन अर्जित करनेवाले, दूसरे की पत्नी में आसक्त, विद्वानों से शत्रुता रखनेवाले, मूर्ख, स्वयं को पण्डित माननेवाले, नियम से च्युत, कठोर कार्य करनेवाले, चुगली करने वाले, शरीर को बाँधकर अर्थात् सिला हुआ वस्त्र पहनकर खानेवाले, क्रूर व्यवहार करनेवाले, दुष्ट, दूसरे की निन्दा करनेवाले - ये सब और अन्य प्रकार के भी पापाचरण करनेवाले नीच पुरुष हैं। बुरे कार्य करने से मना करने पर भी नहीं रुकनेवाले और गुरु एवं उनके शिष्यों के प्रति असहिष्णु व्यक्ति जो शिष्य बनने के लिए परीक्ष्य हों, उनका परित्याग करना चाहिए। यदि तेऽभ्युपकल्पेरन् देवताक्रोधसभाजनाः। भवन्ति हि दरिद्रास्ते पुत्रदारविवर्जिताः। नरकाञ्चैव देहान्ते तिर्यक्षु भवन्ति ते।।22।। यदि ऐसे व्यक्ति शिष्य बनते हैं तो वे शिष्य देवता के कोप के भागी, दरिद्र, सन्ततिविहीन होते हैं; मरणोपरान्त उन्हें नरक मिलता है तथा पुनर्जन्म लेकर पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनि में उत्पन्न होते हैं। ये गुर्वाज्ञां न कुर्वन्ति पापिष्ठाः पुरुषाधमाः। न तेषां नरकक्लेशनिस्तारो मुनिसत्तम।।23।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! जो गुरु की आज्ञा नहीं मानते वे पापी पुरुषों में नीच हैं। उन्हें नरक के क्लेश से छुटकारा नहीं मिलता है।
- घ. बह्वाशिनः। 2. घ. निन्दिताः