अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(20) अगस्त्य-संहिता
- ‘श्वेताश्वतरोपनिषद्-भाष्य’ में के आरम्भ में आत्मज्ञान के माहात्म्य वर्णन प्रसंग में ‘नृसिंहपूर्वतापानीयोपनिषद्’ से तमेवं विद्वानमृत इह भवति (नृसिंह पूर्व. 1/6)
- ‘कर्म भी मोक्ष प्राप्ति का साधन है’ इस का खण्डन करते हुए ‘कैवल्योपनिषद्’ तृतीय वल्ली से “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके ऽमृतत्वमानशुः” उद्धृत किया गया है।
- इसी प्रसंग में आगे ‘योगशिखोपनिषद्’ को अथर्ववेद से सम्बद्ध उपनिषद् मानते हुए शंकराचार्य ने लिखा है- तथा चाथर्वणे विशुद्धच्यपेक्षमात्मज्ञानं दर्शयति- जन्मान्तर सहस्रेषु यदा क्षीणास्तु किल्विषाः। तदा पश्यन्ति योगेने संसारोच्छेदनं महत्।।
- प्रथमाध्याय के सोलहवीं गाथा पर भाष्य में कौषीतकि उपनिषद् से ‘एष ह्येव साधुकर्म कारयति’ (318) उद्धृत किया है। इस प्रकार, ‘नृसिंहतापानीयोपनिषद्’, ‘योगशिखोपनिषद्’, ‘कौषीतकि- उपनिषद्’ तथा अन्य कुछ अथर्ववेद से सम्बद्ध उपनिषदों की रचना शंकराचार्य से पूर्व भी हो चुकी थी। ‘रामतापानीयोपनिषद्’ भी अथर्ववेद से सम्बद्ध उपनिषद् है, अतः प्रथम दृष्ट्या ही इन्हें शंकराचार्य से परवर्ती मानना उचित नहीं है। इनके काल निर्धारण के सम्बन्ध में शोध अपेक्षित है, किन्तु कालनिर्धारण करते समय उपरिलिखित तथ्यों को ध्यान में रखना होगा। ‘रामतापानीयोपनिषद्’ में दो स्थलों पर ‘अगस्त्य-संहिता’ सप्तम अध्याय के श्लोक किंचित् शब्दान्तर से उपलब्ध हैं। प्रथम स्थान पर भगवान् शंकर द्वारा श्रीराम के मन्त्र का जप करने और इसके कारण काशी के अविमुक्त क्षेत्र कहलाने का उल्लेख हुआ है। यहाँ ऊपर बायीं ओर रामतापानीयोपनिषद् के श्लोक हैं तथा नीचे दाहिनी ओर ‘अगस्त्य-संहिता’ के संगत श्लोक संख्या के साथ दिये जा रहे हैं। अथ तं प्रत्युवाच। श्रीरामस्य मनुं काश्यां जजाप वृषभध्वजः। मन्वन्तरसहस्रैस्तु जपहोमार्चनादिभिः।।1।। -‘रामतापनीयोपनिषद्’ नियतः सोऽपि तत्रैव जजाप वृषभध्वजः। मन्वन्तरशतं भक्त्या ध्यानहोमार्चनादिभिः।।16।।-‘अगस्त्य-संहिता’ ततः प्रसन्नो भगवाञ्छ्रीरामः प्राह शंकरम्। वृणीष्व यदभीष्टं तद्दास्यामि परमेश्वर।।2।। इति।।-‘रामतापनीयोपनिषद्’