अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(162) अगस्त्य-संहिता वामाङ्गेडा पिङ्गला स्याद् दक्षिणस्था तथोत्तरा। गान्धारी हस्तजिह्वा च सपुष्पालम्बुषास्तथा।।24।। नीचे की ओर मुख करके वह जीव रहता है। इसके बाद चारों ओर लिपटी हुई नाडी सीधी हो जाती है। वह दो भागों में बँट जाती है तथा अन्य सात नाड़ियाँ भी उत्पन्न होती हैं। इन नाडियों में पहली अपनी नाड़ी है, जिसे सुषुम्णा कहते हैं। वाम अंग में ईडा, दाहिने अंग में पिंगला, ऊपर में गांधारी, हस्तजिह्वा, सपुष्पा एवं अलम्बुषा नाडियाँ होती है। यशस्विनी शङ्खिनी च हूहूरिति दश क्रमात्। या तासु मध्यमा तस्याः सुषुम्णायाः पृथक् पृथक्।।25।। प्लवन्ति पञ्चपर्वाणि तेभ्यो लक्षत्रयं पुनः। लक्षार्द्धञ्च शिरा जाताः शरीरं व्याप्नुवन्ति च¹।।26।। इसके अतिरिक्त यशस्विनी, शंखिनी और हूहू ये मिलकर क्रमशः दस नाड़ियाँ हैं। उनमें जो मध्यमा नामक नाड़ी उसकी स्थिति सुषुम्णा से पृथक् होती है। इनमें पाँच गाँठें तैरती रहती हैं, जिनसे तीन लाख नाड़ियाँ उत्पन्न होती हैं और पचास हजार शिराएँ उत्पन्न होकर शरीर में फैल जाती हैं। देहेस्मिन् दश विज्ञेया जलस्याञ्जलयो मुने²।। रसस्य नव षट्कैकैव पुरीषस्य प्रकीर्तिताः।।27।। रक्तस्याञ्जलयोऽप्यष्टौ षट् श्लेष्माण उदाहृताः। पित्तस्यापि तथा पञ्च मूत्रस्यापि शरीरके।।28।। चत्वारोऽत्र वसायाश्च त्रयो द्वे मेदसस्तथा। एकोऽर्द्धं चापि मज्जायाः रेतसस्तावदेव हि।।29।। श्लेष्मौजसोप्येमेवमेभिर्देहो निबध्यते। इस शरीर में दस जल के गढ़े होते हैं। रस के नौ तथा विष्ठा के छह गढ़े होते हैं। रक्त के आठ गढ़े होते हैं, जिनमें छह छोटे होते हैं। पित्त के पाँच, मूत्र के चार, वसा के तीन और मेद के दो गढे होते हैं। मज्जा का एक और आधा गढ़े होते हैं और रेत के भी उतने ही होते हैं। श्लेष्मा और ओजस् के भी इतने ही होते हैं। इन सबसे यह शरीर बँधा हुआ रहता है।
- घ. प्राप्नुवन्ति। 2. घ. जलस्य मुनिपुंगव।