अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाबिंशोऽध्यायः (163) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — दिने दिनेऽप्येवमेव वर्द्धतेऽङ्गं तपोनिधे।।30।। पूर्वमाभिर्भवन्त्येव शिरःपादौ करावपि। आधिः स्यान्महती तस्य षडङ्गेन्तरेष्वेव तु।।31।। वागाक्षिनासिकाः कर्णत्वक्कपोलं च हनुद्वयम्।। चिबुकं दन्तपंक्तिश्च जिह्वा चैवोपजिह्विका।।32।। शिरःकेशास्तथा कण्ठं स्कन्धं कूर्परपाणयः। नखांश्चाङ्गुलयः कक्ष उरः पार्श्वद्वयं तथा।।33।। पृष्ठमप्युदरं नाभिः कटिस्फिचौ¹ गुदादिकम्।। ऊरू च जानुनी जंघे पादावङ्गुलयस्तथा।।34।। रोमाप्येतच्छरीरं तच्चर्मणाच्छादितं मुने। हे तपोनिधि सुतीक्ष्ण! इस प्रकार क्रमशः अंग बढ़ते हैं। सबसे पहले शिर, पैर और दोनों हाथ प्रकट होते हैं। इस प्रक्रिया छह अंगों के भीतर अत्यधिक कष्ट होता है। अंगों में वाणी, आँख, नासिका, कान, त्वचा, कपोल, टुढी, चिबुक, दन्तपंक्ति, जिह्वा, लबलबी, शिर के केश, कण्ठ, कन्धा, केहुनी, हाथ, नाखून, अंगुलियाँ, दोनों काँख, छाती, दोनों पंजर, पीठ, उदर, नाभि, कमर, कूल्हा, गुदा आदि, दोनों घुटने, दोनों जाँघें, पैरों की अंगुलियाँ और रोम, इन अवयवों से शरीर बनता है और चर्म से ढँका रहता है। बहिरन्तश्चरन्तोऽमी वायवश्चालयन्ति च।।35।। देशाद् देशान्तरं देहे सप्तधातूनविद्रुतम्। इस शरीर को बाहर भीतर चलते हुए वायु चलाते हैं। यही वायु शरीर में तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक सातो धातुओं को भी चलाते हैं। वायवः पंच देहस्थाः पृथगेव प्रकीर्तिताः।।37।। प्राणाख्यो हृदये वायुरपानाख्यो गुदे स्थितः। समानाख्योऽपि नाभौ स्यादुदानः कण्ठदेशतः।।38।। आपादमस्तकं व्यानः समस्तं व्याप्य² तिष्ठति। शरीर में स्थित पाँच वायु अलग अलग ही अवस्थित रहते हैं। 'प्राण' नामक वायु हृदय में, 'अपान' नामक गुदा में 'समान' नामक नाभि में और 'उदान' नामक कण्ठस्थल में रहते हैं। 'व्यान' नामक वायु सिर से पैर तक सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है।
- घ. स्फिकोपस्थ। 2. घ. समभिव्याप्य। 3. घ. कृकरो।