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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

द्वाबिंशोऽध्यायः (163) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — दिने दिनेऽप्येवमेव वर्द्धतेऽङ्गं तपोनिधे।।30।। पूर्वमाभिर्भवन्त्येव शिरःपादौ करावपि। आधिः स्यान्महती तस्य षडङ्गेन्तरेष्वेव तु।।31।। वागाक्षिनासिकाः कर्णत्वक्कपोलं च हनुद्वयम्।। चिबुकं दन्तपंक्तिश्च जिह्वा चैवोपजिह्विका।।32।। शिरःकेशास्तथा कण्ठं स्कन्धं कूर्परपाणयः। नखांश्चाङ्गुलयः कक्ष उरः पार्श्वद्वयं तथा।।33।। पृष्ठमप्युदरं नाभिः कटिस्फिचौ¹ गुदादिकम्।। ऊरू च जानुनी जंघे पादावङ्गुलयस्तथा।।34।। रोमाप्येतच्छरीरं तच्चर्मणाच्छादितं मुने। हे तपोनिधि सुतीक्ष्ण! इस प्रकार क्रमशः अंग बढ़ते हैं। सबसे पहले शिर, पैर और दोनों हाथ प्रकट होते हैं। इस प्रक्रिया छह अंगों के भीतर अत्यधिक कष्ट होता है। अंगों में वाणी, आँख, नासिका, कान, त्वचा, कपोल, टुढी, चिबुक, दन्तपंक्ति, जिह्वा, लबलबी, शिर के केश, कण्ठ, कन्धा, केहुनी, हाथ, नाखून, अंगुलियाँ, दोनों काँख, छाती, दोनों पंजर, पीठ, उदर, नाभि, कमर, कूल्हा, गुदा आदि, दोनों घुटने, दोनों जाँघें, पैरों की अंगुलियाँ और रोम, इन अवयवों से शरीर बनता है और चर्म से ढँका रहता है। बहिरन्तश्चरन्तोऽमी वायवश्चालयन्ति च।।35।। देशाद् देशान्तरं देहे सप्तधातूनविद्रुतम्। इस शरीर को बाहर भीतर चलते हुए वायु चलाते हैं। यही वायु शरीर में तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक सातो धातुओं को भी चलाते हैं। वायवः पंच देहस्थाः पृथगेव प्रकीर्तिताः।।37।। प्राणाख्यो हृदये वायुरपानाख्यो गुदे स्थितः। समानाख्योऽपि नाभौ स्यादुदानः कण्ठदेशतः।।38।। आपादमस्तकं व्यानः समस्तं व्याप्य² तिष्ठति। शरीर में स्थित पाँच वायु अलग अलग ही अवस्थित रहते हैं। 'प्राण' नामक वायु हृदय में, 'अपान' नामक गुदा में 'समान' नामक नाभि में और 'उदान' नामक कण्ठस्थल में रहते हैं। 'व्यान' नामक वायु सिर से पैर तक सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है।

  1. घ. स्फिकोपस्थ। 2. घ. समभिव्याप्य। 3. घ. कृकरो।

(164) अगस्त्य-संहिता नागः कूर्मोऽथ कृकलो³ देवदत्तो धनञ्जयः ।। 39 ।। वायवो दश देहेऽस्मिन् सप्तधातुषु संस्थिताः । सप्तैवान्येषु दोषेषु स्वेदक्लेदान्तगामिनः ।। 40 ।। इसके अतिरिक्त सात धातुओं में नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय ये पाँच वायु हैं। ये दश वायु शरीर में होते हैं। दूसरे दोष उत्पन्न करनेवाले सात वायु हैं, जो पसीना और मूत्र के अंग में रहते हैं। एवं शरीरमासाद्य प्रसूतिसमये भृशम् । स्वमातरं व्यथयन्नन्तमुदरे विनिवर्तते ।। 41 ।। नवमे दशमे मासि शरवन्निःसरेदपि । पूयशोणितविण्मूत्रपरीताङ्गोऽथ सज्ज्वरः ।। 42 ।। योनेरवनिमासाद्य क्लेशातिशयमोहितः । रोदित्यच्चैर्विषण्णः सन् विस्मरेच्च मनोगतम् ।। 43 ।। इस प्रकार, शरीर प्राप्त कर जीव समय होने पर प्रसव के समय बार बार अपनी माता को अनन्त कष्ट देता हुआ उसके उदर में पहुँच जाता है और नवम या दशम मास तीर की तरह बाहर निकल जाता है, अर्थात् जन्म लेता है। मवाद, शोणित, विष्ठा और मूत्र से लिपटा तथा तप्त शरीर वाला शीघ्र ही योनिद्वार से ही जन्म लेकर अत्यधिक कष्ट से व्याकुल होकर जोर-जोर से रोता है और अपने मन की सभी स्मृतियों को वह भूल भी जाता है। अमृतत्वमनावृत्तिलक्षणं साध्यमात्मनः । तत्त्वज्ञानबहिर्भूतो भूयो भूयो विमोहितः ।। 44 ।। आत्मानमपि विस्मृत्य बहिरेव प्रधावति । क्षुत्पिपासातुरो नित्यं स्तनमेव किलेच्छति ।। 45 ।। अपने अभीष्ट, अमृत नामक मोक्षस्वरूप ब्रह्म को वह जीव भूल जाता है और बाहर की ही ओर दौड़ पड़ता है; क्योंकि वह उस तत्वज्ञान से बहिर्भूत होकर बार बार मोहित हो जाता है। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह स्तन ही चाहता है। दिने दिने वर्द्धमानः पक्षे मासि ऋतावपि । तत्तत्कालोक्तविषयैः सम्यगाविष्कृतो भवेत् ।। 46 ।। पितृभ्यो बन्धुभिः सम्यक् कायो नित्यं प्रमोदितः ।

संवर्द्धितः शश्वदयं वर्षे वर्षे प्रयत्नतः ।।47।। यद्धितं स्वस्य सततं तदानीमायतावपि। तत्सर्वं सम्परित्यज्य बहिरेव प्रवर्त्तते ।।48।। दिनानुदिन पक्ष मास और ऋतु के अनुसार बढ़ता हुआ वह उन उन समय के लिए उक्त विषयों के द्वारा भली भाँति प्रकट हो जाता है। वह शरीरधारी पिता, भाई के साथ प्रतिदिन प्रसन्न होता है। वह साल दर साल बढ़ता हुआ, उसका जो हमेशा कल्याणकारी है, उस परमधाम तथा परमेश्वर का साथ छोड़कर बाहर ही दौड़ता है। यद्ययं सर्वमुत्सृज्य पश्येदात्मानमात्मनि। एतावतेव संसारभवदुःखैर्विमुच्यते ।।49।। यदि वह जीव सब कुछ छोड़कर आत्मा में अपने को देखे, तो इससे ही वह संसार में जन्म लेने के दुःखों से मुक्त हो जाता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये शरीरोत्पत्तिर्नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः।। अथ त्रयोविंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अद्वैतानन्दचैतन्यशुद्धसत्त्वैकलक्षणः । बहिरन्तः सुतीक्ष्णात्र स्वयमात्मा प्रकाशते ।।1।। अनाद्यसृष्टमेवात्र¹ कारणन्तत्र गोपते । न्यूनं वाप्यतिरिक्तं वा सर्वत्रापि तपोनिधे ।।2।। हे सुतीक्ष्ण! अद्वैत, आनन्दस्वरूप, चैतन्यस्वरूप, शुद्ध, सत्त्व, आ एकत्व इन छह लक्षणों वाली आत्मा स्वयं मनुष्य के भीतर और बाहर प्रकाशित रहती है। इस आत्मा का कारण अनादि और अदृष्ट है, जो चाहे कम मात्रा में हो या अधिक मात्रा में, सभी स्थितियों में आत्मा में प्रकाशित होती है। आधिक्ये विषयैर्नित्यं बहिरेव प्रतीयते। न्यूनेऽपि विषयात्यन्ता प्राप्या तस्माद् बहिर्भवेत् ।।3।।

  1. घ. अनाद्यसृष्टमेवात्र।

(166) अगस्त्य-संहिता

आत्मा के कारणों की अधिकता होने पर आत्मा विषयों के साथ बाह्य रूप में प्रतीत होती है और कारणों की न्यूनता होने पर विषयादि के साथ संयुक्त होकर उससे बाहर हो जाती है। अतो जानीहि चात्मानमात्मन्येव निरन्तरम्। आसक्तो विषयैर्नित्यं स्वस्यादृष्टोपकल्पितैः ।।4।। यत्र यद्यत् प्रपञ्चेऽस्मिन् जङ्गमाजङ्गमात्मके। तत्र सर्वत्र चैतन्यं तिष्ठत्येवं निरन्तरम् ।।5।। इसलिए आत्मा को निरन्तर आत्मा में ही स्थित जानो, किन्तु अपने भाग्य के कारण जीव इस मिथ्या विषयों के साथ आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति इस स्थावर और जंगम रूप संसार में जहाँ जहाँ होती है, उन सभी जगहों पर निरन्तर चैतन्य की सत्ता अवश्य होती है। कार्यात्मना प्रपञ्चोऽयं चैतन्यं कारणात्मना। अनुस्मृतं हि सर्वत्र भूतानाञ्चात्र भौतिके ।।6।। स्वयमेवात्र चैतन्यं तस्मादन्यन्न किञ्चन। यह प्राणियों का यह भौतिक संसार कार्य रूप है और चैतन्य कारण रूप में सर्वत्र अनुभव किया जाता है। यहाँ स्वयं चैतन्य की सत्ता है और उससे परे दूसरे कुछ भी नहीं है। परमात्मा च जीवात्मा ब्रह्म सच्च तदोमिति ।।7।। ज्ञानमानन्दमित्येत् सर्वं चैतन्यवाचकम्। चैतन्यान्न परं किञ्चिद् दृश्यते सर्वजन्तुषु ।।8।। परमात्मा, जीवात्मा, ब्रह्म, सत्, ॐकार, ज्ञान, आनन्द- ये सबके सब चैतन्य के वाचक हैं। चैतन्य से परे सभी प्राणियों में कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता है। प्रबुद्धस्याप्रमत्तस्य पृथिवीव घटादिषु। अतः शुद्धं पृथिव्यादौ दृश्यते सर्वदेहिनाम् ।।9।। अदृष्टं कल्पयेद्यत्र स्वीयं स्वस्मिन् भवेदिह। जो प्रबुद्ध हैं और अहंकारी या पागल नहीं हैं, उनकी दृष्टि में जिस प्रकार घट आदि में पृथिवी तत्त्व है, उसी प्रकार सभी प्राणियों के अन्तस्तत्त्व पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वों में दृष्टिगोचर होते हैं। अदृष्ट आत्मा की जहाँ कल्पना की जाती है, वहाँ स्वयं में अपनी आत्मा होती है।

त्रयोविंशोऽध्यायः (167) प्रेमादिर्जायते लोके स्वस्मिन् वा स्वोपकारके।।10।। न चेन्नैव समीचीनं यदन्यद् तद् विलोक्यते। विलक्षणानि भूतानि तत्तत् कार्यं तथाविधम्।।11।। स्वीये स्वस्मिन्निवाचारः कथं तत्परिशोधय। इस संसार में स्वयं से अथवा अपना उपकार करनेवालों से प्रेम आदि हो जाते हैं। यदि न हो तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरे प्राणियों में भी ऐसा देखा जाता है। ये प्राणी भी अजीब हैं। उनके वे प्रत्येक कार्य उन्हीं के जैसे होते हैं। अपने से सम्बद्ध पदार्थों में अपने जैसा व्यवहार तथा उस व्यवहार का शोधन कैसे होगा? श्रुतिस्मृतिपुराणेषु सर्वत्र प्रतिपादितम्।।12।। सर्वात्मनापि चैतन्यं सर्वमात्मनि नापरम्। वेद, स्मृति और पुराणों में सर्वत्र यह प्रतिपादित किया गया है कि आत्मा के कारण चैतन्य है और वह चैतन्य आत्मा में स्थित है, वह भिन्न नहीं है। सुतीक्ष्ण उवाच कथं तत्त्वज्ञ सर्वेषां नैवं रूपेण दृश्यते। कदाचिदपि कस्यापि यथैतच्चेदृशं वद।।13।। सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे तत्त्वज्ञानी अगस्त्य! इस प्रकार से सभी प्राणियों का चैतन्य क्यों नहीं दिखाई पड़ता है? कभी कभी किसी की दृष्टि में जिस प्रकार उपर्युक्त तथ्य प्रकट होते हैं, यह कहें। अगस्त्य उवाच लोके तत्तन्न जानाति यद्यदेवाभिमर्षितम्। तत्तज्ज्ञानादृष्टहान्या तत्रैवान्तर्हितं तपः।।14।। अगस्त्य बोले- इस संसार में जो विषय सम्पर्क में नहीं आते, उन विषयों को लोग नहीं जान पाते हैं। उन विषयों के सम्पर्क से ज्ञान हो जाने पर तथा भाग्य क्षीण हो जाने के कारण तप अर्थात् इन्द्रिय निग्रह आदि तिरोहित हो जाते हैं अर्थात् जीव विषयों में रम जाता है।।

(168) अगस्त्य-संहिता बुभुत्सुः कर्मतत्त्वज्ञो दृष्टिमानप्रमादितः। यदि पश्येत् परं ज्योतिरेकं सर्वत्र पश्यति।।15।। कर्म के तत्त्वों को जाननेवाला भोग चाहनेवाला भी यदि सावधान होकर दृष्टि रखते हुए देखे तो उस एकमात्र परम ज्योति का दर्शन सर्वत्र करेगा। यद्यनन्यमनाः पश्येद्विद्रुक्षुर्विषयेष्वपि। तच्चैतन्यं वरं पश्येन्नान्यत् किञ्चिदपि स्वयम्।।16।। यदि चैतन्य का दर्शनाभिलाषी बिना दूसरी ओर ध्यान दिए विषयों में देखे तो वही श्रेष्ठ चैतन्य स्वयं दिखाई पड़ेगा, दूसरा कुछ भी नहीं। पापिष्ठाः क्रूरकर्माणस्ततो नित्यं बहिःकृताः।। तत्तत्फलार्थिनः सर्वे कथं पश्यन्ति तद् वद।।17।। जो पापी हैं, क्रूर कार्य करते हैं और इस कारण वे सदा बहिष्कृत रहते हैं वे अपने क्रूर कर्म का भी फल चाहते हैं, वे कैसे चैतन्य को देखते हैं, यह कहिए। करस्थं नैव जानाति पुमान् विषयनिश्चलः। अत्यन्तान्तर्हितं वेत्ति विजिज्ञासुरतथाविधः।।18।। विषयों में सदा आसक्त लोग अपनी हथेली पर स्थित उस परम ज्योति को इस विधि से नहीं जान पाते और चैतन्य को जानने की इच्छा रखनेवाले उसे अत्यन्त प्रच्छन्न मान लेते हैं। पश्य सर्वात्मना सर्वं सर्वत्रापि तपोनिधे। प्रकाशते स्वयं साक्षात् सच्चिदानन्दलक्षणः।।19।। हे तपोनिधे! हर प्रकार से सबकुछ देखो कि हर जगह साक्षात् सत् चित् और आनन्द स्वरूप भगवान् प्रकाशित हैं। ततोऽस्ति न परं किञ्चिद् वासत् तत् तद् विलक्षणम्।¹ तत्तिरस्करिणीं प्राहुरविद्यां ज्ञानिनामपि।।20।। उनसे परे कुछ भी नहीं है, असत् भी नहीं है, अपरिभाषित कोई तत्त्व नहीं है। उस भगवान् और प्राणी के बीच ज्ञानियों में भी एक पर्दा है, जिसे अविद्या कहते हैं।

  1. घ. ततोऽस्मान्न परं किञ्चिद् बाह्यमेतद्वि लक्षणम्।

त्रयोविंशोऽध्यायः (169) व्यामोहयति चेतांसि विषयेषु बलान्मुने। दृष्टा स्यात् सर्वजन्तूनां सुखदुःखादिलक्षणा। 1 ।।21।। वह अविद्या चित्त को मोह में डालकर विषयों में जबरदस्ती लगाती रहती है। सुख और दुःख इसी अविद्या का लक्षण है। यह अविद्या सभी प्राणियों में देखी जाती है। अदृष्टान्तर्हिताः सर्वे नापि सर्वत्र संस्थितम्। पश्यन्ति पुरतः साक्षाच्चैतन्यं सर्वगोचरम् ।।22।। इसी अदृष्ट अविद्या से ढके हुए सभी लोग सर्वत्र विद्यमान् और सामने में स्थित सर्वगोचर चैतन्य को नहीं देख पाते हैं। शुद्धिमानप्रमत्तो यः कदाचिद् विषयैरपि। नैव प्रलोभितः साक्षादात्मानं परमीक्षते ।।23।। जो शुद्ध आचरण करनेवाले और प्रमाद रहित हैं, उन्हें विषय कभी लुभा नहीं पाते और वे परम आत्मा को साक्षात् देखते हैं। एवंविधोऽपि यः कश्चित् सच्चिदानन्दलक्षणम्। आत्मानं सर्वगं सम्यक् जानात्येव न संशयः ।।24।। इस प्रकार भी कोई व्यक्ति सत् चित् और आनन्द-स्वरूप सबके द्वारा प्राप्त करने योग्य आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, इसमें सन्देह नहीं। स जीवन्नेव मुक्तः स्याद्यद्येवं वायुमानयेत्। बहिः सर्व समानीय चैतन्यं स्वगतं पुनः।।25।। यदि मनुष्य अपने अन्दर अवस्थित वायु को रेचक क्रिया के द्वारा बाहर लावे और चैतन्य को अपने अन्दर स्थापित करे तो इसी जीवन में मुक्त हो जाते हैं। पूरकेनैव योगेन सर्वतः स्थितमन्ततः। सम्यगाधाय चाधारे ध्यायेद् राममनन्यधीः।।26।। प्राणायाम के अन्तर्गत पूरक के योग से (वायु को भीतर करते हुए) सर्वत्र स्थित श्रीराम को अन्ततः आधार-चक्र पर स्थापित कराकर एकाग्र होकर ध्यान करना चाहिए। शरीरान्तर्गतं वायुं दशधा तत्र तत्र तु। एकीकृत्य प्रयत्नेन कुम्भकेनैव योगतः 2 ।।27।।

  1. घ. दृष्टा स्यात् सुखदुःखादाविच्छाद्वेषादिलक्षणा। 2. घ. यत्नतः।

(170) अगस्त्य-संहिता —————————————————————— तत्रैव सुदृढं बद्ध्वा पवनं सात्मना समम्। स्थित्वैवं तु मुहूर्ताद्धेर्मुन्मीलय मुखं मुने।।२८।। शरीर के अन्दर में स्थित वायु को दश प्रकार से प्रयत्नपूर्वक कुम्भक द्वारा एकीकृत कर वहीं पर दृढ़ रूप से वायु को आत्मा के साथ बाँधकर इस तरह आधा मुहूर्त (24 मिनट) स्थिर रहें, तब मुख खोलें। सुषुम्णायाः प्रयत्नेन सम्यक् सर्पमुखाकृतिः। वायुना पूरकाभ्यासं कर्तव्यं साधयेत्ततः¹।।२९।। ग्रन्थिभेदक्रमेणैव चैतन्यानि समीरणैः। सुषुम्णा नाड़ी के प्रयत्न से सर्प के समान मुख की आकृति बनाकर वायु से पूरक का अभ्यास करना चाहिए। तब ग्रन्थियों एक एक कर वायु से भेदन कर विभिन्न स्तर के चैतन्यों की साधना करनी चाहिए। उन्नीय पवनं यत्नात् कुर्यात् तन्मुखगोचरम्।।३०।। चिद्घनानन्दचैतन्यसमीरस्तन्मुखागतः ² , । नयेदूर्ध्वं परन्नुन्नं³ पुनः पुनरपि स्वयम्।।३१।। अभ्यासातिशयेनैव भिनत्यूर्ध्वमनन्यधीः। वायु को खींचकर यत्नपूर्वक उसे मुखेन्द्रिय में संचारित करावें। यह चित् स्वरूप और आनन्द स्वरूप चैतन्य रूप वायु तब मुख में आ जाती है। बार बार धकेलते हुए उसे स्वयं ऊपर की ओर ले जायें। अतिशय अभ्यास करने से एकाग्रचित्त साधक ऊपर मूर्द्धा का भेदन कर लेता है। तत्परं परया⁴ तत्र निःसृतान्तरगोचरः।।३२।। भूमौ वीरासनं बद्धमन्तरालं नयेदपि। इसके बाद परा चक्र से निर्गत तथा बीच में स्थित पवन को वहाँ बीच में लावें। भूमि पर वीरासन में बैठकर यह योग करें। पुनर्यदिवमेवायं द्वितीयमपि भेदयेत्।।३३।। तदन्तान्तर्गतो वायुः शरीरं चोर्ध्वमानयेत्। फिर इसी प्रकार दूसरे चक्र का भी भेदन करना चाहिए। उस चक्र के भीतर जाकर वायु शरीर को ऊपर उठाता है। ——————————————————————

  1. घ. कर्तव्यस्तेन। 2. ग. विधूतानन्द°, घ. विमलानन्द° । 3. घ. परं मूर्द्धनं। 4. घ. उद्धृत्यापूर्य्य तत्रैव।

त्रयोविंशोऽध्यायः (171) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — हृदयग्रन्थिभेदेन • सम्यगभ्यासयोगतः ।।34।। तत्र सन्धिषु सम्बद्धं तत्ताल्वाद्यन्तगो मरुत्। सम्यक् संशोध्य स्वं देहं भ्रूमध्यमुपसर्पति।।35।। भलीभाँति अभ्यास करने पर हृदय की ग्रन्थि का भेदन करने से वहाँ सन्धियों से होकर वायु तालु आदि प्रदेशों में संचरित होकर अपने शरीर का संशोधन कर भ्रू-मध्य में चली जाती है। तत्र स्याद् द्विद्ले पद्मे सुधानिधिरलौकिकम्। अनृतं बाहयेत्तेन अमृतत्वाय कल्पते।।36।। वहाँ द्विदल कमल में अमृत का अलौकिक खजाना है। इस अमृत के प्रवाह में असत्य को प्रवाहित करावें अर्थात् उसका शोधन करें। इससे अमरत्व की प्राप्ति होती है। भेदेन पञ्चमस्येव पर्वणोऽधिगते पुनः। शब्दब्रह्मापि निखिलं तेन¹ सर्वज्ञता भवेत् ।।37।। पाँचवीं गाँठ के खुल जाने पर पर्वों का ज्ञान होने पर उनमें स्थित शब्दब्रह्म की गाँठ खुल जाती है, तब वह सर्वज्ञ हो जाता है। मूलाधारे स्थितं वायु सुषुम्नानाडिमध्यगम्। तत्तद् ग्रन्थिविभेदेन ब्रह्मरन्ध्रं नयेदपि ।।38।। मूलाधार में स्थित वायु जो सुषुम्णा नाडी से होकर गजरती है, उस वायु के वेग से बीच में स्थित ग्रन्थियों को खोलते हुए वायु को ब्रह्मरन्ध्र में ले जायें। पूर्वोक्ताभ्यासयोगेन द्वादशान्तर्गतं पुनः। तदेव निखिलं ज्ञानं जन्मापि सफलं ततः।।39।। पूर्वोक्त प्रकार से अभ्यास करते हुए द्वादशार चक्र तक जब वायु पहुँच जाती है, तब समग्र ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे यह जन्म भी सफल हो जाता है। वैराग्येण तदप्येति त्यागेनैव हि तत्परम्। संन्यासेनैव योगीन्द्र नान्यो मार्गोऽस्ति तस्य तु।।40।।


  1. ग. येन। Rarest Archiver

(172) अगस्त्य-संहिता हे योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! वैराग्य से ही वह स्थिति भी आती है, त्याग से ही उससे भी ऊपर की स्थिति आती है। यह सब संन्यास से सिद्ध होता है। इस पृथ्वी पर इससे भिन्न कोई रास्ता नहीं है। बहिरन्तर्गतं कृत्वा मूलाधाराच्च चिन्मयम्। द्वादशान्तं समुत्क्रम्य यावन्नावर्तते पुनः॥41॥ बाहर स्थित चैतन्य को अपने अन्दर लेकर तथा मूलाधार से चित् तत्त्व लेकर द्वादशार चक्र को पारकर साधक पुनः लौटता नहीं, अर्थात्, मुक्त हो जाता है। योगीन्द्र मुक्तिमार्गोऽयं सर्वस्मिन्नपि दर्शने। नैवाप्यत्र मतं भिन्नं सर्वैरपि सुशोभितम्॥42॥ योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! सभी दर्शनों में कहा गया यह मुक्ति का मार्ग है। यहाँ मत में कोई भिन्नता नहीं है और इसे सबने सँबारा है। विरजेत् संन्यसेद् ब्रह्म साक्षात्कुर्यात् सुखी भवेत्। पुरुषार्थोऽयमेवात्र नातः किञ्चिन्न विद्यते॥43॥ रजोगुण से निवृत्त होकर कर्मों को सौंपकर ब्रह्म से साक्षात्कार कर जीव सुखी हो जाता है। यही इस लोक में पुरुषार्थ है, इससे आगे कुछ भी नहीं है। अखण्डानन्दयोगेन नैवात्मानं वियोजयेत्। स्ववर्णाश्रमधर्मेण नैव तावद् वियोजयेत्।¹॥44॥ अखण्ड आनन्द के साथ आत्मा का कभी विच्छेद न करावें। अपने वर्ण और आश्रम के कारण यह विच्छेद न करावें। इदं सत्यमिदं सत्यं सत्येनैवाति वर्तयेत्। रामः सत्यं परं ब्रह्म रामात् किञ्चिन्न विद्यते॥45॥ यह सत्य है, यह सत्य है। इस सत्य के विपरीत आचरण न करें। श्रीराम परम सत्य हैं, परम ब्रह्म हैं। श्रीराम से आगे कुछ भी नहीं है। सर्वशास्त्ररहस्यज्ञ मया तव महात्मनः। अगस्ति-संहिता नाम प्रोक्तेयं सर्वकामधुक्॥46॥ अध्यात्मालोकने दीपकलिकाज्ञाननाशिनी। भोगमोक्षप्रदा नित्यमायुरारोग्यवर्द्धिनी॥47॥

  1. ग. में अनुपलब्ध।

चतुर्विंशोऽध्यायः (173) सभी शास्त्रों का रहस्य ज़ाननेवाले हे सुतीक्ष्ण! आप महात्मा हैं, इसलिए मैंने आपको अगस्त्य-संहिता सुनायी, जिससे सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। अध्यात्म को प्रकाशित करनेवाली और अज्ञान का नाश करनेवाली यह दीपशिखा है। यह नित्य रूप से भोग और मोक्ष देनेवाली है, आयु और आरोग्य बढ़ानेवाली है। श्रुता दृष्टापि लिखिता बहिरन्तश्च पावयेत्। आदिमध्यावसानान्तं यः सकृद् वा निरीक्षयेत्।।48।। पापात्मापि समुत्क्रम्य ब्रह्मभूयाय कल्पते। सर्वदालोकयेद्यस्तु ब्रह्मविद् याति सद्गतिम्।।49।। प्राप्नोति लोकमखिलं सद्योऽभीष्टमवाप्नुयात्। इस ग्रन्थ के श्रवण, दर्शन और लेखन से बाहर-भीतर पवित्र हो जाता है। इसका आदिभाग, मध्यभाग अथवा अन्तभाग का एक बार भी कोई दर्शन करे तो पापी भी उससे निकलकर ब्रह्मलीन हो जाता है। प्रतिदिन जो इसका दर्शन करते हैं, वे ब्रह्मज्ञानी होकर उत्तम गति प्राप्त करते हैं, सभी लोकों को प्राप्त करते हैं तथा तुरत अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं। पुस्तकं लिखितं यस्य¹ गृहे तिष्ठति पूजितम्।।50।। आयुरारोग्यमैश्वर्यं वर्द्धतेऽस्य दिने दिने। पुत्रैः पौत्रैः कुलं वास्य वर्द्धते सुश्रिया सह²।।51।। जिनके घर में इस लिखित एवं पूजित पुस्तक रहती है, उनकी आयु आरोग्य और ऐश्वर्य प्रतिदिन बढ़ते हैं। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि से उनका वंश सुन्दर लक्ष्मी के साथ बढ़ता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये योगवर्णनम् नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः। अथ चतुर्विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अयमेव परो मार्गः कर्माप्येतत् परात् परम्। राम एव परं ज्योतिः सच्चिदानन्दलक्षणम्।।1।।

  1. ग. सम्यक्। 2. क. पुत्रपौत्रप्रपौत्राद्यैः कुलं वास्य प्रवर्द्धते ।

(174) अगस्त्य-संहिता

अगस्त्य बोले- यही मुक्ति का सबसे उत्तम मार्ग है और यहीं सर्वश्रेष्ठ कर्म है। राम ही परम ज्योति हैं, जो सत् स्वरूप, चैतन्यस्वरूप और आनन्दस्वरूप हैं। परं ज्योतिः परञ्चात्मा तथैव द्वयमोक्षयोः।¹ अन्त्याद्ययोर्यकारस्य द्वितीयादिस्वरान्तयोः ॥२॥ श्रीराम परम ज्योतिःस्वरूप हैं, इस संसार की परम आत्मा हैं और उसी प्रकार आदि और अन्त के द्वन्द्व स्वरूप जन्म और मोक्ष की परम ज्योति हैं। यकार अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति की भी परम ज्योति हैं। द्वितीया शक्ति अर्थात् माया से स्वर्ग तक की परम ज्योति है। श्रुतिस्मृतिपुराणानि सम्यगालोक्य निश्चितम्। वसिष्ठवामदेवाद्यैर्नारदाद्यैश्च यत्नतः ॥३॥ वसिष्ठ, वामदेव आदि ऋषि और नारद आदि भक्तों ने वेद, स्मृति, और पुराणों का यत्नपूर्वक भलीभाँति अनुशीलन कर ऐसा निश्चय किया है। यज्ञोऽयमस्माद् भूतानि , जङ्गमाजङ्गमं ततः। इतरेतरमिश्रेभ्यस्तेभ्यो भूतानि यज्ञिरे ॥४॥ श्रीराम यज्ञस्वरूप हैं, जिससे स्थावर और जंगम प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और स्थावर एवं जंगम प्राणियों में एक दूसरे के मिश्रण से अन्य प्राणियों की भी उत्पत्ति हुई है। शब्दप्रकाशमानोऽयं तत एष विनिर्गतः। व्यस्त एव तु शारीरः परः सारविलक्षणः ॥५॥ शब्द को द्वारा प्रकाशित जो यह मन्त्र है, वह भी श्रीराम से ही निर्गत हुआ है, जो परम सारमय मन्त्रों में विलक्षण है, वह व्यस्त रूप में , पृथक् रूप में शरीर से सम्बद्ध है अर्थात् शरीर के अवयव मुख से उच्चरित होने योग्य है, वैखरी नाद है। पञ्चाशद्वर्णरूपेण सोऽप्यनेकविधो भवेत्। पदवाक्यादिना यस्य शब्दस्यान्तो न विद्यते ॥६॥ पचास वर्णों के रूप में वह मन्त्र भी अनेक प्रकार का है। यह मन्त्र पद, वाक्य आदि के भेद से शब्द रूप में अनगिनत है।

  1. ग. द्वयमाश्रयोः।

_ _ _ _ _ चतुर्विंशोऽध्यायः (175) तस्य कारणरूपत्वादभिधानाभिधेययोः। उपास्यं परमं लोके तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।7।। यान्त्यं प्रकाशयेत् सर्वं परं ज्योतिः स्वतः परम्। यादिरभ्युदयात्मत्वात् सर्वदाभ्युदय कृत् ।।8।। वह मन्त्र अभिधान अर्थात् सगुण श्रीराम और अभिधेय अर्थात् परब्रह्म श्रीराम दोनों का कारण है, अतः संसार में यह परम उपास्य है; क्योंकि इसी मन्त्र में सबकुछ प्रतिष्ठित है। यह यकारान्त शब्द 'अभय' को प्रकाशित करता है और यह परम ज्योतिस्वरूप और अपने आप उत्पन्न है। मन्त्र यकारादि यज्ञस्वरूप है अतः वह सर्वदा अभ्युदय का कारक है। अतो यत्नेन जप्यन्तु भुक्तिमुक्तिपरीप्सुना। अतः श्रुतेः परं नास्ति तदेतद् वाचको मनुः ।।9।। अतः प्रयत्नपूर्वक भोग और मोक्ष चाहनेवालों के द्वारा इस मन्त्र का जप करना चाहिए। श्रीराम के वाचक वे मन्त्र हैं और इस श्रुति से ऊपर कुछ भी नहीं है मनूनामपि सर्वेषामयमेव विशिष्यते। अयमेवान्तमुत्सृज्याकारमेकाक्षरो मनुः ।।10।। सभी मन्त्रों में यह 'राम' मन्त्र है, वह विशिष्ट है। अन्तिम अकार त्याग कर देने से 'राम्' (रां) यह एकाक्षर मन्त्र बन जाता है। उपास्य मनोयज्ञोयमुत्पादयति तत्परम्। यद्येतत् त्रितयं याति नत्या सह समुद्रितम् ।।11।। मायामन्मथवेदादिपूर्वो व्युत्क्रमपूर्वकः। यह मानस यज्ञ श्रीराम की उपासना कर इस यज्ञ से भी विशिष्ट यज्ञ उत्पन्न करता है। (यज्ञेन यज्ञमयजन्त) तब यह मन्त्र 'नति' (नमः) के स माया(ह्रीं) मन्मथ (क्लीं) और वेद (ॐ) के पूर्व में प्रयोग से तीन प्रकार के जातें हैं- ॐ रामाय नमः, ह्रीं रामाय नमः एवं क्लीं रामाय नमः। श्रीबीजान्त्योऽयमेव स्यात्तदाद्यो वा षडक्षरः ।।12।। यदि नत्यन्तसहितं तद्द्वयं वापरो मनुः। पञ्चवर्णात्मकस्तस्माद्यस्मात् सर्वं प्रजायते ।।13।।

(176) अगस्त्य-संहिता इसी मन्त्र के अन्त में श्रीबीज (श्रीं) लगाने पर पहला षडक्षर मन्त्र होगा- रामाय नमः श्रीं। यदि केवल 'नति' (नमः) अन्त में जोड़ें अथवा ॐ, ह्रीं, क्लीं में से एक आदि में और श्रीबीज (श्रीं) अन्त में जोड़ें तो अन्य मन्त्र हो जाएँगे। जैसे- रामाय नमः, ॐ रामाय श्रीं, ह्रीं रामाय श्रीं, क्लीं रामाय श्रीं। ये पंचवर्णात्मक चार प्रकार के मन्त्र इससे बनेगें; क्योंकि मन्त्र से सब कुछ उत्पन्न होते हैं। चन्द्रान्तः परमो मन्त्रो भद्रान्तश्चतुरक्षरः। ऐहिकामुष्मिकं वास्याप्युक्तमेव फलं विदुः॥14॥ 'चन्द्र' शब्द अन्त में जोड़कर तथा 'भद्र' अन्त में जोड़कर चार अक्षर वाले मन्त्र बनते हैं- 'रामचन्द्र' 'रामभद्र'। इन मन्त्रों के भी पूर्व में कहे गये लौकिक और पारलौकिक फल कहे जाते हैं। श्रीमायामन्मथैकैकबीजाद्यन्तर्गतो मनुः। षडक्षरः स एवं यः स मन्त्रश्चतुरक्षरः॥15॥ श्रीबीज, (श्रीं) मायाबीज (ह्रीं) और कामबीज (क्लीं) में से एक एक बीज से सम्पुटित कर यह चतुरक्षर मन्त्र षडक्षर मन्त्र बन जाता है। तारमायारमानंगबीजपूर्वः स एव हि। अक्षरोऽनेकधा प्रोक्तः सर्वाभीष्टफलप्रदः॥16॥ यह षडक्षर मन्त्र तार (ॐकार), माया (ह्रीं), रमा (श्रीं) और अनंग (क्लीं) के पूर्व प्रयोग से अनेक प्रकार का कहा गया है, जिससे सभी मनोरथ पूरे होते हैं। चन्द्रभद्रनमस्कारैस्तत्तद्बीजैश्च योजितः। षट्सप्ताष्टनवादित्येनवं भिन्नोऽप्यनेकधा॥17॥ चन्द्र, भद्र, नमः और उपर्युक्त बीजाक्षरों के योग से षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर, नवाक्षर आदि अनेक मन्त्रों के रूप में विभिन्न प्रकार के होते हैं। एकादित्वेन बहुधा स्वयं रामेत्यतः परम्। सर्वाभीष्टप्रदत्वेनानन्तत्वेनापि भिद्यते॥18॥ एकाक्षर आदि मन्त्र के उपरान्त ॐ राम ऐसा जोड़कर सभी मन्त्र इच्छित फल देने के कारण कामना की दृष्टि से तथा अनन्त स्वरूप की दृष्टि से मन्त्रों के अनेक भेद होते हैं।

चतुर्विंशोऽध्यायः (177) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — पादाद्यात्मा पदाद्यात्मा तद्विशेषे विशिष्यते। स एव भिद्यतेऽनन्तभेदेनाप्यधिकारिणाम्।।19।। कुछ मन्त्र पाद अर्थात् चरणस्वरूप होते हैं तो कुछ पद अर्थात् शब्दस्वरूप होते हैं। इस विशेषता के कारण भी मन्त्र अनेक प्रकार के होते हैं। वही मन्त्र असंख्य प्रकार के अधिकारी के भेद से भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। मन्त्राणामृषिरेतेषां ब्रह्माागस्त्यः शिवोऽह्यहम्। छन्दो गायत्रमेवाहुर्देवता राम उच्यते।।20।। पूर्वापरबीजशक्ती भुक्तिमुक्तिप्रयोजनम्। आद्यन्तयुक्तबीजेन षडङ्गं पल्लवैः सह।।21।। इन मन्त्रों के ऋषि ब्रह्मा, शिव और मैं अगस्त्य हूँ। छन्द गायत्री ही कहा गया है और देवता श्रीराम कहे गये हैं। आदि और अन्त में लगाये गये बीज शक्तियाँ हैं तथा भोग और मोक्ष प्रयोजन है। आदि और अन्त में प्रयुक्त बीजों के तथा पटल विस्तार के साथ मन्त्र के छह अंग होते हैं। भालमस्तकयोर्वामदक्षयोश्च भ्रुवोर्दृशोः। कर्णयोर्घाणयोर्हन्वोरोष्ठयोर्दन्तमूलयोः ।।22।। जिह्वामूलकण्ठयोश्च ककुदोः कुचयोरपि। अंसयोर्भुजयोश्चैव पार्श्वयोः कुक्षिहृत्कयोः।।23।। पृष्ठनाभ्योश्च सक्थिन्यूर्वोः जान्वोश्च जंघयोः पदोः। विन्यसेच्छक्तिबीजानि सीतारामस्वरूपकम्।।24।। विन्यसेत् संहृतिन्यासं पादादिकशिरस्यपि। उत्पत्तिन्यासमप्यत्र नाभ्यादिरधरोत्तरम्।।25।। न्यसेत् प्रत्यक्षरं न्यासं मूर्तिन्यासमतः परम्। तत्त्वन्यासं केशवादिन्यासमप्यथ विन्यसेत्।।26।। सर्वाङ्गमपि सर्वेण मन्त्रेणापि प्रविन्यसेत्। ललाट, मस्तक, बायाँ भौंह, दायाँ भौंह, बायीं आँख, दायीं आँख, दोनों कान, दोनो टुड्डी, दोनों होठ, दोनों जबड़े, जिह्वामूल, कण्ठ, गले का दोनों टेंटुए, दोनों कंधे, दोनों बाहें, दोनों पार्श्व, कोख, हृदय, पीठ, नाभि, दोनो जाँघों की हड्डियों, दोनों जाँघों का मांसल भाग, दोनों पैर इन स्थानों में शक्तिबीजों से

(178) अगस्त्य-संहिता

श्रीसीताराम के स्वरूप न्यास करें। तब प्रत्येक अक्षर से संहारन्यास करें जो पैरों से लेकर मस्तक तक के क्रम से होता है तथा इसके बाद नाभि से प्रारम्भ कर ऊपर नीचे उत्पत्तिन्यास करें। तब मूर्तिन्यास करें, तब तत्त्वन्यास के बाद केशवादिन्यास करें। अन्त में, सभी मन्त्रों से सर्वाङ्गन्यास करें। ध्यायेद् हृत्पुण्डरीकाक्षं परं ज्योतिः परात्परम् ।। २७ ।। तत्रैव देवमभ्यर्च्य मानसैरुपचारकैः । जपेत् क्वचन चैकान्ते रामं ध्यायन्ननन्यधीः ।। २८ ।। इसके बाद हृदयरूपी कमल के समान आँखोंवाले परम ज्योतिर्मय, परात्पर पुरुष का ध्यान करें। वहीं मानसोपचार से देवता की अर्चना कर कहीं एकान्त स्थान में श्रीराम का ध्यान एकाग्र होकर करते हुए जप करें। नीलजीमूतसंकाशं विद्युद्वर्णाम्बरावृतम् । सन्तप्तकाञ्चनप्रख्यां सीतामङ्कगतां पुनः ।। २९ ।। अन्योन्याश्लिष्टहृद्बाहुनेत्रं पश्यन्तमादरात् । दक्षिणेन कराग्रेण कुचाग्रे चञ्चलालकम् ।। ३० ।। स्पृशन्तं वलनोत्सङ्गैः¹ परिहासे मुहुर्मुहुः । विनोदयन्तं ताम्बूलचर्वणैकपरायणम् ।। ३१ ।। सर्वरूपोज्ज्वलद्वन्द्वं² योषित्पुरुषयोरिव । श्रीरामसीतयोः सर्वसम्पत्करविधायकम् ।। ३२ ।। श्रीराम नीले मेघ के समान हैं और विद्युत् से समान वर्ण (पीत) के वस्त्र पहने हुए हैं और तपे हुए सोने के समान आभा वाली सीता उनकी गोद में बैठी हुई हैं। एक दूसरे के हृदय, बाहें और नेत्र मिले हैं, जिसे श्रीराम आदर के साथ देख रहे हैं। दाहिने हाथ की अंगुलियाँ श्रीसीता के स्तनाग्र पर लटके चंचल लटों को बार बार परिहास में घेर कर आलिंगन कर छू रही हैं। श्रीराम पान चबा रहे हैं, सभी रूपों में उज्ज्वल रहनेवाले युगलस्वरूप स्त्री और पुरुष के समान श्रीसीताराम का ध्यान करें, जो सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं। जपहोमार्चनादीनि कुर्यात् कर्माणि सन्ततम् । यत्किञ्चिदप्यनन्तं स्यात् सत्यं सत्यं न संशयः ।। ३३ ।।

१. ग. च ततो त्याग=| २. ग. पूर्वरूपोज्ज्वलद्वन्द्वं ।

चतुर्विंशोऽध्यायः (179) तब निरन्तर जप, होम, पूजा आदि कर्म करें। इससे जो कुछ भी होगा, वह अनन्त फलदायक हो जायेगा, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। तदेतद्वाचको मन्त्रः सर्वस्यार्थस्य साधकः। सदसद्वाचकश्चायं मन्त्रो विजयते परः।।34।। मन्त्र सार्थक हो या अनर्थक, सभी प्रयोजनों के साधक हो जाते हैं। सार्थक या अनर्थक परम मन्त्र की जीत होती है। रामात्मनो मनोः सद्यः स्मरणात् कीर्तनादपि। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं कृत्याप्यकल्मषम्।।35।। श्रीराम के स्वरूप मन्त्र स्मरण करने और कीर्तन करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को शीघ्र निष्पाप बनाते हैं। संचिनोति नरो मोहाद्यद्यत्तदपि नाशयेत्। ग्राम्यारण्यपशुघ्नत्वं संचितं दुरितं च यत्।।36।। निःशेषं नाशयत्येव रामात्मा द्वयक्षरो मनुः। मनुष्य मोहवश जो जो पाप संचित करते हैं, उन्हें भी ये मन्त्र शीघ्र नाश कर देते हैं। गाँव या जंगल में रहनेवाले पशु की हत्या का जो संचित पाप है, उसे श्रीराम स्वरूप दो अक्षरों वाला 'राम' मन्त्र पूर्णतः नष्ट कर देता है। ^1तन्मृष्यवाक्य कोपादिभावोद्भावकृतार्चिनः।।37।। मद्यपानेन^2 यत्पापं तदप्याशु विनाशयेत्। अभक्ष्यभक्षणात्^3 पापं मिथ्याज्ञानसमुद्भवम्।।38।। सर्वं विलीयते राममन्त्रस्यास्यैव कीर्तनात्। मिथ्या भाषण, क्रोध आदि के कारण उत्पन्न पाप, उद्भाव (उपेक्षा), आग लगाने आदि का पाप तथा मद्यपान से जो पाप होता है उसे शीघ्र यह विनष्ट करता है। अभक्ष्य वस्तुओं के खाने से जो तथा मिथ्या ज्ञान के कारण उत्पन्न पाप श्रीराम के इसी मन्त्र के जप से विलीन हो जाते हैं। श्रोत्रियस्वर्णहरणाद्यच्च पापमुपार्जितम्।।39।। रत्नादेरपहारेण तदप्याशु विनाशयेत्।। वैदिकों का सोना चुराने या छीनने से, रत्न आदि छीनने से जो पाप संचित होता है, उसे भी यह मन्त्र यह शीघ्र नाश कर देता है।

  1. घ. में अनुपलब्ध। 2. ग. मधुपानेन । 3. ग. अभक्षणाय। Rarest Archiver

(180) अगस्त्य-संहिता गत्वा तु मातरं मोहादगम्यायाश्च योषितः।।40।। उपास्यानेन मन्त्रेण समं तदपि नाशयेत्।। मोहवश मातृतुल्य नारी तथा अगम्या से मैथुन करने का पापी इस मन्त्र की उपासना कर उस पाप को नष्ट कर लेते हैं। महापातकपापिष्ठसंगत्या सञ्चितञ्च यत्।।41।। नाशयेत् तत् कथालापशयनासनभोजनैः। महापातकी और अन्य पापियों की संगति करने से जो पाप संचित होता है, वे श्रीराम की कथा की चर्चा, श्रीराम के मन्दिर में शयन, उपवेशन (बैठने) और प्रसाद खाने से नष्ट हो जाते हैं। पितृमातृवधोत्पन्नं बुद्धिपूर्वक मव्यम्।।42।। निःशेषं नाशयेत्येव कालत्रयसमुद्भवम्। भ्रातृमित्रसुहृद्यानां यद्वा विश्वासघातिनाम्।।43।। यद् वा बालवधोत्पन्नं विषशस्त्रास्त्रमायिकम्। गुरुपुत्रकलत्रादिवधोत्पन्नं दुरात्मनाम्।।44।। तदनुष्ठानमात्रेण सर्व एव¹ विलीयते। माता-पिता के वध से उत्पन्न, जान-बूझकर किये गये तथा तीनों कालों में उत्पन्न पाप को यह मन्त्र नष्ट करता है। भाई, मित्र और अन्य प्रिय लोगों के साथ विश्वासघात का पाप, बाल-हत्या तथा विष देकर, शस्त्र-अस्त्र से अथवा जादू-टोना से की गयी हत्या का पाप अथवा गुरु, पुत्र, स्त्री आदि की हत्या का पाप जो दुरात्माओं को होता है, वह पाप श्रीराम के मन्त्र का अनुष्ठान मात्र करने से नष्ट हो जाता है। तत् सद्गुरूपदिष्टेन वर्तनानुष्ठितं पुनः।।45।। रामात्मा मन्त्र एवायं पापराशिनिरासकृत्। इसलिए सद्गुरु के उपदेश से मण्डल में अनुष्ठान किया गया यह श्रीराम स्वरूप मन्त्र पापराशि को निरस्त करनेवाला है। यत्रयागादितीर्थोत्थप्रायश्चित्तादिकैरपि ।।46।। नैवापयुज्यते पापं तदप्याशु विनाशयेत्।

  1. ग. एप। Rarest Archiver

पञ्चविंशोऽध्यायः (181) प्रयाग आदि तीर्थों में प्रायश्चित्त आदि करने से भी जो पाप नष्ट नहीं होते हैं, उन्हें भी यह मन्त्र शीघ्र नष्ट कर देता है। पुण्यक्षेत्रेषु सर्वेषु कुरुक्षेत्रादिषु स्वयं ।।47।। बुद्धिपूर्वमघं कुर्यात् तदप्याशु विनाशयेत्। कुरुक्षेत्र आदि सभी पुण्यतीर्थों में स्वयं जान बूझकर जो पाप किया जाये, उसे भी शीघ्र विनष्ट कर देता है। आत्मतुल्यसुवर्णादिदानैर्बहुविधैरपि ।।48।। किञ्चिदप्यपरिक्षीणं पापं तदपि नाशयेत्। अपने भार के बराबर सुवर्ण का दान आदि अनेक प्रकार के दानों से जो पाप नष्ट नहीं होता, उसे भी यह मन्त्र नष्ट कर देता है। यद्वातिसञ्चितं पापं मूलबद्धमघञ्च यत् ।।49।। तन्मन्त्रस्मरणादेव निःशेषं तत्प्रणश्यति ।।50।। अथवा अधिक मात्रा में संचित जो पाप है और जो पाप अपनी जड़ें जमा चुका है, मद्यपान आदि से जो पाप होता है, वे सारे पाप इस मन्त्र के स्मरण मात्र से अशेष रूप में नष्ट हो जाते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रमहिमाख्यानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ।।24।। अथ पञ्चविंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच सर्वागमैकतत्त्वज्ञ¹ ब्रह्मनिष्ठ तपोधन। रामात्मनस्त्वया तत्त्वं ब्रह्मणः परमव्ययम् ।।1।। प्रदर्शितं सम्यगेव सुविस्तरमनेकधा। षडक्षरविधानं तु² सम्यक् ज्ञातं मया प्रभो ।।2।। अन्येषां राममन्त्राणामनुष्ठानं कथं मुने।

  1. ग. सर्वेषामेव तत्त्वञ्च। 2. ग. वा ।

: (182) अगस्त्य-संहिता : -------------------------------------------------- : षडक्षरविधानं तु विधानान्तरमस्ति वा ।। ३ ।। : सर्वमेव समाचक्ष्व भक्तस्य त्वयि सुव्रत ।। ४ ।। : सुतीक्ष्ण बोले- हे महामुनि अगस्त्य ! आप सभी आगमों के तत्त्वों को : जानते हैं, ब्रह्म में लीन हैं, तपस्वी हैं, श्रीराम के रूप में जो स्वयं परमात्मा हैं, : उनके विषय में आपने भलीभाँति मुझे समझा दिया है। मैंने षडक्षर मन्त्र भी : भलीभाँति जान लिया है। अब यह बतलाएँ कि श्रीराम के अन्य मन्त्रों का किस : प्रकार अनुष्ठान किया जाता है। क्या केवल षडक्षर विधान ही है या दूसरा भी : कोई विधान है? हे सुव्रत अगस्त्य! मैं आपका भक्त हूँ, इसलिए मुझे सबकुछ कहें। : अगस्त्य उवाच : सुतीक्ष्ण शृणु वक्ष्यामि श्रद्दधानांपते पुनः। : वक्तव्यं तव यत्नेन यतस्त्वं वैष्णवोत्तमः ।। ५ ।। : अगस्त्य बोले- हे श्रद्धालुओ में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! फिर से सुनो। तुम वैष्णवों : में श्रेष्ठ हो, इसलिए मुझे सारे विधान बतला देने चाहिए। : ये शृण्वन्ति कथां विष्णोर्वन्दन्ति चरितं हरेः। : मुक्तकण्ठञ्च गायन्ति हरिं नृत्यन्ति सुन्दरम् ।। ६ ।। : आनन्दाश्रुपरीतात्मा गात्रेषु पुलकाञ्चिताः। : आनन्दनिर्भराश्चैव स्खलन्तश्च¹ पदे पदे। : उच्चैः श्रीराम रामेति वदन्ति च हसन्ति च ।। ७ ।। : एवमादिगुणैर्युक्ताः जनाः² रामसमा हि ते। : ³वैष्णवा मनवाः सर्वे मुक्तिदाः स्युः क्रमेण हि ।। ८ ।। : जो श्रीविष्णु की कथा सुनते हैं, हरि के चरित की वन्दना करते हैं, हरि की : लीलाओं को स्मरण करते हुए मुक्तकण्ठ होकर इसका गान करते हैं। आनन्द के : आँसू से भरे हुए चित्त वाले, पुलकित होकर आनन्दमग्न होकर पग-पग पर : लड़खड़ाती बोली में जोर जोर से 'श्रीराम राम' बोलते हैं, हँसते हैं- इस प्रकार के : गुणों से युक्त होकर जो मानव विष्णु के उपासक हैं, वे श्रीराम के समान हो : जाते हैं। भगवान् विष्णु के सभी मन्त्र मुक्ति देनेवाले हैं, उन्हें क्रम से सुनो। : राममन्त्रास्तु विप्रेन्द्र शीघ्रमुक्तिप्रदाः शृणु। : विनैव दीक्षां विप्रेन्द्र पुरश्चर्यां विनैव हि ।। ९ ।। : -------------------------------------------------- : 1. ग. स्तुवन्तश्च, घ. प्लवन्तश्च। 2. ग. मान्याः । 3. घ. यहाँ से छह पंक्तियाँ : अनुपलब्ध।