अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशोऽध्यायः (177) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — पादाद्यात्मा पदाद्यात्मा तद्विशेषे विशिष्यते। स एव भिद्यतेऽनन्तभेदेनाप्यधिकारिणाम्।।19।। कुछ मन्त्र पाद अर्थात् चरणस्वरूप होते हैं तो कुछ पद अर्थात् शब्दस्वरूप होते हैं। इस विशेषता के कारण भी मन्त्र अनेक प्रकार के होते हैं। वही मन्त्र असंख्य प्रकार के अधिकारी के भेद से भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। मन्त्राणामृषिरेतेषां ब्रह्माागस्त्यः शिवोऽह्यहम्। छन्दो गायत्रमेवाहुर्देवता राम उच्यते।।20।। पूर्वापरबीजशक्ती भुक्तिमुक्तिप्रयोजनम्। आद्यन्तयुक्तबीजेन षडङ्गं पल्लवैः सह।।21।। इन मन्त्रों के ऋषि ब्रह्मा, शिव और मैं अगस्त्य हूँ। छन्द गायत्री ही कहा गया है और देवता श्रीराम कहे गये हैं। आदि और अन्त में लगाये गये बीज शक्तियाँ हैं तथा भोग और मोक्ष प्रयोजन है। आदि और अन्त में प्रयुक्त बीजों के तथा पटल विस्तार के साथ मन्त्र के छह अंग होते हैं। भालमस्तकयोर्वामदक्षयोश्च भ्रुवोर्दृशोः। कर्णयोर्घाणयोर्हन्वोरोष्ठयोर्दन्तमूलयोः ।।22।। जिह्वामूलकण्ठयोश्च ककुदोः कुचयोरपि। अंसयोर्भुजयोश्चैव पार्श्वयोः कुक्षिहृत्कयोः।।23।। पृष्ठनाभ्योश्च सक्थिन्यूर्वोः जान्वोश्च जंघयोः पदोः। विन्यसेच्छक्तिबीजानि सीतारामस्वरूपकम्।।24।। विन्यसेत् संहृतिन्यासं पादादिकशिरस्यपि। उत्पत्तिन्यासमप्यत्र नाभ्यादिरधरोत्तरम्।।25।। न्यसेत् प्रत्यक्षरं न्यासं मूर्तिन्यासमतः परम्। तत्त्वन्यासं केशवादिन्यासमप्यथ विन्यसेत्।।26।। सर्वाङ्गमपि सर्वेण मन्त्रेणापि प्रविन्यसेत्। ललाट, मस्तक, बायाँ भौंह, दायाँ भौंह, बायीं आँख, दायीं आँख, दोनों कान, दोनो टुड्डी, दोनों होठ, दोनों जबड़े, जिह्वामूल, कण्ठ, गले का दोनों टेंटुए, दोनों कंधे, दोनों बाहें, दोनों पार्श्व, कोख, हृदय, पीठ, नाभि, दोनो जाँघों की हड्डियों, दोनों जाँघों का मांसल भाग, दोनों पैर इन स्थानों में शक्तिबीजों से