अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(176) अगस्त्य-संहिता इसी मन्त्र के अन्त में श्रीबीज (श्रीं) लगाने पर पहला षडक्षर मन्त्र होगा- रामाय नमः श्रीं। यदि केवल 'नति' (नमः) अन्त में जोड़ें अथवा ॐ, ह्रीं, क्लीं में से एक आदि में और श्रीबीज (श्रीं) अन्त में जोड़ें तो अन्य मन्त्र हो जाएँगे। जैसे- रामाय नमः, ॐ रामाय श्रीं, ह्रीं रामाय श्रीं, क्लीं रामाय श्रीं। ये पंचवर्णात्मक चार प्रकार के मन्त्र इससे बनेगें; क्योंकि मन्त्र से सब कुछ उत्पन्न होते हैं। चन्द्रान्तः परमो मन्त्रो भद्रान्तश्चतुरक्षरः। ऐहिकामुष्मिकं वास्याप्युक्तमेव फलं विदुः॥14॥ 'चन्द्र' शब्द अन्त में जोड़कर तथा 'भद्र' अन्त में जोड़कर चार अक्षर वाले मन्त्र बनते हैं- 'रामचन्द्र' 'रामभद्र'। इन मन्त्रों के भी पूर्व में कहे गये लौकिक और पारलौकिक फल कहे जाते हैं। श्रीमायामन्मथैकैकबीजाद्यन्तर्गतो मनुः। षडक्षरः स एवं यः स मन्त्रश्चतुरक्षरः॥15॥ श्रीबीज, (श्रीं) मायाबीज (ह्रीं) और कामबीज (क्लीं) में से एक एक बीज से सम्पुटित कर यह चतुरक्षर मन्त्र षडक्षर मन्त्र बन जाता है। तारमायारमानंगबीजपूर्वः स एव हि। अक्षरोऽनेकधा प्रोक्तः सर्वाभीष्टफलप्रदः॥16॥ यह षडक्षर मन्त्र तार (ॐकार), माया (ह्रीं), रमा (श्रीं) और अनंग (क्लीं) के पूर्व प्रयोग से अनेक प्रकार का कहा गया है, जिससे सभी मनोरथ पूरे होते हैं। चन्द्रभद्रनमस्कारैस्तत्तद्बीजैश्च योजितः। षट्सप्ताष्टनवादित्येनवं भिन्नोऽप्यनेकधा॥17॥ चन्द्र, भद्र, नमः और उपर्युक्त बीजाक्षरों के योग से षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर, नवाक्षर आदि अनेक मन्त्रों के रूप में विभिन्न प्रकार के होते हैं। एकादित्वेन बहुधा स्वयं रामेत्यतः परम्। सर्वाभीष्टप्रदत्वेनानन्तत्वेनापि भिद्यते॥18॥ एकाक्षर आदि मन्त्र के उपरान्त ॐ राम ऐसा जोड़कर सभी मन्त्र इच्छित फल देने के कारण कामना की दृष्टि से तथा अनन्त स्वरूप की दृष्टि से मन्त्रों के अनेक भेद होते हैं।