अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें_ _ _ _ _ चतुर्विंशोऽध्यायः (175) तस्य कारणरूपत्वादभिधानाभिधेययोः। उपास्यं परमं लोके तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।7।। यान्त्यं प्रकाशयेत् सर्वं परं ज्योतिः स्वतः परम्। यादिरभ्युदयात्मत्वात् सर्वदाभ्युदय कृत् ।।8।। वह मन्त्र अभिधान अर्थात् सगुण श्रीराम और अभिधेय अर्थात् परब्रह्म श्रीराम दोनों का कारण है, अतः संसार में यह परम उपास्य है; क्योंकि इसी मन्त्र में सबकुछ प्रतिष्ठित है। यह यकारान्त शब्द 'अभय' को प्रकाशित करता है और यह परम ज्योतिस्वरूप और अपने आप उत्पन्न है। मन्त्र यकारादि यज्ञस्वरूप है अतः वह सर्वदा अभ्युदय का कारक है। अतो यत्नेन जप्यन्तु भुक्तिमुक्तिपरीप्सुना। अतः श्रुतेः परं नास्ति तदेतद् वाचको मनुः ।।9।। अतः प्रयत्नपूर्वक भोग और मोक्ष चाहनेवालों के द्वारा इस मन्त्र का जप करना चाहिए। श्रीराम के वाचक वे मन्त्र हैं और इस श्रुति से ऊपर कुछ भी नहीं है मनूनामपि सर्वेषामयमेव विशिष्यते। अयमेवान्तमुत्सृज्याकारमेकाक्षरो मनुः ।।10।। सभी मन्त्रों में यह 'राम' मन्त्र है, वह विशिष्ट है। अन्तिम अकार त्याग कर देने से 'राम्' (रां) यह एकाक्षर मन्त्र बन जाता है। उपास्य मनोयज्ञोयमुत्पादयति तत्परम्। यद्येतत् त्रितयं याति नत्या सह समुद्रितम् ।।11।। मायामन्मथवेदादिपूर्वो व्युत्क्रमपूर्वकः। यह मानस यज्ञ श्रीराम की उपासना कर इस यज्ञ से भी विशिष्ट यज्ञ उत्पन्न करता है। (यज्ञेन यज्ञमयजन्त) तब यह मन्त्र 'नति' (नमः) के स माया(ह्रीं) मन्मथ (क्लीं) और वेद (ॐ) के पूर्व में प्रयोग से तीन प्रकार के जातें हैं- ॐ रामाय नमः, ह्रीं रामाय नमः एवं क्लीं रामाय नमः। श्रीबीजान्त्योऽयमेव स्यात्तदाद्यो वा षडक्षरः ।।12।। यदि नत्यन्तसहितं तद्द्वयं वापरो मनुः। पञ्चवर्णात्मकस्तस्माद्यस्मात् सर्वं प्रजायते ।।13।।