भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 234

चतुर्विंशोऽध्यायः (173) सभी शास्त्रों का रहस्य ज़ाननेवाले हे सुतीक्ष्ण! आप महात्मा हैं, इसलिए मैंने आपको अगस्त्य-संहिता सुनायी, जिससे सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। अध्यात्म को प्रकाशित करनेवाली और अज्ञान का नाश करनेवाली यह दीपशिखा है। यह नित्य रूप से भोग और मोक्ष देनेवाली है, आयु और आरोग्य बढ़ानेवाली है। श्रुता दृष्टापि लिखिता बहिरन्तश्च पावयेत्। आदिमध्यावसानान्तं यः सकृद् वा निरीक्षयेत्।।48।। पापात्मापि समुत्क्रम्य ब्रह्मभूयाय कल्पते। सर्वदालोकयेद्यस्तु ब्रह्मविद् याति सद्गतिम्।।49।। प्राप्नोति लोकमखिलं सद्योऽभीष्टमवाप्नुयात्। इस ग्रन्थ के श्रवण, दर्शन और लेखन से बाहर-भीतर पवित्र हो जाता है। इसका आदिभाग, मध्यभाग अथवा अन्तभाग का एक बार भी कोई दर्शन करे तो पापी भी उससे निकलकर ब्रह्मलीन हो जाता है। प्रतिदिन जो इसका दर्शन करते हैं, वे ब्रह्मज्ञानी होकर उत्तम गति प्राप्त करते हैं, सभी लोकों को प्राप्त करते हैं तथा तुरत अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं। पुस्तकं लिखितं यस्य¹ गृहे तिष्ठति पूजितम्।।50।। आयुरारोग्यमैश्वर्यं वर्द्धतेऽस्य दिने दिने। पुत्रैः पौत्रैः कुलं वास्य वर्द्धते सुश्रिया सह²।।51।। जिनके घर में इस लिखित एवं पूजित पुस्तक रहती है, उनकी आयु आरोग्य और ऐश्वर्य प्रतिदिन बढ़ते हैं। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि से उनका वंश सुन्दर लक्ष्मी के साथ बढ़ता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये योगवर्णनम् नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः। अथ चतुर्विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अयमेव परो मार्गः कर्माप्येतत् परात् परम्। राम एव परं ज्योतिः सच्चिदानन्दलक्षणम्।।1।।

  1. ग. सम्यक्। 2. क. पुत्रपौत्रप्रपौत्राद्यैः कुलं वास्य प्रवर्द्धते ।
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक) · पृष्ठ 234, कुल 337 में से · BharatKosha