अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(172) अगस्त्य-संहिता हे योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! वैराग्य से ही वह स्थिति भी आती है, त्याग से ही उससे भी ऊपर की स्थिति आती है। यह सब संन्यास से सिद्ध होता है। इस पृथ्वी पर इससे भिन्न कोई रास्ता नहीं है। बहिरन्तर्गतं कृत्वा मूलाधाराच्च चिन्मयम्। द्वादशान्तं समुत्क्रम्य यावन्नावर्तते पुनः॥41॥ बाहर स्थित चैतन्य को अपने अन्दर लेकर तथा मूलाधार से चित् तत्त्व लेकर द्वादशार चक्र को पारकर साधक पुनः लौटता नहीं, अर्थात्, मुक्त हो जाता है। योगीन्द्र मुक्तिमार्गोऽयं सर्वस्मिन्नपि दर्शने। नैवाप्यत्र मतं भिन्नं सर्वैरपि सुशोभितम्॥42॥ योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! सभी दर्शनों में कहा गया यह मुक्ति का मार्ग है। यहाँ मत में कोई भिन्नता नहीं है और इसे सबने सँबारा है। विरजेत् संन्यसेद् ब्रह्म साक्षात्कुर्यात् सुखी भवेत्। पुरुषार्थोऽयमेवात्र नातः किञ्चिन्न विद्यते॥43॥ रजोगुण से निवृत्त होकर कर्मों को सौंपकर ब्रह्म से साक्षात्कार कर जीव सुखी हो जाता है। यही इस लोक में पुरुषार्थ है, इससे आगे कुछ भी नहीं है। अखण्डानन्दयोगेन नैवात्मानं वियोजयेत्। स्ववर्णाश्रमधर्मेण नैव तावद् वियोजयेत्।¹॥44॥ अखण्ड आनन्द के साथ आत्मा का कभी विच्छेद न करावें। अपने वर्ण और आश्रम के कारण यह विच्छेद न करावें। इदं सत्यमिदं सत्यं सत्येनैवाति वर्तयेत्। रामः सत्यं परं ब्रह्म रामात् किञ्चिन्न विद्यते॥45॥ यह सत्य है, यह सत्य है। इस सत्य के विपरीत आचरण न करें। श्रीराम परम सत्य हैं, परम ब्रह्म हैं। श्रीराम से आगे कुछ भी नहीं है। सर्वशास्त्ररहस्यज्ञ मया तव महात्मनः। अगस्ति-संहिता नाम प्रोक्तेयं सर्वकामधुक्॥46॥ अध्यात्मालोकने दीपकलिकाज्ञाननाशिनी। भोगमोक्षप्रदा नित्यमायुरारोग्यवर्द्धिनी॥47॥
- ग. में अनुपलब्ध।