अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशोऽध्यायः (171) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — हृदयग्रन्थिभेदेन • सम्यगभ्यासयोगतः ।।34।। तत्र सन्धिषु सम्बद्धं तत्ताल्वाद्यन्तगो मरुत्। सम्यक् संशोध्य स्वं देहं भ्रूमध्यमुपसर्पति।।35।। भलीभाँति अभ्यास करने पर हृदय की ग्रन्थि का भेदन करने से वहाँ सन्धियों से होकर वायु तालु आदि प्रदेशों में संचरित होकर अपने शरीर का संशोधन कर भ्रू-मध्य में चली जाती है। तत्र स्याद् द्विद्ले पद्मे सुधानिधिरलौकिकम्। अनृतं बाहयेत्तेन अमृतत्वाय कल्पते।।36।। वहाँ द्विदल कमल में अमृत का अलौकिक खजाना है। इस अमृत के प्रवाह में असत्य को प्रवाहित करावें अर्थात् उसका शोधन करें। इससे अमरत्व की प्राप्ति होती है। भेदेन पञ्चमस्येव पर्वणोऽधिगते पुनः। शब्दब्रह्मापि निखिलं तेन¹ सर्वज्ञता भवेत् ।।37।। पाँचवीं गाँठ के खुल जाने पर पर्वों का ज्ञान होने पर उनमें स्थित शब्दब्रह्म की गाँठ खुल जाती है, तब वह सर्वज्ञ हो जाता है। मूलाधारे स्थितं वायु सुषुम्नानाडिमध्यगम्। तत्तद् ग्रन्थिविभेदेन ब्रह्मरन्ध्रं नयेदपि ।।38।। मूलाधार में स्थित वायु जो सुषुम्णा नाडी से होकर गजरती है, उस वायु के वेग से बीच में स्थित ग्रन्थियों को खोलते हुए वायु को ब्रह्मरन्ध्र में ले जायें। पूर्वोक्ताभ्यासयोगेन द्वादशान्तर्गतं पुनः। तदेव निखिलं ज्ञानं जन्मापि सफलं ततः।।39।। पूर्वोक्त प्रकार से अभ्यास करते हुए द्वादशार चक्र तक जब वायु पहुँच जाती है, तब समग्र ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे यह जन्म भी सफल हो जाता है। वैराग्येण तदप्येति त्यागेनैव हि तत्परम्। संन्यासेनैव योगीन्द्र नान्यो मार्गोऽस्ति तस्य तु।।40।।
- ग. येन। Rarest Archiver