अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
त्रयोविंशोऽध्यायः (171) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — हृदयग्रन्थिभेदेन • सम्यगभ्यासयोगतः ।।34।। तत्र सन्धिषु सम्बद्धं तत्ताल्वाद्यन्तगो मरुत्। सम्यक् संशोध्य स्वं देहं भ्रूमध्यमुपसर्पति।।35।। भलीभाँति अभ्यास करने पर हृदय की ग्रन्थि का भेदन करने से वहाँ सन्धियों से होकर वायु तालु आदि प्रदेशों में संचरित होकर अपने शरीर का संशोधन कर भ्रू-मध्य में चली जाती है। तत्र स्याद् द्विद्ले पद्मे सुधानिधिरलौकिकम्। अनृतं बाहयेत्तेन अमृतत्वाय कल्पते।।36।। वहाँ द्विदल कमल में अमृत का अलौकिक खजाना है। इस अमृत के प्रवाह में असत्य को प्रवाहित करावें अर्थात् उसका शोधन करें। इससे अमरत्व की प्राप्ति होती है। भेदेन पञ्चमस्येव पर्वणोऽधिगते पुनः। शब्दब्रह्मापि निखिलं तेन¹ सर्वज्ञता भवेत् ।।37।। पाँचवीं गाँठ के खुल जाने पर पर्वों का ज्ञान होने पर उनमें स्थित शब्दब्रह्म की गाँठ खुल जाती है, तब वह सर्वज्ञ हो जाता है। मूलाधारे स्थितं वायु सुषुम्नानाडिमध्यगम्। तत्तद् ग्रन्थिविभेदेन ब्रह्मरन्ध्रं नयेदपि ।।38।। मूलाधार में स्थित वायु जो सुषुम्णा नाडी से होकर गजरती है, उस वायु के वेग से बीच में स्थित ग्रन्थियों को खोलते हुए वायु को ब्रह्मरन्ध्र में ले जायें। पूर्वोक्ताभ्यासयोगेन द्वादशान्तर्गतं पुनः। तदेव निखिलं ज्ञानं जन्मापि सफलं ततः।।39।। पूर्वोक्त प्रकार से अभ्यास करते हुए द्वादशार चक्र तक जब वायु पहुँच जाती है, तब समग्र ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे यह जन्म भी सफल हो जाता है। वैराग्येण तदप्येति त्यागेनैव हि तत्परम्। संन्यासेनैव योगीन्द्र नान्यो मार्गोऽस्ति तस्य तु।।40।।
- ग. येन। Rarest Archiver
(172) अगस्त्य-संहिता हे योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! वैराग्य से ही वह स्थिति भी आती है, त्याग से ही उससे भी ऊपर की स्थिति आती है। यह सब संन्यास से सिद्ध होता है। इस पृथ्वी पर इससे भिन्न कोई रास्ता नहीं है। बहिरन्तर्गतं कृत्वा मूलाधाराच्च चिन्मयम्। द्वादशान्तं समुत्क्रम्य यावन्नावर्तते पुनः॥41॥ बाहर स्थित चैतन्य को अपने अन्दर लेकर तथा मूलाधार से चित् तत्त्व लेकर द्वादशार चक्र को पारकर साधक पुनः लौटता नहीं, अर्थात्, मुक्त हो जाता है। योगीन्द्र मुक्तिमार्गोऽयं सर्वस्मिन्नपि दर्शने। नैवाप्यत्र मतं भिन्नं सर्वैरपि सुशोभितम्॥42॥ योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! सभी दर्शनों में कहा गया यह मुक्ति का मार्ग है। यहाँ मत में कोई भिन्नता नहीं है और इसे सबने सँबारा है। विरजेत् संन्यसेद् ब्रह्म साक्षात्कुर्यात् सुखी भवेत्। पुरुषार्थोऽयमेवात्र नातः किञ्चिन्न विद्यते॥43॥ रजोगुण से निवृत्त होकर कर्मों को सौंपकर ब्रह्म से साक्षात्कार कर जीव सुखी हो जाता है। यही इस लोक में पुरुषार्थ है, इससे आगे कुछ भी नहीं है। अखण्डानन्दयोगेन नैवात्मानं वियोजयेत्। स्ववर्णाश्रमधर्मेण नैव तावद् वियोजयेत्।¹॥44॥ अखण्ड आनन्द के साथ आत्मा का कभी विच्छेद न करावें। अपने वर्ण और आश्रम के कारण यह विच्छेद न करावें। इदं सत्यमिदं सत्यं सत्येनैवाति वर्तयेत्। रामः सत्यं परं ब्रह्म रामात् किञ्चिन्न विद्यते॥45॥ यह सत्य है, यह सत्य है। इस सत्य के विपरीत आचरण न करें। श्रीराम परम सत्य हैं, परम ब्रह्म हैं। श्रीराम से आगे कुछ भी नहीं है। सर्वशास्त्ररहस्यज्ञ मया तव महात्मनः। अगस्ति-संहिता नाम प्रोक्तेयं सर्वकामधुक्॥46॥ अध्यात्मालोकने दीपकलिकाज्ञाननाशिनी। भोगमोक्षप्रदा नित्यमायुरारोग्यवर्द्धिनी॥47॥
- ग. में अनुपलब्ध।
चतुर्विंशोऽध्यायः (173) सभी शास्त्रों का रहस्य ज़ाननेवाले हे सुतीक्ष्ण! आप महात्मा हैं, इसलिए मैंने आपको अगस्त्य-संहिता सुनायी, जिससे सभी कामनाएँ पूर्ण होती है। अध्यात्म को प्रकाशित करनेवाली और अज्ञान का नाश करनेवाली यह दीपशिखा है। यह नित्य रूप से भोग और मोक्ष देनेवाली है, आयु और आरोग्य बढ़ानेवाली है। श्रुता दृष्टापि लिखिता बहिरन्तश्च पावयेत्। आदिमध्यावसानान्तं यः सकृद् वा निरीक्षयेत्।।48।। पापात्मापि समुत्क्रम्य ब्रह्मभूयाय कल्पते। सर्वदालोकयेद्यस्तु ब्रह्मविद् याति सद्गतिम्।।49।। प्राप्नोति लोकमखिलं सद्योऽभीष्टमवाप्नुयात्। इस ग्रन्थ के श्रवण, दर्शन और लेखन से बाहर-भीतर पवित्र हो जाता है। इसका आदिभाग, मध्यभाग अथवा अन्तभाग का एक बार भी कोई दर्शन करे तो पापी भी उससे निकलकर ब्रह्मलीन हो जाता है। प्रतिदिन जो इसका दर्शन करते हैं, वे ब्रह्मज्ञानी होकर उत्तम गति प्राप्त करते हैं, सभी लोकों को प्राप्त करते हैं तथा तुरत अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं। पुस्तकं लिखितं यस्य¹ गृहे तिष्ठति पूजितम्।।50।। आयुरारोग्यमैश्वर्यं वर्द्धतेऽस्य दिने दिने। पुत्रैः पौत्रैः कुलं वास्य वर्द्धते सुश्रिया सह²।।51।। जिनके घर में इस लिखित एवं पूजित पुस्तक रहती है, उनकी आयु आरोग्य और ऐश्वर्य प्रतिदिन बढ़ते हैं। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि से उनका वंश सुन्दर लक्ष्मी के साथ बढ़ता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये योगवर्णनम् नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः। अथ चतुर्विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अयमेव परो मार्गः कर्माप्येतत् परात् परम्। राम एव परं ज्योतिः सच्चिदानन्दलक्षणम्।।1।।
- ग. सम्यक्। 2. क. पुत्रपौत्रप्रपौत्राद्यैः कुलं वास्य प्रवर्द्धते ।
(174) अगस्त्य-संहिता
अगस्त्य बोले- यही मुक्ति का सबसे उत्तम मार्ग है और यहीं सर्वश्रेष्ठ कर्म है। राम ही परम ज्योति हैं, जो सत् स्वरूप, चैतन्यस्वरूप और आनन्दस्वरूप हैं। परं ज्योतिः परञ्चात्मा तथैव द्वयमोक्षयोः।¹ अन्त्याद्ययोर्यकारस्य द्वितीयादिस्वरान्तयोः ॥२॥ श्रीराम परम ज्योतिःस्वरूप हैं, इस संसार की परम आत्मा हैं और उसी प्रकार आदि और अन्त के द्वन्द्व स्वरूप जन्म और मोक्ष की परम ज्योति हैं। यकार अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति की भी परम ज्योति हैं। द्वितीया शक्ति अर्थात् माया से स्वर्ग तक की परम ज्योति है। श्रुतिस्मृतिपुराणानि सम्यगालोक्य निश्चितम्। वसिष्ठवामदेवाद्यैर्नारदाद्यैश्च यत्नतः ॥३॥ वसिष्ठ, वामदेव आदि ऋषि और नारद आदि भक्तों ने वेद, स्मृति, और पुराणों का यत्नपूर्वक भलीभाँति अनुशीलन कर ऐसा निश्चय किया है। यज्ञोऽयमस्माद् भूतानि , जङ्गमाजङ्गमं ततः। इतरेतरमिश्रेभ्यस्तेभ्यो भूतानि यज्ञिरे ॥४॥ श्रीराम यज्ञस्वरूप हैं, जिससे स्थावर और जंगम प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और स्थावर एवं जंगम प्राणियों में एक दूसरे के मिश्रण से अन्य प्राणियों की भी उत्पत्ति हुई है। शब्दप्रकाशमानोऽयं तत एष विनिर्गतः। व्यस्त एव तु शारीरः परः सारविलक्षणः ॥५॥ शब्द को द्वारा प्रकाशित जो यह मन्त्र है, वह भी श्रीराम से ही निर्गत हुआ है, जो परम सारमय मन्त्रों में विलक्षण है, वह व्यस्त रूप में , पृथक् रूप में शरीर से सम्बद्ध है अर्थात् शरीर के अवयव मुख से उच्चरित होने योग्य है, वैखरी नाद है। पञ्चाशद्वर्णरूपेण सोऽप्यनेकविधो भवेत्। पदवाक्यादिना यस्य शब्दस्यान्तो न विद्यते ॥६॥ पचास वर्णों के रूप में वह मन्त्र भी अनेक प्रकार का है। यह मन्त्र पद, वाक्य आदि के भेद से शब्द रूप में अनगिनत है।
- ग. द्वयमाश्रयोः।
_ _ _ _ _ चतुर्विंशोऽध्यायः (175) तस्य कारणरूपत्वादभिधानाभिधेययोः। उपास्यं परमं लोके तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।7।। यान्त्यं प्रकाशयेत् सर्वं परं ज्योतिः स्वतः परम्। यादिरभ्युदयात्मत्वात् सर्वदाभ्युदय कृत् ।।8।। वह मन्त्र अभिधान अर्थात् सगुण श्रीराम और अभिधेय अर्थात् परब्रह्म श्रीराम दोनों का कारण है, अतः संसार में यह परम उपास्य है; क्योंकि इसी मन्त्र में सबकुछ प्रतिष्ठित है। यह यकारान्त शब्द 'अभय' को प्रकाशित करता है और यह परम ज्योतिस्वरूप और अपने आप उत्पन्न है। मन्त्र यकारादि यज्ञस्वरूप है अतः वह सर्वदा अभ्युदय का कारक है। अतो यत्नेन जप्यन्तु भुक्तिमुक्तिपरीप्सुना। अतः श्रुतेः परं नास्ति तदेतद् वाचको मनुः ।।9।। अतः प्रयत्नपूर्वक भोग और मोक्ष चाहनेवालों के द्वारा इस मन्त्र का जप करना चाहिए। श्रीराम के वाचक वे मन्त्र हैं और इस श्रुति से ऊपर कुछ भी नहीं है मनूनामपि सर्वेषामयमेव विशिष्यते। अयमेवान्तमुत्सृज्याकारमेकाक्षरो मनुः ।।10।। सभी मन्त्रों में यह 'राम' मन्त्र है, वह विशिष्ट है। अन्तिम अकार त्याग कर देने से 'राम्' (रां) यह एकाक्षर मन्त्र बन जाता है। उपास्य मनोयज्ञोयमुत्पादयति तत्परम्। यद्येतत् त्रितयं याति नत्या सह समुद्रितम् ।।11।। मायामन्मथवेदादिपूर्वो व्युत्क्रमपूर्वकः। यह मानस यज्ञ श्रीराम की उपासना कर इस यज्ञ से भी विशिष्ट यज्ञ उत्पन्न करता है। (यज्ञेन यज्ञमयजन्त) तब यह मन्त्र 'नति' (नमः) के स माया(ह्रीं) मन्मथ (क्लीं) और वेद (ॐ) के पूर्व में प्रयोग से तीन प्रकार के जातें हैं- ॐ रामाय नमः, ह्रीं रामाय नमः एवं क्लीं रामाय नमः। श्रीबीजान्त्योऽयमेव स्यात्तदाद्यो वा षडक्षरः ।।12।। यदि नत्यन्तसहितं तद्द्वयं वापरो मनुः। पञ्चवर्णात्मकस्तस्माद्यस्मात् सर्वं प्रजायते ।।13।।
(176) अगस्त्य-संहिता इसी मन्त्र के अन्त में श्रीबीज (श्रीं) लगाने पर पहला षडक्षर मन्त्र होगा- रामाय नमः श्रीं। यदि केवल 'नति' (नमः) अन्त में जोड़ें अथवा ॐ, ह्रीं, क्लीं में से एक आदि में और श्रीबीज (श्रीं) अन्त में जोड़ें तो अन्य मन्त्र हो जाएँगे। जैसे- रामाय नमः, ॐ रामाय श्रीं, ह्रीं रामाय श्रीं, क्लीं रामाय श्रीं। ये पंचवर्णात्मक चार प्रकार के मन्त्र इससे बनेगें; क्योंकि मन्त्र से सब कुछ उत्पन्न होते हैं। चन्द्रान्तः परमो मन्त्रो भद्रान्तश्चतुरक्षरः। ऐहिकामुष्मिकं वास्याप्युक्तमेव फलं विदुः॥14॥ 'चन्द्र' शब्द अन्त में जोड़कर तथा 'भद्र' अन्त में जोड़कर चार अक्षर वाले मन्त्र बनते हैं- 'रामचन्द्र' 'रामभद्र'। इन मन्त्रों के भी पूर्व में कहे गये लौकिक और पारलौकिक फल कहे जाते हैं। श्रीमायामन्मथैकैकबीजाद्यन्तर्गतो मनुः। षडक्षरः स एवं यः स मन्त्रश्चतुरक्षरः॥15॥ श्रीबीज, (श्रीं) मायाबीज (ह्रीं) और कामबीज (क्लीं) में से एक एक बीज से सम्पुटित कर यह चतुरक्षर मन्त्र षडक्षर मन्त्र बन जाता है। तारमायारमानंगबीजपूर्वः स एव हि। अक्षरोऽनेकधा प्रोक्तः सर्वाभीष्टफलप्रदः॥16॥ यह षडक्षर मन्त्र तार (ॐकार), माया (ह्रीं), रमा (श्रीं) और अनंग (क्लीं) के पूर्व प्रयोग से अनेक प्रकार का कहा गया है, जिससे सभी मनोरथ पूरे होते हैं। चन्द्रभद्रनमस्कारैस्तत्तद्बीजैश्च योजितः। षट्सप्ताष्टनवादित्येनवं भिन्नोऽप्यनेकधा॥17॥ चन्द्र, भद्र, नमः और उपर्युक्त बीजाक्षरों के योग से षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर, नवाक्षर आदि अनेक मन्त्रों के रूप में विभिन्न प्रकार के होते हैं। एकादित्वेन बहुधा स्वयं रामेत्यतः परम्। सर्वाभीष्टप्रदत्वेनानन्तत्वेनापि भिद्यते॥18॥ एकाक्षर आदि मन्त्र के उपरान्त ॐ राम ऐसा जोड़कर सभी मन्त्र इच्छित फल देने के कारण कामना की दृष्टि से तथा अनन्त स्वरूप की दृष्टि से मन्त्रों के अनेक भेद होते हैं।
चतुर्विंशोऽध्यायः (177) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — पादाद्यात्मा पदाद्यात्मा तद्विशेषे विशिष्यते। स एव भिद्यतेऽनन्तभेदेनाप्यधिकारिणाम्।।19।। कुछ मन्त्र पाद अर्थात् चरणस्वरूप होते हैं तो कुछ पद अर्थात् शब्दस्वरूप होते हैं। इस विशेषता के कारण भी मन्त्र अनेक प्रकार के होते हैं। वही मन्त्र असंख्य प्रकार के अधिकारी के भेद से भी विभिन्न प्रकार के होते हैं। मन्त्राणामृषिरेतेषां ब्रह्माागस्त्यः शिवोऽह्यहम्। छन्दो गायत्रमेवाहुर्देवता राम उच्यते।।20।। पूर्वापरबीजशक्ती भुक्तिमुक्तिप्रयोजनम्। आद्यन्तयुक्तबीजेन षडङ्गं पल्लवैः सह।।21।। इन मन्त्रों के ऋषि ब्रह्मा, शिव और मैं अगस्त्य हूँ। छन्द गायत्री ही कहा गया है और देवता श्रीराम कहे गये हैं। आदि और अन्त में लगाये गये बीज शक्तियाँ हैं तथा भोग और मोक्ष प्रयोजन है। आदि और अन्त में प्रयुक्त बीजों के तथा पटल विस्तार के साथ मन्त्र के छह अंग होते हैं। भालमस्तकयोर्वामदक्षयोश्च भ्रुवोर्दृशोः। कर्णयोर्घाणयोर्हन्वोरोष्ठयोर्दन्तमूलयोः ।।22।। जिह्वामूलकण्ठयोश्च ककुदोः कुचयोरपि। अंसयोर्भुजयोश्चैव पार्श्वयोः कुक्षिहृत्कयोः।।23।। पृष्ठनाभ्योश्च सक्थिन्यूर्वोः जान्वोश्च जंघयोः पदोः। विन्यसेच्छक्तिबीजानि सीतारामस्वरूपकम्।।24।। विन्यसेत् संहृतिन्यासं पादादिकशिरस्यपि। उत्पत्तिन्यासमप्यत्र नाभ्यादिरधरोत्तरम्।।25।। न्यसेत् प्रत्यक्षरं न्यासं मूर्तिन्यासमतः परम्। तत्त्वन्यासं केशवादिन्यासमप्यथ विन्यसेत्।।26।। सर्वाङ्गमपि सर्वेण मन्त्रेणापि प्रविन्यसेत्। ललाट, मस्तक, बायाँ भौंह, दायाँ भौंह, बायीं आँख, दायीं आँख, दोनों कान, दोनो टुड्डी, दोनों होठ, दोनों जबड़े, जिह्वामूल, कण्ठ, गले का दोनों टेंटुए, दोनों कंधे, दोनों बाहें, दोनों पार्श्व, कोख, हृदय, पीठ, नाभि, दोनो जाँघों की हड्डियों, दोनों जाँघों का मांसल भाग, दोनों पैर इन स्थानों में शक्तिबीजों से
(178) अगस्त्य-संहिता
श्रीसीताराम के स्वरूप न्यास करें। तब प्रत्येक अक्षर से संहारन्यास करें जो पैरों से लेकर मस्तक तक के क्रम से होता है तथा इसके बाद नाभि से प्रारम्भ कर ऊपर नीचे उत्पत्तिन्यास करें। तब मूर्तिन्यास करें, तब तत्त्वन्यास के बाद केशवादिन्यास करें। अन्त में, सभी मन्त्रों से सर्वाङ्गन्यास करें। ध्यायेद् हृत्पुण्डरीकाक्षं परं ज्योतिः परात्परम् ।। २७ ।। तत्रैव देवमभ्यर्च्य मानसैरुपचारकैः । जपेत् क्वचन चैकान्ते रामं ध्यायन्ननन्यधीः ।। २८ ।। इसके बाद हृदयरूपी कमल के समान आँखोंवाले परम ज्योतिर्मय, परात्पर पुरुष का ध्यान करें। वहीं मानसोपचार से देवता की अर्चना कर कहीं एकान्त स्थान में श्रीराम का ध्यान एकाग्र होकर करते हुए जप करें। नीलजीमूतसंकाशं विद्युद्वर्णाम्बरावृतम् । सन्तप्तकाञ्चनप्रख्यां सीतामङ्कगतां पुनः ।। २९ ।। अन्योन्याश्लिष्टहृद्बाहुनेत्रं पश्यन्तमादरात् । दक्षिणेन कराग्रेण कुचाग्रे चञ्चलालकम् ।। ३० ।। स्पृशन्तं वलनोत्सङ्गैः¹ परिहासे मुहुर्मुहुः । विनोदयन्तं ताम्बूलचर्वणैकपरायणम् ।। ३१ ।। सर्वरूपोज्ज्वलद्वन्द्वं² योषित्पुरुषयोरिव । श्रीरामसीतयोः सर्वसम्पत्करविधायकम् ।। ३२ ।। श्रीराम नीले मेघ के समान हैं और विद्युत् से समान वर्ण (पीत) के वस्त्र पहने हुए हैं और तपे हुए सोने के समान आभा वाली सीता उनकी गोद में बैठी हुई हैं। एक दूसरे के हृदय, बाहें और नेत्र मिले हैं, जिसे श्रीराम आदर के साथ देख रहे हैं। दाहिने हाथ की अंगुलियाँ श्रीसीता के स्तनाग्र पर लटके चंचल लटों को बार बार परिहास में घेर कर आलिंगन कर छू रही हैं। श्रीराम पान चबा रहे हैं, सभी रूपों में उज्ज्वल रहनेवाले युगलस्वरूप स्त्री और पुरुष के समान श्रीसीताराम का ध्यान करें, जो सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं। जपहोमार्चनादीनि कुर्यात् कर्माणि सन्ततम् । यत्किञ्चिदप्यनन्तं स्यात् सत्यं सत्यं न संशयः ।। ३३ ।।
१. ग. च ततो त्याग=| २. ग. पूर्वरूपोज्ज्वलद्वन्द्वं ।
चतुर्विंशोऽध्यायः (179) तब निरन्तर जप, होम, पूजा आदि कर्म करें। इससे जो कुछ भी होगा, वह अनन्त फलदायक हो जायेगा, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। तदेतद्वाचको मन्त्रः सर्वस्यार्थस्य साधकः। सदसद्वाचकश्चायं मन्त्रो विजयते परः।।34।। मन्त्र सार्थक हो या अनर्थक, सभी प्रयोजनों के साधक हो जाते हैं। सार्थक या अनर्थक परम मन्त्र की जीत होती है। रामात्मनो मनोः सद्यः स्मरणात् कीर्तनादपि। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं कृत्याप्यकल्मषम्।।35।। श्रीराम के स्वरूप मन्त्र स्मरण करने और कीर्तन करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को शीघ्र निष्पाप बनाते हैं। संचिनोति नरो मोहाद्यद्यत्तदपि नाशयेत्। ग्राम्यारण्यपशुघ्नत्वं संचितं दुरितं च यत्।।36।। निःशेषं नाशयत्येव रामात्मा द्वयक्षरो मनुः। मनुष्य मोहवश जो जो पाप संचित करते हैं, उन्हें भी ये मन्त्र शीघ्र नाश कर देते हैं। गाँव या जंगल में रहनेवाले पशु की हत्या का जो संचित पाप है, उसे श्रीराम स्वरूप दो अक्षरों वाला 'राम' मन्त्र पूर्णतः नष्ट कर देता है। ^1तन्मृष्यवाक्य कोपादिभावोद्भावकृतार्चिनः।।37।। मद्यपानेन^2 यत्पापं तदप्याशु विनाशयेत्। अभक्ष्यभक्षणात्^3 पापं मिथ्याज्ञानसमुद्भवम्।।38।। सर्वं विलीयते राममन्त्रस्यास्यैव कीर्तनात्। मिथ्या भाषण, क्रोध आदि के कारण उत्पन्न पाप, उद्भाव (उपेक्षा), आग लगाने आदि का पाप तथा मद्यपान से जो पाप होता है उसे शीघ्र यह विनष्ट करता है। अभक्ष्य वस्तुओं के खाने से जो तथा मिथ्या ज्ञान के कारण उत्पन्न पाप श्रीराम के इसी मन्त्र के जप से विलीन हो जाते हैं। श्रोत्रियस्वर्णहरणाद्यच्च पापमुपार्जितम्।।39।। रत्नादेरपहारेण तदप्याशु विनाशयेत्।। वैदिकों का सोना चुराने या छीनने से, रत्न आदि छीनने से जो पाप संचित होता है, उसे भी यह मन्त्र यह शीघ्र नाश कर देता है।
- घ. में अनुपलब्ध। 2. ग. मधुपानेन । 3. ग. अभक्षणाय। Rarest Archiver
(180) अगस्त्य-संहिता गत्वा तु मातरं मोहादगम्यायाश्च योषितः।।40।। उपास्यानेन मन्त्रेण समं तदपि नाशयेत्।। मोहवश मातृतुल्य नारी तथा अगम्या से मैथुन करने का पापी इस मन्त्र की उपासना कर उस पाप को नष्ट कर लेते हैं। महापातकपापिष्ठसंगत्या सञ्चितञ्च यत्।।41।। नाशयेत् तत् कथालापशयनासनभोजनैः। महापातकी और अन्य पापियों की संगति करने से जो पाप संचित होता है, वे श्रीराम की कथा की चर्चा, श्रीराम के मन्दिर में शयन, उपवेशन (बैठने) और प्रसाद खाने से नष्ट हो जाते हैं। पितृमातृवधोत्पन्नं बुद्धिपूर्वक मव्यम्।।42।। निःशेषं नाशयेत्येव कालत्रयसमुद्भवम्। भ्रातृमित्रसुहृद्यानां यद्वा विश्वासघातिनाम्।।43।। यद् वा बालवधोत्पन्नं विषशस्त्रास्त्रमायिकम्। गुरुपुत्रकलत्रादिवधोत्पन्नं दुरात्मनाम्।।44।। तदनुष्ठानमात्रेण सर्व एव¹ विलीयते। माता-पिता के वध से उत्पन्न, जान-बूझकर किये गये तथा तीनों कालों में उत्पन्न पाप को यह मन्त्र नष्ट करता है। भाई, मित्र और अन्य प्रिय लोगों के साथ विश्वासघात का पाप, बाल-हत्या तथा विष देकर, शस्त्र-अस्त्र से अथवा जादू-टोना से की गयी हत्या का पाप अथवा गुरु, पुत्र, स्त्री आदि की हत्या का पाप जो दुरात्माओं को होता है, वह पाप श्रीराम के मन्त्र का अनुष्ठान मात्र करने से नष्ट हो जाता है। तत् सद्गुरूपदिष्टेन वर्तनानुष्ठितं पुनः।।45।। रामात्मा मन्त्र एवायं पापराशिनिरासकृत्। इसलिए सद्गुरु के उपदेश से मण्डल में अनुष्ठान किया गया यह श्रीराम स्वरूप मन्त्र पापराशि को निरस्त करनेवाला है। यत्रयागादितीर्थोत्थप्रायश्चित्तादिकैरपि ।।46।। नैवापयुज्यते पापं तदप्याशु विनाशयेत्।
- ग. एप। Rarest Archiver
पञ्चविंशोऽध्यायः (181) प्रयाग आदि तीर्थों में प्रायश्चित्त आदि करने से भी जो पाप नष्ट नहीं होते हैं, उन्हें भी यह मन्त्र शीघ्र नष्ट कर देता है। पुण्यक्षेत्रेषु सर्वेषु कुरुक्षेत्रादिषु स्वयं ।।47।। बुद्धिपूर्वमघं कुर्यात् तदप्याशु विनाशयेत्। कुरुक्षेत्र आदि सभी पुण्यतीर्थों में स्वयं जान बूझकर जो पाप किया जाये, उसे भी शीघ्र विनष्ट कर देता है। आत्मतुल्यसुवर्णादिदानैर्बहुविधैरपि ।।48।। किञ्चिदप्यपरिक्षीणं पापं तदपि नाशयेत्। अपने भार के बराबर सुवर्ण का दान आदि अनेक प्रकार के दानों से जो पाप नष्ट नहीं होता, उसे भी यह मन्त्र नष्ट कर देता है। यद्वातिसञ्चितं पापं मूलबद्धमघञ्च यत् ।।49।। तन्मन्त्रस्मरणादेव निःशेषं तत्प्रणश्यति ।।50।। अथवा अधिक मात्रा में संचित जो पाप है और जो पाप अपनी जड़ें जमा चुका है, मद्यपान आदि से जो पाप होता है, वे सारे पाप इस मन्त्र के स्मरण मात्र से अशेष रूप में नष्ट हो जाते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रमहिमाख्यानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ।।24।। अथ पञ्चविंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच सर्वागमैकतत्त्वज्ञ¹ ब्रह्मनिष्ठ तपोधन। रामात्मनस्त्वया तत्त्वं ब्रह्मणः परमव्ययम् ।।1।। प्रदर्शितं सम्यगेव सुविस्तरमनेकधा। षडक्षरविधानं तु² सम्यक् ज्ञातं मया प्रभो ।।2।। अन्येषां राममन्त्राणामनुष्ठानं कथं मुने।
- ग. सर्वेषामेव तत्त्वञ्च। 2. ग. वा ।
: (182) अगस्त्य-संहिता : -------------------------------------------------- : षडक्षरविधानं तु विधानान्तरमस्ति वा ।। ३ ।। : सर्वमेव समाचक्ष्व भक्तस्य त्वयि सुव्रत ।। ४ ।। : सुतीक्ष्ण बोले- हे महामुनि अगस्त्य ! आप सभी आगमों के तत्त्वों को : जानते हैं, ब्रह्म में लीन हैं, तपस्वी हैं, श्रीराम के रूप में जो स्वयं परमात्मा हैं, : उनके विषय में आपने भलीभाँति मुझे समझा दिया है। मैंने षडक्षर मन्त्र भी : भलीभाँति जान लिया है। अब यह बतलाएँ कि श्रीराम के अन्य मन्त्रों का किस : प्रकार अनुष्ठान किया जाता है। क्या केवल षडक्षर विधान ही है या दूसरा भी : कोई विधान है? हे सुव्रत अगस्त्य! मैं आपका भक्त हूँ, इसलिए मुझे सबकुछ कहें। : अगस्त्य उवाच : सुतीक्ष्ण शृणु वक्ष्यामि श्रद्दधानांपते पुनः। : वक्तव्यं तव यत्नेन यतस्त्वं वैष्णवोत्तमः ।। ५ ।। : अगस्त्य बोले- हे श्रद्धालुओ में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! फिर से सुनो। तुम वैष्णवों : में श्रेष्ठ हो, इसलिए मुझे सारे विधान बतला देने चाहिए। : ये शृण्वन्ति कथां विष्णोर्वन्दन्ति चरितं हरेः। : मुक्तकण्ठञ्च गायन्ति हरिं नृत्यन्ति सुन्दरम् ।। ६ ।। : आनन्दाश्रुपरीतात्मा गात्रेषु पुलकाञ्चिताः। : आनन्दनिर्भराश्चैव स्खलन्तश्च¹ पदे पदे। : उच्चैः श्रीराम रामेति वदन्ति च हसन्ति च ।। ७ ।। : एवमादिगुणैर्युक्ताः जनाः² रामसमा हि ते। : ³वैष्णवा मनवाः सर्वे मुक्तिदाः स्युः क्रमेण हि ।। ८ ।। : जो श्रीविष्णु की कथा सुनते हैं, हरि के चरित की वन्दना करते हैं, हरि की : लीलाओं को स्मरण करते हुए मुक्तकण्ठ होकर इसका गान करते हैं। आनन्द के : आँसू से भरे हुए चित्त वाले, पुलकित होकर आनन्दमग्न होकर पग-पग पर : लड़खड़ाती बोली में जोर जोर से 'श्रीराम राम' बोलते हैं, हँसते हैं- इस प्रकार के : गुणों से युक्त होकर जो मानव विष्णु के उपासक हैं, वे श्रीराम के समान हो : जाते हैं। भगवान् विष्णु के सभी मन्त्र मुक्ति देनेवाले हैं, उन्हें क्रम से सुनो। : राममन्त्रास्तु विप्रेन्द्र शीघ्रमुक्तिप्रदाः शृणु। : विनैव दीक्षां विप्रेन्द्र पुरश्चर्यां विनैव हि ।। ९ ।। : -------------------------------------------------- : 1. ग. स्तुवन्तश्च, घ. प्लवन्तश्च। 2. ग. मान्याः । 3. घ. यहाँ से छह पंक्तियाँ : अनुपलब्ध।
पञ्चविंशोऽध्यायः (183)
विनैव न्यासविधिना जपमात्रेण सिद्धिदाः। सामान्येन तु सर्वेषां मनूनां राघवस्य तु।।10।। अनुष्ठानविधिर्ज्ञेयो विशेषास्तत्र तत्र वै। वक्ष्यते ते महाभाग यथामति सुविस्तरम्।।11।। हे ब्राह्मण श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! शीघ्रमुक्ति देनेवाले जो श्रीराम के मन्त्र हैं, उसके विषय में सुनो। गुरु से दीक्षा, पंचांग पुरश्चरण और न्यास-विधानों के विना ही केवल जप करने से सिद्धि देने वाले ये मन्त्र हैं। श्रीराम के सभी मन्त्रों की सामान्य अनुष्ठान विधि जाननी चाहिए। मन्त्रों के सन्दर्भ में जो विशेष विधियाँ हैं, उसे अपनी बुद्धि के अनुसार यहाँ मैं विस्तार से कहता हूँ। षडक्षरविधानं तु सर्वेषां प्रकृतिं विदुः। भूतशुद्धिर्विधातव्या सर्वेषामादितो मुने।।12।। न्यासाः पूर्वोदिताः सर्वे कार्या यत्नेन सुव्रत। षडक्षर मन्त्र का जो विधान है, वही सभी मन्त्रों का स्वाभाविक विधान है। सभी मन्त्रों के अनुष्ठान के आरम्भ में भूतशुद्धि करनी चाहिए। पूर्व में कहे गये सभी न्यास यत्नपूर्वक करें। ¹अनुष्ठानेषु सर्वेषामधिकारोऽस्ति देहिनाम्।।13।। आश्रमस्थाश्च सर्वेऽपि मन्त्राणामधिकारिणः। ममुक्षुभिर्विरक्तैश्च सदा सेव्यो रघूत्तमः।।14।। यतीनां जितचित्तानामुपास्यः प्रणवो यथा। इन अनुष्ठानों में सभी मनुष्यों का अधिकार है। सभी मनुष्यों में जो किसी आश्रम में है वे मन्त्र के अधिकारी हैं। मोक्ष चाहनेवाले और संसार से विरक्त जो हैं वे श्रीराम का भजन करें। जैसे इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेनेवाले जो यति हैं वे प्रणव (ॐकार) की उपासना करते हैं। दीक्षाविधिस्तु कर्तव्यो विधेयो देशिकोत्तमैः।।15।। सन्ध्यां दीक्ष्यान्वितः कुर्यात् तत्तन्मन्त्रानुसारतः। दीक्षा की विधि जो पूर्व में कही गयी है वही गुरु को अपनानी चाहिए। शिष्य दीक्षा लेने के बाद से अपने अपने समय के अनुसार सन्ध्यावंदन करें।
- घ. यहाँ चार पंक्तियाँ अनुपलब्ध।
(184) अगस्त्य-संहिता प्राणायामस्तु गायत्र्या सर्वेषामपि सत्तम। ¹जलाभिमन्त्रणं वापि मूलमन्त्रेण मार्जनम्।।16।। जलस्य प्राशनं वापि ज्ञेयं चार्घ्यस्य वै मुने। सीतामन्त्रेण कुर्वीत मूलमन्त्रजपं तथा।।17।। उपस्थानादिकाः कार्यास्तत्रैव गतकल्मषैः। सबके लिए गायत्री से प्राणायाम विहित है। जलाभिमन्त्रण, मार्जन, जलप्राशन, अर्घ्यप्रदान ये कर्म मूलमन्त्र (दीक्षामन्त्र) से करें। मूलमन्त्र का जप कर और सीतामन्त्र (श्रीं सीतायैः नमः) से उपस्थान आदि क्रियाएँ निष्पाप साधकों को करना चाहिए। सूर्यमण्डलमध्यस्थं रामं सीतासमन्वितम्।।18।। नमामि पुण्डरीकाक्षमाञ्जनेयगुरुं परम्। नमः श्रीरामदेवाय ज्योतिषां पतये नमः।।19।। साक्षिणे सर्वभूतानां परमानन्दरूपिणे। रघुनाथाय दिव्याय महाकारुणिकाय च।।20।। नमोऽस्तु कौशिकानन्द दायिने ब्रह्मरूपिणे।¹ सूर्यमण्डल के मध्य में अवस्थित सीतासहित कमलनयन श्रीराम को प्रणाम है, जो हनुमान् के परम गुरु हैं। ज्योतिःस्वरूप ग्रहों और नक्षत्रों के स्वामी देवता श्रीराम को प्रणाम है। जो सभी प्राणियों के साक्षी महान् करुणामय दिव्य श्रीरघुनाथ परमानन्द स्वरूप हैं, उन्हें प्रणाम। विश्वामित्र को आनन्दित करनेवाले ब्रह्मस्वरूप श्रीराम को प्रणाम। दीपस्थानञ्च कर्त्तव्यं रामं ध्यायेदनन्यधीः।।21।। त्रिकालमेवं यः कुर्याद् राम एव भवेत् स्वयम्। पुरश्चर्या तु सर्वेषामुक्तमार्गेण वेष्यते।।22।। (इस प्रकार उपस्थापन कर) श्रीराम का ध्यान करते हुए दीप स्थापित करें। इस प्रकार जो तीनों सन्ध्या करते हैं, वे स्वयं राम ही हो जाते हैं। सभी मन्त्रों का पुरश्चरण उक्त मार्ग से भी अनुशंसित है। एवं सिद्धमनुं मन्त्री प्रत्यहं नियतव्रतः। ²षट्सहस्रं सहस्रं च त्रिशतं शतमेव च।।23।। जपं कुर्यात् प्रयत्नेन नो चेत् प्राप्नोत्यधो गतिम्।
- ग. में दो चरण नहीं हैं । 1.घ.दो पंक्तियाँ अनुपलब्ध।
४. रामनवमी व्रत, नित्य-अर्चन व स्तोत्र संग्रह
पञ्चविंशोऽध्यायः (185) इस प्रकार मन्त्र के ज्ञाता सिद्ध मन्त्र का प्रतिदिन छह हजार, एक हजार, तीन सौ अथवा एक सौ संख्या में यत्नपूर्वक जप करें अन्यथा उनकी अधोगति होती है। ध्यात्वा वीरं परं ब्रह्म राघवं नियतव्रतः¹ ।। २४ ।। चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं विभुम् । किरीटिनमुदाराङ्गं वनमालोपशोभितम् ।। २५ ।। सीतालंकृतवामाङ्गं पीताम्बरधरं विभुम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं ज्वलन्तं तेजसा मुने ।। २६ ।। नियमों का पालन करते हुए वीर एवं परब्रह्मस्वरूप श्रीराम का ध्यान करें। वे चतुर्भुज देव श्रीराम शंख, चक्र, गदा एवं कमल धारण किए हुए हैं। उनके मस्तक पर मुकुट शोभित है, अंग विशाल हैं, गले में वनमाला शोभित है। ऐसे श्रीराम का वाम भाग श्रीसीता से शोभित है। वे पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं और अपने तेज से शुद्ध स्फटिक के समान दीप्तिमान् हैं। अथवा द्विभुजं देवं² नीलोत्पलसमद्युतिम् । अनेकादित्यसंशोभि³ पद्मस्योपरिंस्थितम् ।। २७ ।। काञ्चनप्रख्यया देव्या वामभागस्थयान्वितम् । लक्ष्मणेन धृतच्छत्रं सुवर्णाभेन धीमता ।। २८ ।। अन्यैश्च सेवितं दिव्यं परिचारैरनेकशः । अब दो भुजाओं वाले देव श्रीराम का ध्यान करें, जिनकी शोभा नीलकमल के समान है, अनेक सूर्यों की भाँति चमकीले हैं, कमल के आसन पर स्थित हैं। स्वर्ण के समान कान्तिवाली और वामभाग में स्थित श्रीसीता से युक्त हैं। स्वर्ण के समान शोभित, बुद्धिमान् लक्ष्मण श्रीराम के ऊपर छत्र ताने हुए हैं। अन्य परिचारक गण उस दिव्य श्रीराम की सेवा कर रहे हैं। मानसैरुपचारैस्तु सम्यक् संपूज्य यत्नतः⁴ ।। २९ ।। कल्पवृक्षसमुद्भूतैर्भावितं मनसा चितम् । मूलमन्त्रजपं कुर्यान्नियतं नियतेन्द्रियः ।। ३० ।। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर कल्पवृक्ष से उत्पन्न सामग्रियों को मन से चुनकर एकत्रित कर उन उपचारों से देर तक मानस-पूजा करें और जितेन्द्रिय होकर नियमों का पालन करते हुए मूलमन्त्र का जप करें।
- घ. विजितेन्द्रियः। 2. ग. अथाजं च विभुं देवं । 3. ग. ॰संकाशं । 4. सेव्यं पूज्यं प्रयत्नतः Rarest Archiver
(186) अगस्त्य-संहिता
बाह्यपूजां ततः कुर्यात् साधनैर्न्यायतोऽर्जितैः । अन्यायेनार्जिता पूजा निष्फला मुनिसत्तम ।।३१।। इसके बाद न्याय से अर्जित साधनों से बाह्य-पूजा करें। अन्याय से उपार्जित साधनों से करने पर वह पूजा निष्फल हो जाती है। अगस्त्य उवाच बाह्यपूजां पुनर्वक्ष्ये सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। स्वगृहे शुद्ध भूभागे विलिप्ते गोमयाम्बुना ।।३२।। सुवितानसमायुक्ते पुष्पाद्यैः समलङ्कृते । गीतवाद्यैस्तु नृत्यैश्च सर्वत्र सुमनोहरैः ।।३३।। शुद्धासने समासीन उपचारैः स्वशक्तितः । अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! अब बाह्य-पूजा का स्वरूप कहता हूँ। अपने घर में गाय के गोबर और जल से लीपे हुए सुन्दर चँदोवा टाँगे हुए फूल आदि से सजे हुए पवित्र स्थान पर गाना-बजाना और नाच-गान से मनोरम कर शुद्ध आसन पर अवस्थित अपनी शक्ति के अनुरूप सामग्रियों से बाह्य पूजा करें। चन्दनागरुकस्तूरीकर्पूरकुङ्कुमादिभिः ।।३४।। हिमाम्बुना सुसंसृष्टैः पूजा कार्या सदा मुने। चन्दन, अगरु, कस्तूरी, कर्पूर, रोली आदि से जो बर्फ के जल में घोला गया हो, उससे पूजा करें। करवीरैश्च संफुल्लैः श्वेतरक्तैः सुगन्धिभिः ।।३५।। पुन्नागैश्चम्पकैश्चैव बकुलैः शतपत्रकैः । जातीभिर्मल्लिकाभिश्च कह्लारैः कमलैरपि ।।३६।। पाटलैः केतकीपुष्पैः पूजयेद् रघुनन्दनम् । खिले हुए करवीर, जो सफेद या लाल रंग के हों, नागकेसर, चम्पा, बकुल, शतपत्र, जाती, मल्लिका, श्वेतकमल, रक्तकमल, गुलाब और केतकी फूलों से श्रीराम की पूजा करें। वैष्णवेषु च सर्वेषु शङ्खपूजा प्रयत्नतः ।।३७।। कुर्यात् त्रिकालं विधिवद् विधिज्ञः साधकोत्तमः ।
षड्विंशोऽध्यायः (187)
विनैव शङ्खपूजां यो वैष्णवः पूजयेद्धरिम् ।। १३८ ।। पूजाफलं नैवाप्नोति सम्यग्वा पूजकोऽपि सः । सभी वैष्णव-पूजाओं में तीनों कालों में, विधानों के ज्ञाता श्रेष्ठ साधक विधानपूर्वक प्रयत्न कर शंख पूजा करें। शंख की पूजा किए बिना जो वैष्णव श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे अच्छी तरह पूजा करनेवाले भी उस पूजा का फल नहीं प्राप्त करते हैं। धूपैश्च बहुभिः काम्यैः सुगन्धैर्गुग्गुलोद्भवैः ।। १३९ ।। अर्चयेत् परया भक्त्या रघुनाथमनन्यधीः । अपनी कामना के अनुसार अनेक प्रकार के धूपों से, सुगन्धित गुगगुल के धूप से परम भक्तिपूर्वक एकाग्रचित होकर श्रीरघुनाथ की पूजा करें। स्नेहसंयुक्तविपुलवर्तिकाभिरनेकधा ।। १४० ।। आरार्तिभिरनेकाभिः स्थापिताभिः प्रयत्नतः । पद्मस्वस्तिकरूपेण हंसाकारेण चामरम् ।। १४१ ।। भ्रामयेद् रघुनाथस्य पुरस्तात् प्रयतोऽन्वहम् । तेल, घी आदि से युक्त बड़ी बातियों वाले अनेक प्रकार से अनेक आरतियों से जो प्रयत्नपूर्वक स्थापित की गयी हैं, कमल, स्वस्तिक या हंस की आकृति बनाते हुए श्रीरघुनाथ के समक्ष नियम से चाँवर प्रतिदिन घुमावें। नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यादिपूरितं पुरतः स्थितम् ।। १४२ ।। सूपापूपामृतोपेतं पायसाद्यं सशर्करम् । बहूपदंशसंशोभि सघृतं सुदधिप्रियम् ।। १४३ ।। निवेदयेत् प्रयत्नेन शोभिते शुद्धमुज्ज्वलम् । भक्ष्य, भोज्य आदि अनेक पदार्थ जैसे, दाल, पूआ, मधु के साथ शक्कर डाला हुआ पायस आदि, अनेक प्रकार की बड़ियों, घी तथा दही से सुसज्जित नैवेद्य जो शुद्ध और उज्ज्वल हो प्रयत्नपूर्वक निवेदित करें। कर्पूरशकलैर्युक्तं नागवल्लीदलान्वितम् ।। १४४ ।। सुधाबिन्दुसमायुक्तं पूगीफलमनोहरम् । ताम्बूलं रघुनाथस्य दत्वा कामानवाप्नुयात् ।। १४५ ।।
(188) अगस्त्य-संहिता कर्पूर खण्ड, चूना से युक्त, सुपारी से सुसज्जित कर पान का पत्ता लगाकर ताम्बूल श्रीराम को समर्पित कर सभी कामनाएँ प्राप्त करते हैं। पूर्वोक्तमेवं संक्षेपाद् विधानं गदितं मुने। सर्वेषां राममन्त्राणामेवमेवेरितं पुनः॥46॥ त्रिकालमेककालं वा एवं यः पूजयेत्सदा। सार्वभौमश्चिरं भूत्वा राजा एव भवेदिह॥47॥ हे मुनि सुतीक्ष्ण! पूर्व में कहे गये विधानों को ही यहाँ मैंने संक्षेप में कहा है। सभी राम-मन्त्रों के विधान इसी प्रकार के कहे गये हैं। जो तीनों कालों में या एक काल में प्रतिदिन पूजा करते हैं, वे बहुत दिनों तक इस संसार में एकच्छत्र राजा होते ही हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रान्तरवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः।।25।। अथ षड्विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच सर्वानुष्ठानसारं ते सर्वदानोत्तमोत्तमः। रहस्यं कथयिष्यामि सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम॥1॥ अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! सभी प्रकार के अनुष्ठानों में से सबसे महत्त्वपूर्ण और सभी दानों में उत्तम दान का रहस्य मैं बतलाता हूँ। 1चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ। उदये गुरुगौरांशोः स्वोच्चस्थे ग्रहपञ्चके॥2॥ मेषे पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटिकाह्वये। आविरासीत् सकलया कौशल्यायां परः पुमान्॥3॥ हे ब्राह्मण! चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुण्य दिन में जब पुनर्वसु नक्षत्र था, गुरु और चन्द्रमा का उदय हुआ था तथा पाँच ग्रह अपनी अपनी उच्च राशि पर स्थित थे, सूर्य मेष राशि में स्थित थे और उस समय कर्क लग्न था, ऐसे समय में अपनी कला के साथ परम पुरुष श्रीराम का प्राकट्य कौशल्या के गर्भ से हुआ।
- श्लोक संख्या 2-4 तक केवल 'क' में उपलब्ध।
षड्विंशोऽध्यायः (189) उच्चस्थे ग्रहपञ्चके सुरगुरौ सेन्दौ नवम्यां तिथौ लग्ने कर्कटके पुनर्वसुयुते मेषं गते पूषणि। निर्दग्धुं निखिलाः पलाशसमिधो मेध्यादयोध्यारणे- राविर्भूतमभूतपूर्वविभवं यत्किंचिदेकं महः।।4।। जब पाँच ग्रह अपनी उच्च राशि में थे, बृहस्पति चन्द्रमा के साथ थे, नवमी तिथि थी, पुनर्वसु नक्षत्र था, सूर्य मेष राशि में थे, तब कर्क लग्न में राक्षस रूपी समिधाओं को जलाने के लिए अयोध्या रूपी पवित्र अरणि से एक अभूतपूर्व राम नामक तेज उत्पन्न हुआ। (टिप्पणी : पाण्डुलिपि ग. में ‘चैत्रे नवम्यां’ इत्यादि से ‘तु शुक्लपक्षे’ तक अनुपलब्ध है। किन्तु पाँचवें श्लोक का अंश ‘रघूत्तमः।’ उपलब्ध होने कारण उपर्युक्त अंश को भ्रम से खण्डित माना जाना चाहिए, प्रक्षेप नहीं। अतः मैंने इस अंश को मूल पाठ माना है। किन्तु श्लोक संख्या 4 भोजराज कृत चम्पूरामायण’ में 1।29 पर भी उपलब्ध है।) चैत्रे मासे नवम्यां तु शुक्लपक्षे रघूत्तमः। प्रादुरासीत्पुरा ब्रह्मन् परब्रह्मैव केवलम्।।5।। तस्मिन् दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतन्तदा¹। ततो जागरणं कुर्याद्रघुनाथपरो भुवि।।6।। प्रातर्दशम्यां कृत्वा तु सन्ध्यादि सकलाः क्रियाः। सम्पूज्य विधिवद् रामं भक्त्या वित्तानुसारतः।।7।। ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत्। गो-भू-तिल-हिरण्याद्यैः स्वर्णालङ्करणैस्तथा।।8।। रामभक्तान् प्रयत्नेन प्रीणयेत् परया मुदा। एवं यः कुरुते भक्त्या श्रीरामनवमीव्रतम्।।9।। अनेकजन्मसिद्धानि पातकानि बहून्यपि। भस्मीकृत्य व्रजत्येव श्रीविष्णोः परमं पदम्।।10।। चैत्र मास की नवमी तिथि को शुक्लपक्ष में परब्रह्म श्रीराम प्राचीन काल में अवतरित हुए। उस दिन उपवास का व्रत करना चाहिए। इसके बाद श्रीराम का ध्यान करते हुए जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल दशमी में सन्ध्या आदि
- ग. व्रतं सदा।
(190) अगस्त्य-संहिता सभी कृत्य कर श्रीराम की विधिवत् पूजा भक्ति के साथ अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार करें। भक्तिपूर्वक ब्राह्मण भोजन करावें तथा दान-दक्षिणा देकर उन्हें सन्तुष्ट करें। परम प्रसन्न होकर यत्नपूर्वक श्रीराम के भक्तों को सन्तुष्ट करें। ऐसा करने से अनेक जन्मों में उपजे अनेक पाप को भस्म कर वह व्यक्ति विष्णु का परम धाम प्राप्त करता है। सर्वेषामप्ययं धर्मो मुक्तिभुक्त्यैकसाधनः। अशुचिर्वापि पापिष्ठः कृत्वेदं व्रतमुत्तमम्।।11।। पूज्यः स्यात् सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः। यह सबके लिए धर्म है, जो भोग और मोक्ष का निश्चित साधन है। चाहे वह अपवित्र हो या सबसे बड़ा पापी क्यों न हो, यह श्रेष्ठ व्रत कर सभी प्राणियों के बीच जैसे श्रीराम पूज्य हैं वैसे वह भी पूज्य हो जाता है। यस्तु रामनवम्यान्तु भुङ्क्ते स तु नराधमः।।12।। कुम्भीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः। त्रैलोक्यपापमश्नाति स्वधर्मो निष्फलो भवेत्।।13।। यस्तु रामस्य नवमीमनादृत्य नराधमः। अश्नीयान्नरकं गच्छेद्यावदाचन्द्रतारकम्।।14।। अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वोत्तमोत्तमम्। व्रतान्यन्यानि कुरुते न तेषां फलभाग् भवेत्।।15।। सर्वव्रतस्य प्रीत्यर्थमिदं श्रीरामव्रतं चरेत्। रहस्यकृतपापानि प्रख्यातानि बहून्यपि। महान्ति विप्रणश्यन्ति श्रीरामनवमीव्रतात्।।16।। जो रामनवमी के दिन भोजन करते हैं, वे मनुष्यों में अधम बन जाते हैं और कुम्भीपाक नरक का ताप भोगते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। तीनों लोकों में पाप के भागी होते हैं, उनका अपना धर्म निष्फल हो जाता है। जो नराधम श्रीराम की नवमी तिथि का अनादर कर भोजन कर लेते हैं वे चन्द्रमा और नक्षत्रों के विद्यमान रहने तक नरक का भोग करते हैं। सभी व्रतों में उत्तम रामनवमी का व्रत न कर जो दूसरे व्रत करते हैं, उन्हें उन अन्य व्रतों का फल नहीं मिलता सभी व्रतों की प्रीति के लिए श्रीराम का व्रत करना चाहिए। इसे करने से गुप्त रूप से या प्रकट रूप से किये गये सभी महान् पाप नष्ट हो जाते हैं।