भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 337 में से

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पृष्ठ 248

षड्विंशोऽध्यायः (187)

विनैव शङ्खपूजां यो वैष्णवः पूजयेद्धरिम् ।। १३८ ।। पूजाफलं नैवाप्नोति सम्यग्वा पूजकोऽपि सः । सभी वैष्णव-पूजाओं में तीनों कालों में, विधानों के ज्ञाता श्रेष्ठ साधक विधानपूर्वक प्रयत्न कर शंख पूजा करें। शंख की पूजा किए बिना जो वैष्णव श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे अच्छी तरह पूजा करनेवाले भी उस पूजा का फल नहीं प्राप्त करते हैं। धूपैश्च बहुभिः काम्यैः सुगन्धैर्गुग्गुलोद्भवैः ।। १३९ ।। अर्चयेत् परया भक्त्या रघुनाथमनन्यधीः । अपनी कामना के अनुसार अनेक प्रकार के धूपों से, सुगन्धित गुगगुल के धूप से परम भक्तिपूर्वक एकाग्रचित होकर श्रीरघुनाथ की पूजा करें। स्नेहसंयुक्तविपुलवर्तिकाभिरनेकधा ।। १४० ।। आरार्तिभिरनेकाभिः स्थापिताभिः प्रयत्नतः । पद्मस्वस्तिकरूपेण हंसाकारेण चामरम् ।। १४१ ।। भ्रामयेद् रघुनाथस्य पुरस्तात् प्रयतोऽन्वहम् । तेल, घी आदि से युक्त बड़ी बातियों वाले अनेक प्रकार से अनेक आरतियों से जो प्रयत्नपूर्वक स्थापित की गयी हैं, कमल, स्वस्तिक या हंस की आकृति बनाते हुए श्रीरघुनाथ के समक्ष नियम से चाँवर प्रतिदिन घुमावें। नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यादिपूरितं पुरतः स्थितम् ।। १४२ ।। सूपापूपामृतोपेतं पायसाद्यं सशर्करम् । बहूपदंशसंशोभि सघृतं सुदधिप्रियम् ।। १४३ ।। निवेदयेत् प्रयत्नेन शोभिते शुद्धमुज्ज्वलम् । भक्ष्य, भोज्य आदि अनेक पदार्थ जैसे, दाल, पूआ, मधु के साथ शक्कर डाला हुआ पायस आदि, अनेक प्रकार की बड़ियों, घी तथा दही से सुसज्जित नैवेद्य जो शुद्ध और उज्ज्वल हो प्रयत्नपूर्वक निवेदित करें। कर्पूरशकलैर्युक्तं नागवल्लीदलान्वितम् ।। १४४ ।। सुधाबिन्दुसमायुक्तं पूगीफलमनोहरम् । ताम्बूलं रघुनाथस्य दत्वा कामानवाप्नुयात् ।। १४५ ।।

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