अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 249, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(188) अगस्त्य-संहिता कर्पूर खण्ड, चूना से युक्त, सुपारी से सुसज्जित कर पान का पत्ता लगाकर ताम्बूल श्रीराम को समर्पित कर सभी कामनाएँ प्राप्त करते हैं। पूर्वोक्तमेवं संक्षेपाद् विधानं गदितं मुने। सर्वेषां राममन्त्राणामेवमेवेरितं पुनः॥46॥ त्रिकालमेककालं वा एवं यः पूजयेत्सदा। सार्वभौमश्चिरं भूत्वा राजा एव भवेदिह॥47॥ हे मुनि सुतीक्ष्ण! पूर्व में कहे गये विधानों को ही यहाँ मैंने संक्षेप में कहा है। सभी राम-मन्त्रों के विधान इसी प्रकार के कहे गये हैं। जो तीनों कालों में या एक काल में प्रतिदिन पूजा करते हैं, वे बहुत दिनों तक इस संसार में एकच्छत्र राजा होते ही हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रान्तरवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः।।25।। अथ षड्विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच सर्वानुष्ठानसारं ते सर्वदानोत्तमोत्तमः। रहस्यं कथयिष्यामि सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम॥1॥ अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! सभी प्रकार के अनुष्ठानों में से सबसे महत्त्वपूर्ण और सभी दानों में उत्तम दान का रहस्य मैं बतलाता हूँ। 1चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ। उदये गुरुगौरांशोः स्वोच्चस्थे ग्रहपञ्चके॥2॥ मेषे पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटिकाह्वये। आविरासीत् सकलया कौशल्यायां परः पुमान्॥3॥ हे ब्राह्मण! चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुण्य दिन में जब पुनर्वसु नक्षत्र था, गुरु और चन्द्रमा का उदय हुआ था तथा पाँच ग्रह अपनी अपनी उच्च राशि पर स्थित थे, सूर्य मेष राशि में स्थित थे और उस समय कर्क लग्न था, ऐसे समय में अपनी कला के साथ परम पुरुष श्रीराम का प्राकट्य कौशल्या के गर्भ से हुआ।
- श्लोक संख्या 2-4 तक केवल 'क' में उपलब्ध।