अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः (189) उच्चस्थे ग्रहपञ्चके सुरगुरौ सेन्दौ नवम्यां तिथौ लग्ने कर्कटके पुनर्वसुयुते मेषं गते पूषणि। निर्दग्धुं निखिलाः पलाशसमिधो मेध्यादयोध्यारणे- राविर्भूतमभूतपूर्वविभवं यत्किंचिदेकं महः।।4।। जब पाँच ग्रह अपनी उच्च राशि में थे, बृहस्पति चन्द्रमा के साथ थे, नवमी तिथि थी, पुनर्वसु नक्षत्र था, सूर्य मेष राशि में थे, तब कर्क लग्न में राक्षस रूपी समिधाओं को जलाने के लिए अयोध्या रूपी पवित्र अरणि से एक अभूतपूर्व राम नामक तेज उत्पन्न हुआ। (टिप्पणी : पाण्डुलिपि ग. में ‘चैत्रे नवम्यां’ इत्यादि से ‘तु शुक्लपक्षे’ तक अनुपलब्ध है। किन्तु पाँचवें श्लोक का अंश ‘रघूत्तमः।’ उपलब्ध होने कारण उपर्युक्त अंश को भ्रम से खण्डित माना जाना चाहिए, प्रक्षेप नहीं। अतः मैंने इस अंश को मूल पाठ माना है। किन्तु श्लोक संख्या 4 भोजराज कृत चम्पूरामायण’ में 1।29 पर भी उपलब्ध है।) चैत्रे मासे नवम्यां तु शुक्लपक्षे रघूत्तमः। प्रादुरासीत्पुरा ब्रह्मन् परब्रह्मैव केवलम्।।5।। तस्मिन् दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतन्तदा¹। ततो जागरणं कुर्याद्रघुनाथपरो भुवि।।6।। प्रातर्दशम्यां कृत्वा तु सन्ध्यादि सकलाः क्रियाः। सम्पूज्य विधिवद् रामं भक्त्या वित्तानुसारतः।।7।। ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत्। गो-भू-तिल-हिरण्याद्यैः स्वर्णालङ्करणैस्तथा।।8।। रामभक्तान् प्रयत्नेन प्रीणयेत् परया मुदा। एवं यः कुरुते भक्त्या श्रीरामनवमीव्रतम्।।9।। अनेकजन्मसिद्धानि पातकानि बहून्यपि। भस्मीकृत्य व्रजत्येव श्रीविष्णोः परमं पदम्।।10।। चैत्र मास की नवमी तिथि को शुक्लपक्ष में परब्रह्म श्रीराम प्राचीन काल में अवतरित हुए। उस दिन उपवास का व्रत करना चाहिए। इसके बाद श्रीराम का ध्यान करते हुए जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल दशमी में सन्ध्या आदि
- ग. व्रतं सदा।