अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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बाह्यपूजां ततः कुर्यात् साधनैर्न्यायतोऽर्जितैः । अन्यायेनार्जिता पूजा निष्फला मुनिसत्तम ।।३१।। इसके बाद न्याय से अर्जित साधनों से बाह्य-पूजा करें। अन्याय से उपार्जित साधनों से करने पर वह पूजा निष्फल हो जाती है। अगस्त्य उवाच बाह्यपूजां पुनर्वक्ष्ये सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। स्वगृहे शुद्ध भूभागे विलिप्ते गोमयाम्बुना ।।३२।। सुवितानसमायुक्ते पुष्पाद्यैः समलङ्कृते । गीतवाद्यैस्तु नृत्यैश्च सर्वत्र सुमनोहरैः ।।३३।। शुद्धासने समासीन उपचारैः स्वशक्तितः । अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! अब बाह्य-पूजा का स्वरूप कहता हूँ। अपने घर में गाय के गोबर और जल से लीपे हुए सुन्दर चँदोवा टाँगे हुए फूल आदि से सजे हुए पवित्र स्थान पर गाना-बजाना और नाच-गान से मनोरम कर शुद्ध आसन पर अवस्थित अपनी शक्ति के अनुरूप सामग्रियों से बाह्य पूजा करें। चन्दनागरुकस्तूरीकर्पूरकुङ्कुमादिभिः ।।३४।। हिमाम्बुना सुसंसृष्टैः पूजा कार्या सदा मुने। चन्दन, अगरु, कस्तूरी, कर्पूर, रोली आदि से जो बर्फ के जल में घोला गया हो, उससे पूजा करें। करवीरैश्च संफुल्लैः श्वेतरक्तैः सुगन्धिभिः ।।३५।। पुन्नागैश्चम्पकैश्चैव बकुलैः शतपत्रकैः । जातीभिर्मल्लिकाभिश्च कह्लारैः कमलैरपि ।।३६।। पाटलैः केतकीपुष्पैः पूजयेद् रघुनन्दनम् । खिले हुए करवीर, जो सफेद या लाल रंग के हों, नागकेसर, चम्पा, बकुल, शतपत्र, जाती, मल्लिका, श्वेतकमल, रक्तकमल, गुलाब और केतकी फूलों से श्रीराम की पूजा करें। वैष्णवेषु च सर्वेषु शङ्खपूजा प्रयत्नतः ।।३७।। कुर्यात् त्रिकालं विधिवद् विधिज्ञः साधकोत्तमः ।