अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः (185) इस प्रकार मन्त्र के ज्ञाता सिद्ध मन्त्र का प्रतिदिन छह हजार, एक हजार, तीन सौ अथवा एक सौ संख्या में यत्नपूर्वक जप करें अन्यथा उनकी अधोगति होती है। ध्यात्वा वीरं परं ब्रह्म राघवं नियतव्रतः¹ ।। २४ ।। चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं विभुम् । किरीटिनमुदाराङ्गं वनमालोपशोभितम् ।। २५ ।। सीतालंकृतवामाङ्गं पीताम्बरधरं विभुम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं ज्वलन्तं तेजसा मुने ।। २६ ।। नियमों का पालन करते हुए वीर एवं परब्रह्मस्वरूप श्रीराम का ध्यान करें। वे चतुर्भुज देव श्रीराम शंख, चक्र, गदा एवं कमल धारण किए हुए हैं। उनके मस्तक पर मुकुट शोभित है, अंग विशाल हैं, गले में वनमाला शोभित है। ऐसे श्रीराम का वाम भाग श्रीसीता से शोभित है। वे पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं और अपने तेज से शुद्ध स्फटिक के समान दीप्तिमान् हैं। अथवा द्विभुजं देवं² नीलोत्पलसमद्युतिम् । अनेकादित्यसंशोभि³ पद्मस्योपरिंस्थितम् ।। २७ ।। काञ्चनप्रख्यया देव्या वामभागस्थयान्वितम् । लक्ष्मणेन धृतच्छत्रं सुवर्णाभेन धीमता ।। २८ ।। अन्यैश्च सेवितं दिव्यं परिचारैरनेकशः । अब दो भुजाओं वाले देव श्रीराम का ध्यान करें, जिनकी शोभा नीलकमल के समान है, अनेक सूर्यों की भाँति चमकीले हैं, कमल के आसन पर स्थित हैं। स्वर्ण के समान कान्तिवाली और वामभाग में स्थित श्रीसीता से युक्त हैं। स्वर्ण के समान शोभित, बुद्धिमान् लक्ष्मण श्रीराम के ऊपर छत्र ताने हुए हैं। अन्य परिचारक गण उस दिव्य श्रीराम की सेवा कर रहे हैं। मानसैरुपचारैस्तु सम्यक् संपूज्य यत्नतः⁴ ।। २९ ।। कल्पवृक्षसमुद्भूतैर्भावितं मनसा चितम् । मूलमन्त्रजपं कुर्यान्नियतं नियतेन्द्रियः ।। ३० ।। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर कल्पवृक्ष से उत्पन्न सामग्रियों को मन से चुनकर एकत्रित कर उन उपचारों से देर तक मानस-पूजा करें और जितेन्द्रिय होकर नियमों का पालन करते हुए मूलमन्त्र का जप करें।
- घ. विजितेन्द्रियः। 2. ग. अथाजं च विभुं देवं । 3. ग. ॰संकाशं । 4. सेव्यं पूज्यं प्रयत्नतः Rarest Archiver