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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

४. रामनवमी व्रत, नित्य-अर्चन व स्तोत्र संग्रह

पञ्चविंशोऽध्यायः (185) इस प्रकार मन्त्र के ज्ञाता सिद्ध मन्त्र का प्रतिदिन छह हजार, एक हजार, तीन सौ अथवा एक सौ संख्या में यत्नपूर्वक जप करें अन्यथा उनकी अधोगति होती है। ध्यात्वा वीरं परं ब्रह्म राघवं नियतव्रतः¹ ।। २४ ।। चतुर्भुजं शंखचक्रगदापद्मधरं विभुम् । किरीटिनमुदाराङ्गं वनमालोपशोभितम् ।। २५ ।। सीतालंकृतवामाङ्गं पीताम्बरधरं विभुम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं ज्वलन्तं तेजसा मुने ।। २६ ।। नियमों का पालन करते हुए वीर एवं परब्रह्मस्वरूप श्रीराम का ध्यान करें। वे चतुर्भुज देव श्रीराम शंख, चक्र, गदा एवं कमल धारण किए हुए हैं। उनके मस्तक पर मुकुट शोभित है, अंग विशाल हैं, गले में वनमाला शोभित है। ऐसे श्रीराम का वाम भाग श्रीसीता से शोभित है। वे पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं और अपने तेज से शुद्ध स्फटिक के समान दीप्तिमान् हैं। अथवा द्विभुजं देवं² नीलोत्पलसमद्युतिम् । अनेकादित्यसंशोभि³ पद्मस्योपरिंस्थितम् ।। २७ ।। काञ्चनप्रख्यया देव्या वामभागस्थयान्वितम् । लक्ष्मणेन धृतच्छत्रं सुवर्णाभेन धीमता ।। २८ ।। अन्यैश्च सेवितं दिव्यं परिचारैरनेकशः । अब दो भुजाओं वाले देव श्रीराम का ध्यान करें, जिनकी शोभा नीलकमल के समान है, अनेक सूर्यों की भाँति चमकीले हैं, कमल के आसन पर स्थित हैं। स्वर्ण के समान कान्तिवाली और वामभाग में स्थित श्रीसीता से युक्त हैं। स्वर्ण के समान शोभित, बुद्धिमान् लक्ष्मण श्रीराम के ऊपर छत्र ताने हुए हैं। अन्य परिचारक गण उस दिव्य श्रीराम की सेवा कर रहे हैं। मानसैरुपचारैस्तु सम्यक् संपूज्य यत्नतः⁴ ।। २९ ।। कल्पवृक्षसमुद्भूतैर्भावितं मनसा चितम् । मूलमन्त्रजपं कुर्यान्नियतं नियतेन्द्रियः ।। ३० ।। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर कल्पवृक्ष से उत्पन्न सामग्रियों को मन से चुनकर एकत्रित कर उन उपचारों से देर तक मानस-पूजा करें और जितेन्द्रिय होकर नियमों का पालन करते हुए मूलमन्त्र का जप करें।

  1. घ. विजितेन्द्रियः। 2. ग. अथाजं च विभुं देवं । 3. ग. ॰संकाशं । 4. सेव्यं पूज्यं प्रयत्नतः Rarest Archiver

(186) अगस्त्य-संहिता

बाह्यपूजां ततः कुर्यात् साधनैर्न्यायतोऽर्जितैः । अन्यायेनार्जिता पूजा निष्फला मुनिसत्तम ।।३१।। इसके बाद न्याय से अर्जित साधनों से बाह्य-पूजा करें। अन्याय से उपार्जित साधनों से करने पर वह पूजा निष्फल हो जाती है। अगस्त्य उवाच बाह्यपूजां पुनर्वक्ष्ये सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। स्वगृहे शुद्ध भूभागे विलिप्ते गोमयाम्बुना ।।३२।। सुवितानसमायुक्ते पुष्पाद्यैः समलङ्कृते । गीतवाद्यैस्तु नृत्यैश्च सर्वत्र सुमनोहरैः ।।३३।। शुद्धासने समासीन उपचारैः स्वशक्तितः । अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! अब बाह्य-पूजा का स्वरूप कहता हूँ। अपने घर में गाय के गोबर और जल से लीपे हुए सुन्दर चँदोवा टाँगे हुए फूल आदि से सजे हुए पवित्र स्थान पर गाना-बजाना और नाच-गान से मनोरम कर शुद्ध आसन पर अवस्थित अपनी शक्ति के अनुरूप सामग्रियों से बाह्य पूजा करें। चन्दनागरुकस्तूरीकर्पूरकुङ्कुमादिभिः ।।३४।। हिमाम्बुना सुसंसृष्टैः पूजा कार्या सदा मुने। चन्दन, अगरु, कस्तूरी, कर्पूर, रोली आदि से जो बर्फ के जल में घोला गया हो, उससे पूजा करें। करवीरैश्च संफुल्लैः श्वेतरक्तैः सुगन्धिभिः ।।३५।। पुन्नागैश्चम्पकैश्चैव बकुलैः शतपत्रकैः । जातीभिर्मल्लिकाभिश्च कह्लारैः कमलैरपि ।।३६।। पाटलैः केतकीपुष्पैः पूजयेद् रघुनन्दनम् । खिले हुए करवीर, जो सफेद या लाल रंग के हों, नागकेसर, चम्पा, बकुल, शतपत्र, जाती, मल्लिका, श्वेतकमल, रक्तकमल, गुलाब और केतकी फूलों से श्रीराम की पूजा करें। वैष्णवेषु च सर्वेषु शङ्खपूजा प्रयत्नतः ।।३७।। कुर्यात् त्रिकालं विधिवद् विधिज्ञः साधकोत्तमः ।

षड्विंशोऽध्यायः (187)

विनैव शङ्खपूजां यो वैष्णवः पूजयेद्धरिम् ।। १३८ ।। पूजाफलं नैवाप्नोति सम्यग्वा पूजकोऽपि सः । सभी वैष्णव-पूजाओं में तीनों कालों में, विधानों के ज्ञाता श्रेष्ठ साधक विधानपूर्वक प्रयत्न कर शंख पूजा करें। शंख की पूजा किए बिना जो वैष्णव श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे अच्छी तरह पूजा करनेवाले भी उस पूजा का फल नहीं प्राप्त करते हैं। धूपैश्च बहुभिः काम्यैः सुगन्धैर्गुग्गुलोद्भवैः ।। १३९ ।। अर्चयेत् परया भक्त्या रघुनाथमनन्यधीः । अपनी कामना के अनुसार अनेक प्रकार के धूपों से, सुगन्धित गुगगुल के धूप से परम भक्तिपूर्वक एकाग्रचित होकर श्रीरघुनाथ की पूजा करें। स्नेहसंयुक्तविपुलवर्तिकाभिरनेकधा ।। १४० ।। आरार्तिभिरनेकाभिः स्थापिताभिः प्रयत्नतः । पद्मस्वस्तिकरूपेण हंसाकारेण चामरम् ।। १४१ ।। भ्रामयेद् रघुनाथस्य पुरस्तात् प्रयतोऽन्वहम् । तेल, घी आदि से युक्त बड़ी बातियों वाले अनेक प्रकार से अनेक आरतियों से जो प्रयत्नपूर्वक स्थापित की गयी हैं, कमल, स्वस्तिक या हंस की आकृति बनाते हुए श्रीरघुनाथ के समक्ष नियम से चाँवर प्रतिदिन घुमावें। नैवेद्यैर्भक्ष्यभोज्यादिपूरितं पुरतः स्थितम् ।। १४२ ।। सूपापूपामृतोपेतं पायसाद्यं सशर्करम् । बहूपदंशसंशोभि सघृतं सुदधिप्रियम् ।। १४३ ।। निवेदयेत् प्रयत्नेन शोभिते शुद्धमुज्ज्वलम् । भक्ष्य, भोज्य आदि अनेक पदार्थ जैसे, दाल, पूआ, मधु के साथ शक्कर डाला हुआ पायस आदि, अनेक प्रकार की बड़ियों, घी तथा दही से सुसज्जित नैवेद्य जो शुद्ध और उज्ज्वल हो प्रयत्नपूर्वक निवेदित करें। कर्पूरशकलैर्युक्तं नागवल्लीदलान्वितम् ।। १४४ ।। सुधाबिन्दुसमायुक्तं पूगीफलमनोहरम् । ताम्बूलं रघुनाथस्य दत्वा कामानवाप्नुयात् ।। १४५ ।।

(188) अगस्त्य-संहिता कर्पूर खण्ड, चूना से युक्त, सुपारी से सुसज्जित कर पान का पत्ता लगाकर ताम्बूल श्रीराम को समर्पित कर सभी कामनाएँ प्राप्त करते हैं। पूर्वोक्तमेवं संक्षेपाद् विधानं गदितं मुने। सर्वेषां राममन्त्राणामेवमेवेरितं पुनः॥46॥ त्रिकालमेककालं वा एवं यः पूजयेत्सदा। सार्वभौमश्चिरं भूत्वा राजा एव भवेदिह॥47॥ हे मुनि सुतीक्ष्ण! पूर्व में कहे गये विधानों को ही यहाँ मैंने संक्षेप में कहा है। सभी राम-मन्त्रों के विधान इसी प्रकार के कहे गये हैं। जो तीनों कालों में या एक काल में प्रतिदिन पूजा करते हैं, वे बहुत दिनों तक इस संसार में एकच्छत्र राजा होते ही हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रान्तरवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः।।25।। अथ षड्विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच सर्वानुष्ठानसारं ते सर्वदानोत्तमोत्तमः। रहस्यं कथयिष्यामि सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम॥1॥ अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! सभी प्रकार के अनुष्ठानों में से सबसे महत्त्वपूर्ण और सभी दानों में उत्तम दान का रहस्य मैं बतलाता हूँ। 1चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ। उदये गुरुगौरांशोः स्वोच्चस्थे ग्रहपञ्चके॥2॥ मेषे पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटिकाह्वये। आविरासीत् सकलया कौशल्यायां परः पुमान्॥3॥ हे ब्राह्मण! चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुण्य दिन में जब पुनर्वसु नक्षत्र था, गुरु और चन्द्रमा का उदय हुआ था तथा पाँच ग्रह अपनी अपनी उच्च राशि पर स्थित थे, सूर्य मेष राशि में स्थित थे और उस समय कर्क लग्न था, ऐसे समय में अपनी कला के साथ परम पुरुष श्रीराम का प्राकट्य कौशल्या के गर्भ से हुआ।

  1. श्लोक संख्या 2-4 तक केवल 'क' में उपलब्ध।

षड्विंशोऽध्यायः (189) उच्चस्थे ग्रहपञ्चके सुरगुरौ सेन्दौ नवम्यां तिथौ लग्ने कर्कटके पुनर्वसुयुते मेषं गते पूषणि। निर्दग्धुं निखिलाः पलाशसमिधो मेध्यादयोध्यारणे- राविर्भूतमभूतपूर्वविभवं यत्किंचिदेकं महः।।4।। जब पाँच ग्रह अपनी उच्च राशि में थे, बृहस्पति चन्द्रमा के साथ थे, नवमी तिथि थी, पुनर्वसु नक्षत्र था, सूर्य मेष राशि में थे, तब कर्क लग्न में राक्षस रूपी समिधाओं को जलाने के लिए अयोध्या रूपी पवित्र अरणि से एक अभूतपूर्व राम नामक तेज उत्पन्न हुआ। (टिप्पणी : पाण्डुलिपि ग. में ‘चैत्रे नवम्यां’ इत्यादि से ‘तु शुक्लपक्षे’ तक अनुपलब्ध है। किन्तु पाँचवें श्लोक का अंश ‘रघूत्तमः।’ उपलब्ध होने कारण उपर्युक्त अंश को भ्रम से खण्डित माना जाना चाहिए, प्रक्षेप नहीं। अतः मैंने इस अंश को मूल पाठ माना है। किन्तु श्लोक संख्या 4 भोजराज कृत चम्पूरामायण’ में 1।29 पर भी उपलब्ध है।) चैत्रे मासे नवम्यां तु शुक्लपक्षे रघूत्तमः। प्रादुरासीत्पुरा ब्रह्मन् परब्रह्मैव केवलम्।।5।। तस्मिन् दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतन्तदा¹। ततो जागरणं कुर्याद्रघुनाथपरो भुवि।।6।। प्रातर्दशम्यां कृत्वा तु सन्ध्यादि सकलाः क्रियाः। सम्पूज्य विधिवद् रामं भक्त्या वित्तानुसारतः।।7।। ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत्। गो-भू-तिल-हिरण्याद्यैः स्वर्णालङ्करणैस्तथा।।8।। रामभक्तान् प्रयत्नेन प्रीणयेत् परया मुदा। एवं यः कुरुते भक्त्या श्रीरामनवमीव्रतम्।।9।। अनेकजन्मसिद्धानि पातकानि बहून्यपि। भस्मीकृत्य व्रजत्येव श्रीविष्णोः परमं पदम्।।10।। चैत्र मास की नवमी तिथि को शुक्लपक्ष में परब्रह्म श्रीराम प्राचीन काल में अवतरित हुए। उस दिन उपवास का व्रत करना चाहिए। इसके बाद श्रीराम का ध्यान करते हुए जागरण करना चाहिए। प्रातःकाल दशमी में सन्ध्या आदि

  1. ग. व्रतं सदा।

(190) अगस्त्य-संहिता सभी कृत्य कर श्रीराम की विधिवत् पूजा भक्ति के साथ अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार करें। भक्तिपूर्वक ब्राह्मण भोजन करावें तथा दान-दक्षिणा देकर उन्हें सन्तुष्ट करें। परम प्रसन्न होकर यत्नपूर्वक श्रीराम के भक्तों को सन्तुष्ट करें। ऐसा करने से अनेक जन्मों में उपजे अनेक पाप को भस्म कर वह व्यक्ति विष्णु का परम धाम प्राप्त करता है। सर्वेषामप्ययं धर्मो मुक्तिभुक्त्यैकसाधनः। अशुचिर्वापि पापिष्ठः कृत्वेदं व्रतमुत्तमम्।।11।। पूज्यः स्यात् सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः। यह सबके लिए धर्म है, जो भोग और मोक्ष का निश्चित साधन है। चाहे वह अपवित्र हो या सबसे बड़ा पापी क्यों न हो, यह श्रेष्ठ व्रत कर सभी प्राणियों के बीच जैसे श्रीराम पूज्य हैं वैसे वह भी पूज्य हो जाता है। यस्तु रामनवम्यान्तु भुङ्क्ते स तु नराधमः।।12।। कुम्भीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः। त्रैलोक्यपापमश्नाति स्वधर्मो निष्फलो भवेत्।।13।। यस्तु रामस्य नवमीमनादृत्य नराधमः। अश्नीयान्नरकं गच्छेद्यावदाचन्द्रतारकम्।।14।। अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वोत्तमोत्तमम्। व्रतान्यन्यानि कुरुते न तेषां फलभाग् भवेत्।।15।। सर्वव्रतस्य प्रीत्यर्थमिदं श्रीरामव्रतं चरेत्। रहस्यकृतपापानि प्रख्यातानि बहून्यपि। महान्ति विप्रणश्यन्ति श्रीरामनवमीव्रतात्।।16।। जो रामनवमी के दिन भोजन करते हैं, वे मनुष्यों में अधम बन जाते हैं और कुम्भीपाक नरक का ताप भोगते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। तीनों लोकों में पाप के भागी होते हैं, उनका अपना धर्म निष्फल हो जाता है। जो नराधम श्रीराम की नवमी तिथि का अनादर कर भोजन कर लेते हैं वे चन्द्रमा और नक्षत्रों के विद्यमान रहने तक नरक का भोग करते हैं। सभी व्रतों में उत्तम रामनवमी का व्रत न कर जो दूसरे व्रत करते हैं, उन्हें उन अन्य व्रतों का फल नहीं मिलता सभी व्रतों की प्रीति के लिए श्रीराम का व्रत करना चाहिए। इसे करने से गुप्त रूप से या प्रकट रूप से किये गये सभी महान् पाप नष्ट हो जाते हैं।

षड्विंशोऽध्यायः (191) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — एकामपि नरो भक्त्या श्रीरामनवमीं मुने।¹ उपोष्य कृतकृत्यः स्यात्² सर्वपापैः प्रमुच्यते।।17।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! जो नर एक बार भी भक्तिपूर्वक श्रीरामनवमी व्रत कर लेते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं और सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। नरो रामनवम्यान्तु श्रीरामप्रतिमाप्रदः। विधानेन मुनिश्रेष्ठ सुमुक्तो नात्र संशयः।।18।। रामनवमी में श्रीराम की मूर्ति का दान विधिपूर्वक करनेवाले भलीभाँति मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच श्रीराम प्रतिमादानं विधानं च कथं मुने। कथयस्व प्रसादेन मयि भक्तस्य विस्तरात्।।19।। सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे मुनि अगस्त्य! श्रीराम की प्रतिमा दान करने का क्या विधान है? मुझपर प्रसन्न होकर भक्तों की सुविधा के लिए विस्तार से कहें। अगस्त्य उवाच कथयिष्यामि ते ब्रह्मन् प्रतिमादानमुत्तमम्। विधानं चापि यत्नेन यतस्त्वं वैष्णवोत्तमः।।20।। अगस्त्य बोले- हे ब्राह्मण सुतीक्ष्ण! तुम विष्णु के श्रेष्ठ भक्त हो, अतः मैं प्रतिमा-दान की विधि यत्नपूर्वक कहूँगा। अष्टम्यां चैत्रमासस्य शुक्लपक्षे जितेन्द्रियः। दन्तधावनपूर्वन्तु प्रातः स्नायाद्यथाविधि।।21।। चैत्र मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को जितेन्द्रिय होकर पहले दातून कर प्रातःकाल विधानपूर्वक स्नान करें। नद्यां तडागे कूपे वा ह्रदे प्रस्रवणेऽपि वा। ततः सन्ध्यादिकं कुर्यात् संस्मरन् राघवं हृदि।।22।। गृहमागत्य विप्रेन्द्र कुर्यादौपासनादिकम्। नदी, तालाब, कुआँ, झील या जलप्रपात में स्नान करें। तब हृदय में श्रीराम का ध्यान करते हुए सन्ध्यावंदन आदि करें। इसके बाद घर आकर दैनिक उपासना करें। ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

  1. ग. श्रीरामनवमीव्रतात्। 2. ग. भक्त्या यः कुर्यात् ।

(192) अगस्त्य-संहिता

दान्तं कुटुम्बिनं विप्रं वेदशास्त्ररतं सदा।।२३।। श्रीरामपूजानिरतं सुशील दम्भवर्जितम्। विधिज्ञं राममन्त्राणां राममन्त्रैकसाधकम्।।२४।। आहूय भक्त्या सम्पूज्य वृणुयात् श्रद्धयान्वितः। श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम। तत्राचार्यो भव प्रीतः श्रीरामोऽपि त्वमेव मे।।२५।। तब उदार विचार वाले, परिवार वाले और जो वेद और शास्त्र में रमे रहते हों, श्रीराम की पूजा करते हों, सुशील, अहंकार रहित हों, श्रीराम के मन्त्रों की विधानों का ज्ञान रखते हों तथा श्रीराम के मन्त्र को सिद्ध किए हों, ऐसे ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक आमन्त्रित कर श्रद्धा के साथ उनका वरण करें- 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैं श्रीराम की प्रतिमा का दान करूँगा। इस अनुष्ठान में आप आचार्य हों तथा मेरे ऊपर प्रसन्न हों। मेरे लिए श्रीराम भी आप ही हैं।' इत्युक्त्वापूज्य तं विप्रं स्नापयित्वा ततः स्वयम्। तैलेनाभ्यङ्गमास्नायात् चिन्तयन् राघवं हृदि।।२६।। ऐसा कहकर उस विप्र की पूजा कर उन्हें स्नान कराकर फिर हृदय में श्रीराम का ध्यान करते हुए तेल लगाकर स्वयं स्नान करें। श्वेताम्बरधरः श्वेतगन्धमाल्यानि धारयेत्। अर्चितो भूषितश्चैव कृतमाध्याह्निकक्रियः।।२७।। आचार्य भोजयेत् पश्चात् सात्त्विकान्नः सुविस्तरैः। भुञ्जीत स्वयमप्येवं हृदि राममनुस्मरन्।।२८।। श्वेत वस्त्र पहनकर श्वेत एवं सुगन्धित माला धारण करें। अर्चित और भूषित होकर मध्याह्नकालिक कृत्यों को सम्पन्न कर अनेक प्रकार के सात्त्विक भोज्य पदार्थों से आचार्य को भोजन कराकर स्वयं भी हृदय में श्रीराम का स्मरण करते हुए भोजन करें। एकभुक्तव्रती तत्र सदाचारो जितेन्द्रियः। वसेत् स्वयं तथैकान्ते श्रीरामार्पितमानसः।।२९।। शृण्वन् रामकथां दिव्यामहःशेषं नयेन्मुने।

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षड्विंशोऽध्यायः (193) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — एकभुक्त व्रत करते हुए सदाचारपूर्वक जितेन्द्रिय होकर एकान्त में रहते हुए श्रीराम के प्रति मन समर्पित कर श्रीराम की दिव्य कथा सुनते हुए दिन का शेष भाग व्यतीत करें। सायं सन्ध्यादिकाः कुर्यात् सदाराममनुस्मरन् ।।30।। आचार्य सहितो रात्रावधःशायी जितेन्द्रियः। सायंकाल श्रीराम का स्मरण करते हुए सन्ध्यावंदन आदि कृत्य करें तथा रात्रि में आचार्य के साथ भूमि पर जितेन्द्रिय होकर शयन करें। ततः प्रातः समुत्थाय स्नात्वा सन्ध्यां विधाय च ।।31।। प्रातः सर्वाणि कर्माणि शीघ्रमेव समर्पयेत्। इसके बाद प्रातःकाल उठकर स्नान और सन्ध्यावंदन कर सभी कर्मों को शीघ्र सम्पन्न करें। चतुर्द्वारं पताकाढ्यं सुवितानं सुतोरणम् ।।32।। मनोरमं महोत्सेधं पुष्पाद्यैः समलङ्कृतम् ।। शङ्खचक्रहनूमद्भिः प्राग्द्वारे समलङ्कृतम्। गरुत्मच्छार्ङ्गबाणैश्च दक्षिणे समलङ्कृतम् ।।35।। गदापद्माङ्गदैश्चैव पश्चिमे समलङ्कृतम्। पद्मस्वस्तिकनीलैश्च कौबेरे समलङ्कृतम् ।।36।। मध्ये हस्तचतुष्काढ्ये वेदिकायुक्तमायतम्। प्रविश्य गीतवृत्तैश्च वाद्यैश्चापि हि संयुतम् ।।37।। तब ऐसे विशाल गृह में प्रवेश करें, जहाँ चार हाथ की वेदी बनी हुई हो, चारो ओर द्वार हों, पताकाएँ फहरा रही हों, चन्दोवा टँगे हों, वंदनबार लगे हों, सुन्दर, विशाल और फूल आदि से सजे हों। इस भवन का पूर्व द्वार शंख, चक्र एवं हनुमान् से अलंकृत हों, दक्षिण द्वार पर गरुड, शार्ङ्ग एवं बाण, पश्चिम द्वार पर गदा, पद्म एवं अंगद हों तथा पद्म, स्वस्तिक एवं नील उत्तरी द्वार पर हों। बीच में चार हाथ लम्बाई और चौड़ाई की वेदी बनी हुई है। पुण्याहं वाचयित्वात्र विद्वद्भिः प्रीतमानसैः। ततः संकल्पयेद् देवं राममेव स्मरन् मुने ।।38।।

(194) अगस्त्य-संहिता अस्यां रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः। उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि।।39।। इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां सुप्रयत्नतः। श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते।।40।। प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुबहूनि मे। अनेकजन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च।।41।। इस घर में गाते-बजाते लोगों के साथ प्रवेश कर प्रसन्नचित्त विद्वानों द्वारा पुण्याहवाचन करावें। इसके बाद भगवान् श्रीराम का स्मरण करते हुए इस प्रकार संकल्प करें:- 'इस रामनवमी में मैं श्रीराम की आराधना करता हुआ आठो पहर उपवास कर विधिपूर्वक श्रीराम की पूजा कर श्रीराम की इस स्वर्णमयी प्रतिमा को प्रयत्नपूर्वक श्रीराम की प्रीति के लिए श्रीराम के भक्त को दान करता हूँ। इससे प्रसन्न श्रीराम मेरे अनेक महान् पापों को हर लें, जो मेरे द्वारा अनेक जन्मों में बार बार किए गये हैं।' ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमानतः। निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामाङ्कस्थितजानकीम्।।42।। विभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां महामते। वामेनाधः करेणाराद् देवीमालिङ्ग्य संस्थिताम्।।43।। सिंहासने राजतेऽत्र पलद्वयविनिर्मिते। पञ्चामृतस्नानपूर्वं सम्पूज्य विधिवन्नरः।।44।। मूलमन्त्रेण नियतो न्यासपूर्वमतन्द्रितः। दिवैव विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणन्ततः।।45।। इसके बाद एक पल सोना से निर्मित श्रीराम की प्रतिमा लें, जिसमें दो भुजाएँ हों, वाम भाग में जानकीजी हों, दक्षिण हाथ ज्ञान मुद्रा में हों और वायें हाथ से देवी का आलिंगन दूर से किए हो। ऐसी प्रतिमा को दो पल सोना से निर्मित सिंहासन पर विराजित करें पञ्चामृत से स्नान कराकर पूर्व में न्यास कर मूलमन्त्र से नियमपूर्वक विना आलस्य किए हुए प्रतिमा-पूजन करें। दिन में इस प्रकार विधानपूर्वक कृत्य सम्पन्न कर रात्रि में जागरण करें।

षड्विंशोऽध्यायः (195)

दिव्यां रामकथामुक्त्वा रामभक्तैः समन्वितः। नृत्योत्सवादिभिश्चैव रामस्तोत्रैरनेकधा ।।46।। यामाष्टकं यथान्यायं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। सकर्पूरागरुश्चैव कह्लाराद्यैरनेकधा ।।47।। पूजयेद् विधिवद् भक्त्या दिवारात्रं नयेद् बुधः। रात्रि में श्रीराम के भक्तों के साथ श्रीराम की दिव्यकथा कहकर, नृत्य, उत्सव आदि तथा अनेक प्रकार के श्रीराम-स्तोत्रों से आठो पहर विधान के साथ चन्दन, फूल, अक्षत आदि सामग्रियों से कपूर, अगर, और कमल आदि फूलों से अनेक प्रकार से पूजन करें। इस प्रकार श्रीराम की विधिवत् भक्तिपूर्वक पूजा करते हुए दिन-रात व्यतीत करें। [ यहाँ पाण्डुलिपि क. में चन्दन के निर्माण की विधि एवं प्रभेद मूल पाठ के साथ उपलब्ध है। यह अंश ग. एवं घ. में नहीं होने के कारण इसे टिप्पणी के रूप में रखा गया है- (सकर्पूरागरुश्चैव) कस्तूरीचन्दनन्तथा ।।47।। कङ्कोलञ्च भवेदेभिः पञ्चभिर्यक्षकद्दमः। कस्तूरिकायाः द्वौ भागौ चत्वारश्चन्दनस्य च। कुङ्कुमस्य त्रयश्चैव शशिनः स्याच्चतुस्समम् ।।48।। कुङ्कुमं केशरञ्चैव शशिकर्पूर एव च। कर्पूरचन्दनं दर्प कुङ्कुमं च समांशकम् ।।49।। सर्वगन्धमितिप्रोक्तं समस्तैश्च सुवल्लभम्। कपूर, अगरु, कस्तूरी, चन्दन और कंकोल इन्हें मिलाकर यक्षकदम बनाया जाता है। दो भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन, तीन भाग रोली और चार भाग श्वेतकर्पूर मिलाकर 'चतुस्सम' नामक सुगन्धित द्रव्य होता है। अथवा कुंकुम, केसर, श्वेतकर्पूर, ये तीनों मिश्रित करें। अथवा कर्पूर, चन्दन, कस्तूरी और रोली समान मात्रा में मिलायें, इसे 'सर्वगन्ध' कहते हैं।] ततः प्रातः समुत्थाय स्नान-सन्ध्यादिकाः क्रियाः ।।48।। समाप्य विधिवद्रामं पूजयेत् पूर्ववन्मुने। तब प्रातःकाल उठकर स्नान, सन्ध्या आदि सभी कृत्य समाप्त कर विधिवत् पूर्वोक्त रीति से श्रीराम की पूजा करें।

(196) अगस्त्य-संहिता

ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ।।४९।। पूर्वोक्तपद्मकुण्डे वा स्थण्डिले वा यथाविधि। लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टोत्तरन्ततः ।।५०।। साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः ।।५१।। इसके बाद मन्त्रज्ञानी मूलमन्त्र से पूर्वोक्त हवन कुण्ड में अथवा स्थण्डिल पर होम करें। यह होम विधानपूर्वक लौकिक अग्नि में श्रीराम का स्मरण करते हुए घृत युक्त पायस से कम से कम एक सौ आठ बार करें। ततो भक्त्या तु संतोष्य आचार्यं पूजयेन्मुने। कुण्डलाभ्यां सरत्नाभ्यामङ्गुलीयैरनेकधा। ।।५२।। गन्धपुष्पाक्षतैर्वस्त्रैर्विचित्रैः सुमनोहरैः। ततो रामं स्मरन् दद्यादिदं मन्त्रमुदीरयन् ।।५५।। इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलङ्कृताम्। चित्रवस्त्रयुगाच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते ।।५६।। श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः। प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुबहून्यपि ।।५७।। अनेक जन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च। हे मुनि सुतीक्ष्ण! तब कुण्डल, रत्न, अंगूठी आदि अनेक वस्तुओं से आचार्य को सन्तुष्ट कर चन्दन, फूल, अक्षत आदि से आराधना कर रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्र समर्पित कर श्रीराम का स्मरण करते हुए इस मन्त्र को पढ़ते हुए दान करें- “हे आचार्य! आप श्रीराम स्वरूप हैं। मैं भी श्रीराम स्वरूप हूँ। रंग-बिरंगा एक जोड़ा वस्त्र में छिपी हुई तथा अलंकृत श्रीराम की यह स्वर्णमयी प्रतिमा श्रीराम की प्रीति के लिए आपको दे रहा हूँ। इससे श्रीराम प्रसन्न हों तथा अनेक जन्मों में अर्जित तथा बार बार किए गये मेरे महापाप श्रीराम हर लें।” इति दत्वा विधानेन दद्याद् वै दक्षिणान्तरम् ।।५८।। अन्येभ्यश्च यथान्यायं गो-हिरण्यादिशक्तितः। दद्याद् वासोयुगं धान्यं यथा विभवमादृतः ।।५९।।

षड्‌विंशोऽध्यायः (197)

इस प्रकार विधानपूर्वक दान कर दूसरी दक्षिणा करें। दूसरे लोगों को भी उचित रीति से गाय, स्वर्ण आदि शक्ति के अनुसार दान करें। जोड़ा वस्त्र, धन- सम्पत्ति भी विभवानुसार दान करें। ब्राह्मणैः सह भुञ्जीत तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम्। ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।।60।। तुलापुरुषदानादिफलं प्राप्नोति मानवः। अनेकजन्मसंसिद्धपापेभ्यो मुच्यते ध्रुवम्।।61।। बहुना किमिहोक्तेन मुक्तिस्तस्य करे स्थिता। कुरुक्षेत्रे महापुण्ये सूर्यपर्वण्यशेषतः।।62।। तुलापुरुषदानादि कृते तत् लभ्यते फलम्। तत्फलं लभ्यते मर्त्यैर्दानानेन सुव्रत।।63।। इसके बाद ब्राह्मणों के साथ भोजन करें और उन्हें दक्षिणा भी दें। इस प्रकार प्रतिमा-दान करने से वह ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। तुलापुरुष दान आदि का फल वह व्यक्ति पाता है। अनेक जन्मों के संचित पापों से मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्र में, पुण्य क्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय अशेष रूप से तुलापुरुष-दान (पुरुष के भार के बराबर स्वर्णदान) का जो फल मिलता है, वही मानव इस दान से पाता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामव्रतकथनं नाम षड्‌विंशोऽध्यायः।।26।। विशेष ( इस अध्याय में श्लोक संख्या 55 के बाद निम्नलिखित अंश केवल पाण्डुलिपि क. में उपलब्ध है, किन्तु पूर्वापर अनन्वय तथा अकाण्डप्रथन के कारण यह अंश प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। ऐसी सम्भावना है कि किसी लिपिकार ने उक्त स्थल पर पाद-टिप्पणी के रूप में अनुकल्पों का उल्लेख किया होगा, जिसे प्रतिलिपिकार ने खण्डित मूल अंश समझकर कालान्तर में पाठ के साथ जोड़ दिया होगा। इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलङ्कृताम्। यह पंक्ति दो बार मिलने के कारण इस स्थिति की सम्भावना बढ़ जाती है। इस अंश को यहाँ अनुवाद के साथ दिया जा रहा है-

(198) अगस्त्य-संहिता

इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलङ्कृताम्। इस स्वर्णमयी प्रतिमा को जो अलंकृत है------- अभावे सर्वरत्नानां हेम सर्वत्र योजयेत्।।56।। रुद्रबीजं परं पूतं यतस्तस्यैव सर्वदा। सभी प्रकार के रत्नों के अभाव में सभी स्थलों पर सुवर्ण का व्यवहार करें। या रुद्राक्ष परम पवित्र है, उसी का व्यवहार करें। सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा। सर्वेषामेव दानानां सुवर्णं दक्षिणेष्यते।।57।। सुवर्ण का दान श्रेष्ठ है और सुवर्ण दक्षिणा भी श्रेष्ठ है। सभी दानों में सुवर्ण दक्षिणा मानी जाती है। श्रद्धापूतः शुचिर्दान्तो दानं दद्यात् सदक्षिणम्। अदक्षिणन्तु यद्दानं तत्सर्वं निष्फलं भवेत्।।58।। श्रद्धा से पवित्र, पवित्र, मृदु स्वभाव वाले व्यक्ति दक्षिणा के साथ दान करें। बिना दक्षिणा का जो दान किया जाता है, वह सब निष्फल होता है देयद्रव्यतृतीयांशं दक्षिणां परिकल्पयेत्। अनुक्ते दक्षिणादाने दशांशं वापि शक्तितः।।59।। दान की गयी वस्तु की तेहाई दक्षिणा रखें। जहाँ दक्षिणा का उल्लेख न हो वहाँ दशांश अथवा शक्ति के अनुसार करें।] सप्तविंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच प्रायेण हि नराः सर्वे दरिद्राः कृपणाः मुने। असामर्थ्याद् विधानेऽस्मिन् कथन्तेषां विधिः प्रभो।।1।। सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे मुनि अगस्त्य! सभी मनुष्य प्रायः दरिद्र और कृपण होते हैं। यदि इस विधान का सामर्थ्य उनमें न हो, तब वे कैसे आराधना करेंगे। अगस्त्य उवाच अशक्तो यो महाभाग तस्य वित्तानुसारतः। पलार्द्धेन तदर्द्धेन तदर्द्धार्द्धेन वा पुनः।।2।। वित्तशाठ्यमकृत्त्वैव कुर्यादितद् व्रतं मुने।

सप्तविंशोऽध्यायः (199) अगस्त्य बोले—हे महाभाग! जो सामर्थ्यहीन हों, वे धन के अनुसार पल का आधा, चौथाई, या अष्टमांश सुवर्ण से निर्मित प्रतिमा का दान करें। सम्पत्ति रहे तो बिना छुपाये तथा न रहे, तो भी दिखावटी भी नहीं करते हुए ही यह व्रत करें। यदि घोरतरादृष्टं यातनां¹ नेहते क्वचित् ।। 3 ।। अकिंचनोऽपि नियतं उपोष्य नवमीदिनम्। कृत्वा जागरणं भक्त्या रामभक्तैः समन्वितः ।। 4 ।। स्मरन् रामं धिया भक्त्या पूजयेद् विधिवन्मुने। यदि भाग्य अत्यन्त कठोर हो, फिर भी वे कष्ट का अनुभव न करें। जिसके पास कुछ भी नहीं हो, वह भी नियमपूर्वक नवमी में उपवास कर श्रीराम के भक्तों के साथ रात में जागरण कर श्रीराम का स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक पूजा करें। जपन् राममनुंमायारमानङ्गसमन्वितम् ।। 5 ।। एकाक्षरं वा विधिवत्सर्वन्यासकृतोन्नतिः । विधानपूर्वक सभी प्रकार के न्यासों से उन्नत होकर साधक श्रीराम के मन्त्र को माया (ह्रीं), रमा (श्रीं) और कामबीज (क्लीं) से संयुक्त कर अथवा एकाक्षर मन्त्र (रां) का जप करें। प्रातः स्नात्वा च विधिवत् कृत्वा सन्ध्यादिकाः क्रियाः ।। 6 ।। गो-भू-तिल-हिरण्यादि दद्याद् वित्तानुसारतः। श्रीरामचन्द्रभक्तेभ्यो विद्वद्भ्यः श्रद्धयान्वितः ।। 7 ।। प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान और सन्ध्यावंदन आदि क्रियाएँ कर धन- सम्पत्ति के अनुसार गाय, भूमि, तिल, सुवर्ण आदि श्रीराम के भक्त विद्वानों को श्रद्धापूर्वक दान करें। पारणं च प्रकुर्वीत ब्राह्मणैः सह भक्तितः । एवं यः कुरुते भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। 8 ।। ब्राह्मणों के साथ भक्तिपूर्वक पारणा करें। ऐसा जो करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। प्राप्ते श्रीरामनवमीदिने मर्त्यो विमूढधीः। उपोषणं न कुरुते कुम्भीपाकेषु पच्यते ।। 9 ।।

  1. ग. पापानां।

(200) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————————————————————— श्रीरामनवमी का दिन आने पर जो मूर्ख मनुष्य उपवास नहीं करते हैं, वे कुम्भीपाक नरक में पचते हैं। यत्किंचिद् रामममुद्दिश्य नो ददातिस्वशक्तितः। रौरवेषु स मूढात्मा पच्यते नात्र संशयः।।10।। अपनी शक्ति के अनुसार जो कुछ श्रीराम को लक्ष्य कर अपनी शक्ति के अनुसार दान नहीं करता है, वह मूर्ख रौरव नरक में पचता है, इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच यामाष्टकेषु पूजा वै त्वया प्रोक्ता महामुने। मूलमन्त्रेण चेत्युक्तं तत्कथं वद सुव्रत।।11।। हे महामुनि सुतीक्ष्ण! आपने आठो यामों में पूजा की जो विधि बतलायी है और यह भी कहा है कि मूलमन्त्र से यह पूजा की जानी चाहिए। हे सुव्रत! अगस्त्य अब बतलाइये कि मूलमन्त्र से कैसे पूजा होगी? अगस्त्य उवाच सर्वेषां राममन्त्राणां मन्त्रराजं षडक्षरम्। तारकं ब्रह्म वेदोक्तं तेन पूजा प्रशस्यते।।12।। (अगस्त्य बोले- ) सभी राम-मन्त्रों में छह अक्षरों का मन्त्रराज वेद में तारक ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है। इससे पूजा प्रशस्त होती है। दशमाध्यायविधिना¹ पूजा कार्या प्रयत्नतः। द्वारपीठाङ्गदेवानामावृतीनां तथैव च।।13।। आदावेव प्रकुर्वीत देवस्य प्रतिमां ततः।। उपचारैः षोडशभिः पूजां कुर्याद्यथाविधि।।14।। प्रयत्नपूर्वक दशम अध्याय में उक्त विधि से षोडशोपचार से द्वार देवता, पीठ देवता, अंग देवता तथा अन्य आवरण-देवताओं की पूजा विधान से करनी चाहिए। आवाहनं स्थापनं च संनिधापनमेव च। संनिरोधनमेव स्यादवगुण्ठनमञ्जसा।।15।। तत्तन्मुद्राभिरेवं स्याद् देवं संप्रार्थ्य भक्तितः। शङ्खपूजां प्रकुर्वीत पूर्वोक्तविधिना मुने।।16।।

  1. ग. एवं घ. दशाक्षरविधानेन।

सप्तविंशोऽध्यायः (201) देवता का आवाहन, स्थापन, संनिधापन, संनिरोधन अवगुंठन उन उन मुद्राओं से करें तथा भक्तिपूर्वक उनकी प्रार्थना कर शंखपूजा पूर्व में कही गयी विधि से करें। कलशं वामभागस्थं पूजाद्रव्याणि चादरात्। पात्रं च प्रोक्षयेद् भक्त्या चात्मानं मन्त्रमुच्चरन्।।17।। वाम भाग में स्थित कलश, पूजा-सामग्रियों, पात्रों एवं स्वयं का प्रोक्षण भक्तिपूर्वक मन्त्र का उच्चारण करते हुए करें। प्रतिमां शंखपूजां च कुर्याद्देवमनुस्मरन्। पात्रासादनमप्येवं कुर्याद् देवमतन्द्रितः।।18।। प्रतिमा का प्रोक्षण तथा शंख की पूजा भी इसी प्रकार श्रीराम का स्मरण करते हुए करें तथा वाम भाग में पात्रों को यथास्थान रखने का कार्य भी आलस्य छोड़कर इसी प्रकार करें। पीताम्बराणि देवाय प्रार्थितान्यर्पयेत् सुधीः। स्वर्णयज्ञोपवीतानि दद्याद् देवाय शक्तितः।।19।। नानारत्नविचित्राणि दद्यादाभरणानि च। विद्वान् यजमान पीले वस्त्रों की प्रार्थना कर देवता को अर्पित करे। स्वर्ण- निर्मित यज्ञोपवीत आदि भी देवता को समर्पित करे। नाना प्रकार के रत्नों से जड़े हुए आभूषण भी समर्पित करें। हिमाम्बुघृष्टरुचिरघनसारसमन्वितम् ।।20।। गन्धं दद्यात्प्रयत्नेन चागरुं च सकुङ्कुमम्। मूलमन्त्रेण सकलानुपाचारान्प्रकल्पयेत्।।21।। बर्फ के पानी में घिसा हुआ सुन्दर कपूर, कुंकुम तथा अगर से युक्त गन्ध समर्पित करें। सभी उपचार मूलमन्त्र से कल्पित करें। कह्लारकेतकीजातीपुन्नागाद्यैः प्रपूजयेत्। चम्पकैः शतपत्रैश्च सुगन्धैः सुमनोहरैः।।22।। सुगन्धित एवं सुन्दर कमल, केतकी, जाती, नागकेसर, चम्पा, शतपत्र के पुष्पों से पूजन करें।

(202) अगस्त्य-संहिता —————————————————————————————————————————— घण्टां च वादयन् धूपं दीपं चास्मै समर्पयेत्। भक्ष्यभोज्यादिकं भक्त्या देवाय विधिनाऽर्पयेत् ।।२३।। घण्टा बजाते हुए धूप, दीप, भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ देवता को विधिपूर्वक समर्पित करें। एवं सोपस्करं देवं दत्वा पापैः प्रमुच्यते। जन्मकोटिकृतैः घोरैर्नानारूपैः सुदारुणैः ।।२४।। विमुक्तस्तत्क्षणादेव राम एव भवेन्मुने। इस प्रकार उपकरणों के साथ देवता को समर्पित कर अनेक प्रकार के दारुण, करोड़ों जन्मों में किये गये पापों से वह उसी समय मुक्त होकर श्रीराम का स्वरूप प्राप्त कर लेता है। श्रद्दधानस्य ते प्रोक्तं श्रीरामनवमीव्रतम् ।।२५।। सर्वलोकहितार्थाय पवित्रं पापनाशनम्। हे मुनि! आप श्रद्धावान् हैं, इसलिए मैंने सभी लोगों के कल्याण के लिए पवित्र और पापों का नाश करनेवाले श्रीरामनवमी व्रत के बारे में बतलाया। लौहेन निर्मितं चापि शिलया दारुणापि वा ।।२६।। येन केन प्रकारेण यस्मै कस्मै क्रमान्मुने। चैत्रशुक्लनवम्यां तु दत्वा विप्राय भक्तितः ।।२७।। सर्वपापविनिर्मुक्तो भवेदेव न संशयः। लोहा, पत्थर अथवा काष्ठ की बनी हुई प्रतिमा जिस किसी भी प्रकार से जिस किसी ब्राह्मण को विधानपूर्वक चैत्र शुक्ल नवमी तिथि को दान कर सभी पापों से मुक्त होता ही है, इसमें सन्देह नहीं। तस्मिन् दिने महापुण्ये स्नानदानादिकं मुने ।।२८।। कृतं सर्वप्रयत्नेन यत्किंचिदपि भक्तितः। महादानादितुल्यं स्याद्रामोद्देशेन कल्पितम्। वित्तशाठ्यमकृत्वैव सर्वं कुर्यात् स्वशक्तितः ।। उस महान् पुण्यमय दिन में जो कुछ भी स्नान, दान आदि भक्ति एवं यत्नपूर्वक किया जाता है, वह अक्षय्य होता है। श्रीराम के उद्देश्य से जो कुछ भी किया जाता है वह महादान आदि के समान फलदायी होता है। अपनी सम्पत्ति की अनदेखी न करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार सबकुछ करना चाहिए। Rarest Archiver

अष्टाविंशोऽध्यायः (203) — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — तस्मिन् दिने महापुण्ये प्रातरारभ्य भक्तितः।।29।। जपेदेकान्त आसीनो यावत्स्याद्दशमीदिनम्। उस महापुण्यमय दिन में प्रातःकाल से आरम्भ कर एकान्त में बैठकर जबतक दशमी तिथि रहे, तबतक जप करें। तेनैव स्यात् पुरश्चर्या दशम्यां भोजयेद् द्विजान्।।30।। भक्ष्यभोज्यैर्बहुविधैर्दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्। कृतकृत्यो भवेत्तेन सद्यो रामः प्रसीदति।।31।। उसी मन्त्र से पुरश्चरण किया जाना चाहिए, दशमी में अनेक प्रकार के भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से ब्राह्मण-भोजन करना चाहिए और शक्ति के अनुसार दक्षिणा दी जानी चाहिए। इससे वह व्यक्ति कृतकृत्य हो जाता है; उसपर श्रीराम तुरत प्रसन्न होते हैं। तद्दिने तु नरो याति पुनरावृत्तिवर्जितः। द्वादशाब्दशतेनापि यत्पापं नापमृज्यते।।32।। विलयं याति तत्सर्वं श्रीरामनवमीदिने। जपेन राममन्त्राणां योऽयं जानाति तस्य तु।।33।। रामनवमी के दिन यह सब करने से मनुष्य पुनर्जन्म से रहित मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। बारह वर्षों में भी जो पाप नहीं कटता, वे सारे पाप श्रीरामनवमी के दिन श्रीराम के मन्त्र के जप से नष्ट होते हैं, साथ ही, जो इसे जानते हैं, उनके भी पाप नष्ट हो जाते हैं। उपोष्य च स्मरन् रामं न्यासपूर्वमनन्यधीः। गुरोर्लब्धमनुर्यस्तु तस्य न्यासपुरस्सरम्।।34।। यामे यामे च विधिवद्रामपूजां समाहितः।¹ उपवास कर श्रीराम का स्मरण करते हुए एकाग्रचित्त हो गुरु से प्राप्त मन्त्र का न्यासपूर्वक जप करना चाहिए तथा पहर-पहर पर ध्यान लगाकर विधिवत् श्रीराम की पूजा करनी चाहिए। मुमुक्षवोऽपि च सदा श्रीरामनवमीव्रतम्।।35।। ¹न त्यजन्ति सुरश्रेष्ठो देवेन्द्रोऽपि विशेषतः। हमेशा मोक्ष की कामना करनेवाले भी श्रीरामनवमी का व्रत नहीं छोड़ते हैं। विशेष रूप से देवताओं में श्रेष्ठ देवराज इन्द्र भी रामनवमी व्रत नहीं छोड़ते हैं।

  1. ग. यामेन विधिवत् सर्वं कुर्यात् पूजां समाहितः।

(204) अगस्त्य-संहिता

तस्मात्सर्वात्मना सर्वे कृत्वैव नवमीव्रतम्। मुच्यते सर्वपापेभ्यो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।।36।। अतः सबलोग सभी प्रकार से नवमी व्रत करके ही सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं और सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामनवमीव्रतविधानं नाम सप्तविंशोऽध्यायः। अष्टाविंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच चैत्रमासे नवम्यां तु जातो रामः स्वयं हरिः। पुनर्वस्वृक्षसहिता सा तिथिः सर्वकामदा।।1।। श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहाधिका। चैत्रशुद्धे तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि।।2।। चैत्र मास की नवमी तिथि को स्वयं विष्णु श्रीराम के रूप में उत्पन्न हुए। पुनर्वसु नक्षत्र के साथ वह तिथि सभी कामनाएँ पूर्ण करती है। यह श्रीरामनवमी कही गयी है, जो करोड़ों सूर्यग्रहण के से अधिक पुण्यदायिनी है, यदि चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र का योग रहे। पुनर्वस्वृक्षसंयोगः स्वल्पोऽपि यदि दृश्यते। चैत्रशुद्धनवम्यां तु सा तिथिः सर्वकामदा।।3।। पुनर्वसु नक्षत्र का संयोग यदि थोड़ा भी दिखायी दे, तो चैत्र शुक्ल नवमी की वह तिथि सभी कामनाएँ पूर्ण करती है। अस्मिन् दिने महापुण्ये राममुद्दिश्य भक्तितः। यत्किञ्चित् क्रियते कर्म तद्भवक्षयकारकम्।।4।। उस महापुण्यमय दिन में श्रीराम को लक्ष्य कर भक्ति से जो कुछ भी कर्म किये जाते हैं, वे पुनर्जन्म का नाश करते हैं। उपोषणं जागरणं पितॄनुद्दिश्य तर्पणम्। तस्मिन् दिने तु कर्त्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः।।5।।

  1. ग. यहाँ से चार चरण अनुपलब्ध।