अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 257, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(196) अगस्त्य-संहिता
ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ।।४९।। पूर्वोक्तपद्मकुण्डे वा स्थण्डिले वा यथाविधि। लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टोत्तरन्ततः ।।५०।। साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः ।।५१।। इसके बाद मन्त्रज्ञानी मूलमन्त्र से पूर्वोक्त हवन कुण्ड में अथवा स्थण्डिल पर होम करें। यह होम विधानपूर्वक लौकिक अग्नि में श्रीराम का स्मरण करते हुए घृत युक्त पायस से कम से कम एक सौ आठ बार करें। ततो भक्त्या तु संतोष्य आचार्यं पूजयेन्मुने। कुण्डलाभ्यां सरत्नाभ्यामङ्गुलीयैरनेकधा। ।।५२।। गन्धपुष्पाक्षतैर्वस्त्रैर्विचित्रैः सुमनोहरैः। ततो रामं स्मरन् दद्यादिदं मन्त्रमुदीरयन् ।।५५।। इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलङ्कृताम्। चित्रवस्त्रयुगाच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते ।।५६।। श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः। प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुबहून्यपि ।।५७।। अनेक जन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च। हे मुनि सुतीक्ष्ण! तब कुण्डल, रत्न, अंगूठी आदि अनेक वस्तुओं से आचार्य को सन्तुष्ट कर चन्दन, फूल, अक्षत आदि से आराधना कर रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्र समर्पित कर श्रीराम का स्मरण करते हुए इस मन्त्र को पढ़ते हुए दान करें- “हे आचार्य! आप श्रीराम स्वरूप हैं। मैं भी श्रीराम स्वरूप हूँ। रंग-बिरंगा एक जोड़ा वस्त्र में छिपी हुई तथा अलंकृत श्रीराम की यह स्वर्णमयी प्रतिमा श्रीराम की प्रीति के लिए आपको दे रहा हूँ। इससे श्रीराम प्रसन्न हों तथा अनेक जन्मों में अर्जित तथा बार बार किए गये मेरे महापाप श्रीराम हर लें।” इति दत्वा विधानेन दद्याद् वै दक्षिणान्तरम् ।।५८।। अन्येभ्यश्च यथान्यायं गो-हिरण्यादिशक्तितः। दद्याद् वासोयुगं धान्यं यथा विभवमादृतः ।।५९।।