भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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षड्‌विंशोऽध्यायः (197)

इस प्रकार विधानपूर्वक दान कर दूसरी दक्षिणा करें। दूसरे लोगों को भी उचित रीति से गाय, स्वर्ण आदि शक्ति के अनुसार दान करें। जोड़ा वस्त्र, धन- सम्पत्ति भी विभवानुसार दान करें। ब्राह्मणैः सह भुञ्जीत तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम्। ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।।60।। तुलापुरुषदानादिफलं प्राप्नोति मानवः। अनेकजन्मसंसिद्धपापेभ्यो मुच्यते ध्रुवम्।।61।। बहुना किमिहोक्तेन मुक्तिस्तस्य करे स्थिता। कुरुक्षेत्रे महापुण्ये सूर्यपर्वण्यशेषतः।।62।। तुलापुरुषदानादि कृते तत् लभ्यते फलम्। तत्फलं लभ्यते मर्त्यैर्दानानेन सुव्रत।।63।। इसके बाद ब्राह्मणों के साथ भोजन करें और उन्हें दक्षिणा भी दें। इस प्रकार प्रतिमा-दान करने से वह ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। तुलापुरुष दान आदि का फल वह व्यक्ति पाता है। अनेक जन्मों के संचित पापों से मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्र में, पुण्य क्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय अशेष रूप से तुलापुरुष-दान (पुरुष के भार के बराबर स्वर्णदान) का जो फल मिलता है, वही मानव इस दान से पाता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामव्रतकथनं नाम षड्‌विंशोऽध्यायः।।26।। विशेष ( इस अध्याय में श्लोक संख्या 55 के बाद निम्नलिखित अंश केवल पाण्डुलिपि क. में उपलब्ध है, किन्तु पूर्वापर अनन्वय तथा अकाण्डप्रथन के कारण यह अंश प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। ऐसी सम्भावना है कि किसी लिपिकार ने उक्त स्थल पर पाद-टिप्पणी के रूप में अनुकल्पों का उल्लेख किया होगा, जिसे प्रतिलिपिकार ने खण्डित मूल अंश समझकर कालान्तर में पाठ के साथ जोड़ दिया होगा। इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलङ्कृताम्। यह पंक्ति दो बार मिलने के कारण इस स्थिति की सम्भावना बढ़ जाती है। इस अंश को यहाँ अनुवाद के साथ दिया जा रहा है-